सामाजिक सरोकार
डिजिटल युग में अनुभव की बदलती परिभाषा: बढ़ता हुआ पीढ़ीगत अंतर
बदलती दुनिया के साथ खुद को बदलने के लिए तैयार हों
डॉ रीटा अरोड़ा
आज के दौर में समाज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ ‘अनुभव’ की परिभाषा बदल रही है। पुराने समय में परिवार का सबसे बुजुर्ग सदस्य ज्ञान का सर्वोच्च स्रोत होता था। सफेद बालों को तजुर्बे की निशानी माना जाता था। लेकिन आज, एक नन्हा बच्चा भी अपने दादाजी से कुछ पूछने के बजाय गूगल या AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से पूछना बेहतर समझता है। यह कड़वा सच है कि यदि बड़े-बुजुर्गों ने खुद को नहीं बदला तो उनके सफेद बाल केवल उम्र की निशानी रह जाएंगे, बुद्धिमानी की नहीं।
पुराने समय में शिक्षा और संसाधनों की कमी थी जिसके कारण हमारे पूर्वजों के पास सीखने के सीमित अवसर थे। लेकिन आज स्थिति अलग है। यदि आज के दादा-दादी तकनीक और AI (एआई) से कतराते हैं या ‘रूढ़िवादी’ बने रहते हैं तो वे अनजाने में खुद को अपने पोते-पोतियों से दूर कर रहे हैं।
जब पोते-पोतियों को अपनी हर समस्या का समाधान उसके फोन में मिल जाता है, इसलिए उसे अपने दादा-दादी के पास बैठने की जरूरत महसूस नहीं होती। यहीं से ‘सम्मान और प्रासंगिकता’ का पतन शुरू होता है। माता-पिता भी अपने बच्चों से कहेंगे- “दादाजी का समय पुराना था, उनके पास मत बैठो, अपना काम करो और समय बर्बाद मत करो।” यह वाक्य प्रथम और तृतीय पीढ़ी के बीच एक गहरा शून्य (Vacuum) पैदा कर देता है।

बुजुर्गों को यह समझना होगा कि AI उनका दुश्मन नहीं, बल्कि उनके पोते-पोतियों के संसार में प्रवेश करने की एक चाबी है। अगर आप AI सीखते हैं तो आप केवल एक तकनीक नहीं सीख रहे, बल्कि आप अपने पोते-पोतियों के साथ चर्चा करने के लिए एक ‘नया धरातल’ तैयार कर रहे हैं।
सोचिए, जब आप अपने पोते-पोतियों के साथ बैठकर AI के चमत्कारों पर चर्चा करेंगे तो उसे यह अहसास होगा कि उसके दादाजी केवल बीते हुए कल की बातें नहीं करते बल्कि वे आने वाले कल को भी समझते हैं। यह ‘साझा अनुभव’ उनके मन में आपके प्रति सम्मान को फिर से जीवित कर देगा। वे आपके पास केवल कहानियां सुनने नहीं बल्कि भविष्य की उलझनों को सुलझाने के लिए आएंगे।
यदि आज के वरिष्ठ नागरिक इस डिजिटल बदलाव को स्वीकार नहीं करते तो उनका हश्र भी वैसा ही होगा जैसा पिछली पीढ़ियों का हुआ-वे अपने ही घर में एक ‘शो पीस’ बनकर रह जाएंगे। अनुभव तभी कीमती है जब वह समकालीन भाषा में साझा किया जाए।
सफेद बालों का झूठ बोलना तब शुरू होता है जब हम आधुनिक दुनिया को समझने से इनकार कर देते हैं। अपनी जिद्द और रूढ़िवादिता को छोड़िए। AI को अपनी लाठी बनाइए, बोझ नहीं। याद रखिए, अगर आप उनके संसार का हिस्सा नहीं बनेंगे, तो वे आपके संसार में कभी लौटकर नहीं आएंगे।
पीढ़ीगत अंतराल (Generation Gap) हमेशा से रहा है, लेकिन आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने इसे एक डिजिटल खाई में बदल दिया है। यदि दादा-दादी और पोती-पोतों के बीच का यह सेतु नहीं बनाया गया, तो अनुभव की विरासत लुप्त हो जाएगी।
सवाल यह है: क्या हम बदलती दुनिया के साथ खुद को बदलने के लिए तैयार हैं?
