फासीवाद की आहटें
प्रेमकुमार मणि
लोकसभा की कार्यवाही देखते हुए ब्रेख्त की एक कविता याद आई. दशकों पहले पढ़ी उस कविता का भावार्थ ही याद है. किसी राजनीतिक कैदी ने जेल की कोठरी में नाखून से लेनिन ज़िन्दाबाद लिख दिया. निरीक्षण केलिए जेलर कोठरी में आया तो उसने नाखून से लिखे इश्तेहार को देखा. हुक्म दिया इस लिखे को मिटा डालो. हुकमपालक ने लिखे हुए पर काला पेण्ट लगा दिया. ठीक वैसे ही जैसा लिखा हुआ था. अब दीवार पर लेनिन ज़िन्दाबाद काले रंग में दूर से दिखने वाला इश्तेहार बन गया. जेलर फिर आया. उसने माथा पीट लिया. हुक्म दिया इसे खुरच डालो. दूसरा हुकमपालक आया. उसने छेनी-हथौड़ी थामी हुई थी. उसने पूरे लिखावट को छेनी-हथौड़े से खुरच डाला. दीवार पर लेनिन ज़िन्दाबाद गुद गया.
लोकसभा में कुछ ऐसा ही हुआ. बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने बोलना शुरू किया. उसके पूर्व भाजपा के तेजस्वी सूर्यवंशी ने शायद अपने भाषण में कांग्रेस की देशभक्ति पर सवाल उठाए थे. राहुल गाँधी ने अपना भाषण आरम्भ करते हुए कागज के कुछ फोटोस्टेट पन्नों को दिखाते हुए जैसे ही पूर्व आर्मी चीफ मनोज मुकुंद नरवणे की किताब का जिक्र किया रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बेचैनी से उठ खड़े हुए और कहा वह किताब अभी प्रकाशित नहीं है. उसका उद्धरण आप नहीं दे सकते. उन्होंने राहुल से पूछा आप बताइए क्या वह किताब प्रकाशित है ?
फिर अमित शाह सहित कई लोग यही सवाल करने लगे. अध्यक्ष ने राहुल से पूछा रक्षा मंत्री जो पूछ रहे हैं उसका जवाब देने में आपको क्या दिक्कत है. राहुल ने कहा एक पत्रिका में उसके बारे में प्रकाशित हुआ है कि डोकला में चार चीनी टैंक .. और पूरा सदन शोर से भर गया. एक सदस्य ने कहा सदन में किसी किताब को उद्धृत नहीं किया जा सकता. अब अध्यक्ष बिरला को होश आया. अब तक तो वह भी किताब प्रकाशित है या नहीं यही पूछ रहे थे. अब जाकर कहा किसी किताब को उद्धृत नहीं किया जा सकता.
राहुल ने कहा मैं मैगज़ीन को उद्धृत कर रहा हूँ. फिर नियमन आया आप मैगज़ीन भी उद्धृत नहीं कर सकते. फिर किसी ने कहा कि आप तभी कर सकते हैं जब किताब या पत्रिका का विषय से कोई संबंध हो. राहुल यही तो कर रहे थे. अंत में राहुल ने भी होशियारी दिखाई. उन्होंने कहा मैं कोई रिफरेन्स नहीं दे रहा. चीन के चार टैंक .. और अमित शाह खड़े हो गए यह खबर कहाँ से मिली? (यानी जब आपके स्रोत ही नाजायज है तब आपकी बातों का क्या !) अंततः लगभग घंटे भर के हंगामे के बाद राहुल को नहीं बोलने दिया गया. अध्यक्ष ने सभा स्थगित कर दी.
देखने लायक बात यह थी कि इस पूरे घटना क्रम के दौरान प्रधानमंत्री जी का मुँह लटका हुआ था. निश्चय ही राहुल अपनी बात नहीं बोल सके. लेकिन बोलने से अधिक बोल गए. राजनाथ सिंह जिस अंदाज में कह रहे थे कि पुस्तक नहीं प्रकाशित हुई है इससे यह आभास मिलता था कि पुस्तक का प्रकाशन रोकने में रक्षामंत्री को कोई हाथ हो. उन्हें सुनते हुए बचपन में पढ़ी वृक्ष की गवाही कहानी याद आ रही थी. सरकारी बेंच जिस तरह बेचैन था उससे बार-बार आभास मिल रहा था दाल में कुछ काला है. वर्ना साँच को आंच क्या !
पूर्व सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे की किताब है ” फोर स्टार्स ऑफ़ डेस्टिनी. ” ( इसे हिन्दी में ‘ तकदीर की चंडाल चौकड़ी ‘ कहना बुरा नहीं होगा. किसकी तकदीर शायद कहना जरूरी नहीं है. ) इसे प्रकाशित होने से रोका गया है. यह तो रक्षामंत्री के वक्तव्य से ही स्पष्ट है. कारवां मैगज़ीन ने इसके बारे में लिखा है. और जैसा कि हंगामे से ही स्पष्ट हुआ इसमें प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री की भूमिका पर सवाल खड़े किए गए हैं. मामला देश की सुरक्षा का है और संस्मरण पूर्व सेनाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति के हैं. इसलिए प्रधानमंत्री को चाहिए था कि इस पर खुली चर्चा होने देते. वह सदन में मौजूद थे ( और उनकी छाती छप्पन इंच की है) इसलिए उनका कर्तव्य था कि उठ कर खड़ा हों और अध्यक्ष से नेता प्रतिपक्ष को बोलने को कहें. यदि ऐसा प्रधानमंत्री ने किया होता तो उनकी इज्जत बढ़ती. ऐसा नहीं करके वह स्वयं कठघरे में खड़े हो गए हैं.
मैं अपने किशोर वय को याद करता हूँ. 1966 – 67 में एक किताब छपी थी जनरल कौल की. 1962 के चीनी आक्रमण और भारत की हार का हाल विषय था. कौल सेना प्रमुख थे. शीर्षक था अनटोल्ड स्टोरी. इस पर उस समय के चर्चित हिंदी साप्ताहिक दिनमान में एक लम्बी समीक्षा छपी थी. शीर्षक था जनरल कौल की अनकही कहानी. स्मरण है उस किताब में प्रधानमंत्री नेहरू और रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन की कड़ी आलोचना थी. कौल के अनुसार रक्षामंत्री विभागीय बैठकों में सेनाध्यक्ष तक को बोलने नहीं देते थे. और भी बहुत सी बातें थीं. उन जानकारियों से मुझ जैसे किशोर के मन में भी बहुत से सवाल उठे. ये सब भी शिक्षा का ही एक हिस्सा होता है.
नरवणे की किताब में क्या कुछ ऐसा है जिससे सरकार भयभीत है. यह देश की सुरक्षा का मामला है. राहुल को बोलने और किताब को छपने से जिस तरह रोका गया यह स्पष्ट करने केलिए पर्याप्त है कि मामला गंभीर है. देश की जनता के मन में कोई भ्रम नहीं रहे इसलिए आवश्यक है कि नरवणे की उस किताब को अविलम्ब प्रकाशित किया जाय.
सदन में क़ानून भले जीत गया हो, लेकिन सच्चाई की हत्या कर दी गई. ऐसी हरकतों के बीच से ही किसी देश समाज में फासीवाद उभरता है. हर देशवासी अपने देश की संसद पर गर्व करना चाहता है. संसद को भी नागरिकों के मनोभावों का सम्मान करना चाहिए. आप हमारे प्रतिनिधि ही है. अपनी हरकतों से आपने सदन की गरिमा गिराई है. इससे हमारा लोकतंत्र कमजोर होगा. राहुल को जो बोलना था उससे अधिक प्रभावशाली उनका न बोलना हुआ. सरकारी बेंच ने अपनी ही फजीहत कराई है. विनाशकाले विपरीत बुद्धि.। प्रेम कुमार मणि के फेसबुक वॉल से साभार
यह लेखक के अपने विचार हैं।
