रंगमंच दर्शक को बदलाव का वाहक बनाएगा : मलय श्री हाशमी

कोच्चि से भारतीय सांस्कृतिक कांग्रेस का संदेश:

रंगमंच दर्शक को बदलाव का वाहक बनाएगा : मलय श्री हाशमी

पिछले महीने 20 – 22 दिसम्बर  को कोच्चि में सम्पन्न हुई पहली भारतीय सांस्कृतिक कांग्रेस इंसानी आजादी और गरिमा, धर्मनिरपेक्षता एवं शांति-सदभाव का संदेश देते हुए सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई।

भारत के विभिन्न प्रांतो से पहुंचे 150 से ज्यादा डेलिगेटों और स्थानीय बुद्धिजीवियों ने इन तीन दिनों में कोच्चि के सुभाष बोस पार्क में तीस से ज्यादा बौद्धिक विमर्षों पर मंथन किया और इसके समानान्तर ललित कला भवन में अलग.अलग राज्यों के प्रतिनिधियों द्वारा स्थानीय भाषाओं में गीत, कहानी, आलेख आदि का वाचन करते हुए अपने.अपने राज्य को संस्कृति के विभिन्न पक्षों को श्रोताओं के समक्ष रखा।

20 दिसम्बर को बाद दोपहर आयोजित पहले सत्र में ‘थियेटर, प्रतिरोध एवं सामाजिक रूपान्तरण’ विषय पर हुए विमर्श में तामिलनाडू के विद्वान प्रलयन इप्टा संस्था से तनवीर अख्तर एवं राकेश और जनम दिल्ली की ओर से मलय श्री हाशमी ने अपने वक्तव्य रखे।

सुधन्वा देशपांडे द्वारा संचालित इस सेशन में इप्टा के साथी राकेश ने ‘अढ़ाई आखर प्रेम का’ यात्रा के बारे में बताया कि जत्थे की शुरूआत पश्चिम बंगाल में 2022 को हुई थी। बाद में बिहार, झारखण्ड व छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों का बहुत अच्छा अनुभव रहा। इस यात्रा के माध्यम से ग्रामीण आंचल में रहने वाले लोगों की समस्याओं बारे प्रत्यक्ष अनुभव सांझे किए गए। रोजाना 40-50 किलोमीटर पैदल चलकर किसी गांव में रात्रि ठहराव किया जाता था। उनका कहना था कि उतर.प्रदेश में ये कार्य काफी कठिन था लेकिन एक विशेष क्षेत्र में 356 परिवारों की पहचान हो पाई जो स्वाधीनता संग्राम में जुड़े हुए थे और अभी तक गुमनामी की जिंदगी जी रहे थे।

मलय श्री हाशमी ने बताया कि जन नाटय मंच 1980 के दशक से काम.काजी लोगों के बीच नाटक खेल रहा है। ‘अनसुने अफसाने’ से लेकर ‘बुलडोजर राज’ तक जो नुक्कड़ नाटक इनकी टीम ने खेले, उसका निष्कर्ष यही है कि इकट्ठे मिलकर चलना ही सटीक उपाय है।

इप्टा के साथी तनवीर अख्तर का कहना था कि ‘साहित्यकारों की धरती को चिन्हित करके उन क्षेत्रों का दौरा किया गया और सम्बंधित स्थानीय साहित्यकार और उसके योगदान से वहां के स्थानीय निवासियों को परिचित करवाने के पश्चात उस गांव की मिट्टी को साथ लेकर आते थे जिसे बाद में हरिजन सेवा संघ (दिल्ली) में इसे रखा गया। इप्टा द्वारा मंचित नाटकों में मोतिहारी (बिहार) में खेला गया ‘सवा सेर गेहूं’ काफी सफलता से अपना संदेश पाठकों में दे पाया।

तामिलनाडू से पधारे थियेटर निदेशक प्रलयन ने अपने अनुभव सांझे करते हुए बताया कि उनके प्रदेश में TNUEF (तामिलनाडू अस्पृश्यता उन्मूलन मोर्चा) और चेन्नई, कलई कुझु द्वारा अगस्त माह में एक कला यात्रा (Kalai Payanam) निकाली गई। इस नाटक में ‘‘पतंगिल उल्लापडी’’ नाटक खेला गया जिसका प्रदर्शन अगस्त के दस दिनों में प्रांत के एक दर्जन से अधिक जिलों में 40 सार्वजनिक स्थानों पर इस नाटक का प्रदर्शन किया गया।

2. नाटक की कहानी और मुख्य दृश्य

नाटक किसी ऊंचे मंच पर नहीं, बल्कि जमीन पर दर्शकों के बीच खेला जाता है ताकि लोग खुद को इससे जुड़ा हुआ महसूस करें:

पुलिस स्टेशन का दृश्य :  नाटक एक काल्पनिक ‘पाचल पुलिस स्टेशन’ में शुरू होता है जहाँ ‘मरुधयी” और उसका मूक (बोलने में असमर्थ) बेटा जातिगत हिंसा की शिकायत दर्ज कराने जाते हैं।

*दो.गिलास प्रणाली (Two-Tumbler System): एक दृश्य में चाय की दुकान का कर्मचारी पुलिस वालों से तो हंसी-मजाक करता है, लेकिन मरुधयी और उसके बेटे को चाय देने में हिचकिचाता है। यह गांवों में आज भी प्रचलित छुआछूत को दर्शाता है।

*शव और रास्ता : एक दृश्य में ऊंची जाति के लोग दलितों की शव यात्रा को अपने रास्ते से निकलने नहीं देते। यहाँ ‘ऊरु’ (मुख्य गाँव) और चेरी (दलित बस्तीद्) के बीच के भौतिक और सामाजिक बंटवारे को दिखाया गया है।

’ पराय (Parai) संगीत: नाटक की शुरुआत ‘पराय’ (एक पारंपरिक वाद्ययंत्र) की थाप से होती है, जो कभी केवल शोक का प्रतीक थाए लेकिन अब आत्म.सम्मान और प्रतिरोध का प्रतीक बन गया है।

3. महत्वपूर्ण संदेश और संवाद

* पुलिस का तर्क : नाटक में एक पुलिस अधिकारी कहता है कि “यह कानून (SC/ST Act) लोगों को बांट रहा है,” जबकि मरुधयी जवाब देती है कि “हम तो पहले से ही ‘ऊरु’और ‘चेरी’ में बंटे हुए हैं।

*पंचायत अध्यक्ष की लाचारी: धनलक्ष्मी नाम की महिला पंचायत अध्यक्ष मानती है कि भेदभाव गलत है, लेकिन वह कहती है, “मैं अपने समुदाय (जाति) के खिलाफ जाकर कुछ नहीं कर सकती।” यह दिखाता है कि कैसे पितृसत्ता और जाति मिलकर महिलाओं की शक्ति को सीमित करते हैं।

*अंतिम दृश्य: नाटक के अंत में दो दलित पात्र पुलिस की अनुमति मिलने पर शव को जलाते हैं। यह ‘जातिवाद को जलाने’ का एक रूपक (Metaphor) है, लेकिन साथ ही सवाल उठाता है कि क्या यह केवल राज्य की जिम्मेदारी है या समाज की भी?

उनका कहना था कि तामिलनाडू में सामाजिक बदलाव के लिए सांस्कृतिक यात्राओं की प्रेरणा केरल के ‘शास्त्र साहित्य परिषद’ से ली गई है।

’ 1980 के दशक में ‘अरीवोली इयक्कम’ (साक्षरता आंदोलन) के दौरान इसका बहुत उपयोग हुआ।

*यह नाटक जर्मन नाटककार बर्तोल्त ब्रेख्त (Bertolt Brecht) की शैली का अनुसरण करता है, जिसका उद्देश्य दर्शकों को केवल भावुक करना नहीं, बल्कि उन्हें सोचने और बदलाव के लिए प्रेरित करना है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि नुक्कड़ नाटक आज भी सामाजिक कुरीतियों, विशेषकर जातिवाद और छुआछूत के खिलाफ एक शक्तिशाली ‘प्रतिरोध के मंच’ हैं। यह केवल मनोरंजन नहीं बल्कि समाज के सामने एक ‘‘आईना’’ दिखाने की कोशिश है।

सुधन्वा देशपांडे ने पुख्ता तरीके से अनुवाद करते हुए बखूबी मंच संचालक की भूमिका निभाई।

     प्रस्तुति

गुरबख्श मोंगा

 डा  वंदना सुखीजा