राजकुमार कुम्भज की युद्ध पर तीन कविताऍं

युद्ध के विरुद्ध युद्ध- 8

कविता हमेशा युद्ध के खिलाफ़ खड़ी रही है, भले ही तानाशाह युद्ध को राष्ट्रवादी गौरव बताकर उसका महिमामंडन करते रहे हों। लेकिन उसकी कीमत आम आदमी ने ही चुकाई है (महमूद दरवेश)। बहरहाल जो युद्ध चल रहे हैं उनके नकारात्मक प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहे हैं । किसी भी युद्ध में जहां बच्चे और महिलाओं समेत नरसंहार होते हैं, वहीं इस विध्वंस से अंतरराष्ट्रीय सामाजिक जीवन भी तहस-नहस होता है।

प्रतिबिंब मीडिया साहित्यकारों की इस चिंता से भली-भांति वाकिफ़ है। ‘युद्ध के विरुद्ध युद्ध’ शीर्षक के तहत हम आपका युद्ध विरोधी साहित्य प्रकाशित करेंगे। आप अपनी कविताएं, कहानियों समेत रचनाएं हमें भेजिए, उन्हें प्रतिबिंब मीडिया पर ससम्मान प्रकाशित किया जाएगा।  इस कड़ी में हमने ओमसिंह अशफ़ाक, जयपाल, रबीन्द्रनाथ टैगोर, पाश और महमूद दरवेश की कविताएं प्रकाशित की हैं। आज प्रस्तुत है राजकुमार कुम्भज की तीन कविताऍं । संपादक

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1.टैंक पर लोकतंत्र?

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टैंक जब रौंद रहे हों हर-कहीं

बच्चों,बूढ़ों,स्त्रियों और अस्पतालों को

बम जब बरसाये जा रहे हों दुनियाभर में

खेतों,कारख़ानों में,हल चलाते,कल चलाते

किसानों,मज़दूरों,कामगारों की रीढ़ पर

जब संधि-समझौतों से छुपाकर लगातार

लिखी जा रही हों नृशंसताऍं,बर्बरताऍं

फूलों की जगह बिछाई जा रही हों लाशें

जहाँ-जहाँ दिखाई देती थीं पाठशालाऍं

अगर वहाँ-वहाँ उड़ाई जा रही हो बारूद

तो मैं कैसे लिख सकता हूँ कविता

तो मैं कैसे लिख सकता हूँ है ईश्वर कहीं

तो मैं कैसे लिख सकता हूँ पानी का संगीत

तो मैं कैसे लिख सकता हूँ युद्ध के विरूद्ध बुद्ध

और मैं कैसे लिख सकता हूँ अनुनय-विनय

सचमुच मैं लिख ही कैसे सकता हूँ प्रार्थनाऍं

कैसे लिख सकता हूँ टैंक पर लोकतंत्र?

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2.युद्ध के पास नहीं है कोई उत्तर

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युद्ध के पास नहीं है कोई उत्तर

वह जो ख़ुद ही एक सवाल है आजीवन

किसी को भी,कोई भी उत्तर देगा ही क्या

क़ीमत और उत्तर तो देते हैं नागरिक

लड़ते हैं,मरते हैं देश के लिए दिन-रात

और फिर एक दिन कर दिए जाते हैं दफ़न

कभी विश्व-शांति के नोबेल सम्मान में

तो कभी तुच्छ-अभिमानी आत्मसम्मान में

तब हुई प्राणों की क़ीमत क्या?

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3.जो कहलाऍंगे देश-निर्माता

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विजय पताकाऍं फहराऍंगे वे ही

जो राशन,पानी,रोशनी,रोशनदान करेंगे बंद

ध्वस्त करेंगे दुनियाभर में दुनियाभर के पुल

बाधित करेंगे घर से घर की आवाजाही

वे ही फिर-फिर फेंकेंगे आसमान से शांति

बची-खुची फफूँद लगी बासी रोटी के साथ

बाक़ी का है ही क्या कुछ जो आऍं गिनती में

अज्ञात से प्रारंभ हुआ,अज्ञात पर ही अंत

कितने मरे,कितने घायल,लापता कितने

शामिल किये जाते रहेंगे सिर्फ़ गिनती में ही

बहुत हुआ तो जनसंख्या रज़िस्टर में दर्ज़

अंतिम हुआ युद्ध कहते हुए वे आऍंगे फिर

युद्ध-बंदियों और युद्ध-पीड़ितों के बीच यहीं

मुस्कुराते हुए,मरहम बाँटते,बाँसुरी बजाते

दृश्य-अदृश्य में भी होंगे वे ही,वे ही

जो कहलाऍंगे देश-निर्माता.

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