ठठेरा : हरियाणवी लोकजीवन में धातु-शिल्प परम्परा का अध्ययन
मनजीत सिंह
1. प्रस्तावना
मानव सभ्यता के विकासक्रम में धातु-शिल्प का उद्भव एक निर्णायक एवं युगांतरकारी चरण माना जाता है। जब मानव ने पत्थर और लकड़ी से आगे बढ़कर तांबा, कांसा और बाद में पीतल तथा मिश्रित धातुओं का प्रयोग आरम्भ किया, तब न केवल उसकी भौतिक आवश्यकताओं में विस्तार हुआ, बल्कि सामाजिक संरचना, श्रम-विभाजन और पेशागत वर्गीकरण की प्रक्रिया भी प्रारम्भ हुई। धातु के औजारों और पात्रों ने कृषि, भोजन-संरक्षण, व्यापार और घरेलू जीवन को स्थायित्व प्रदान किया।
भारतीय लोकजीवन में इस धातु-आधारित संस्कृति को विकसित और संरक्षित करने वाले शिल्पकारों में ठठेरा समुदाय का विशिष्ट स्थान रहा है। हरियाणवी लोकसंस्कृति में ठठेरा, कसेरा, कसारा, कंसारा एवं कांस्यकार जैसे नामों से जाना जाने वाला यह समुदाय पारम्परिक धातु-पात्र निर्माण, मरम्मत, ढलाई और कलई जैसे कार्यों से जुड़ा रहा है। ठठेरा केवल एक पेशागत वर्ग नहीं, बल्कि लोकजीवन की आवश्यकताओं, स्वास्थ्य-बोध, सांस्कृतिक परम्पराओं और सामाजिक स्मृति का संवाहक है।
2. अध्ययन के उद्देश्य एवं पद्धति
इस अध्ययन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं—
हरियाणवी लोकजीवन में ठठेरा समुदाय की ऐतिहासिक एवं सामाजिक भूमिका का विश्लेषण।
ठठेरागिरी की पारम्परिक तकनीकों, उपकरणों और कार्य-प्रणाली का विस्तृत विवेचन।
ठठेरा शिल्प के सांस्कृतिक, भाषिक एवं प्रतीकात्मक आयामों को समझना।
समकालीन औद्योगिक परिवर्तनों के संदर्भ में इस परम्परा के संकट और संरक्षण की संभावनाओं का मूल्यांकन।
अध्ययन की पद्धति लोकसाहित्य, नृवंशशास्त्रीय अध्ययन, क्षेत्रीय सांस्कृतिक संदर्भों तथा विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण पर आधारित है।
3. ठठेरा शब्द की व्युत्पत्ति एवं सामाजिक पहचान
‘ठठेरा’ शब्द की व्युत्पत्ति धातु को पीटने, ठोकने और आकार देने की प्रक्रिया में उत्पन्न होने वाली ‘ठक-ठक’ ध्वनि से मानी जाती है। यह ध्वनि न केवल शिल्प-क्रिया का संकेत है, बल्कि ठठेरा समुदाय की पहचान का भी प्रतीक बन गई। जो लोग पीतल, तांबा, कांसा एवं मिश्रित धातुओं से बर्तन बनाने, सुधारने, जोड़ने और कलई करने जैसे कार्यों से जुड़े रहे, वे ठठेरा कहलाए।
हरियाणा क्षेत्र में ठठेरा को कसेरा, कसारा, कंसारा या कांस्यकार भी कहा जाता है। ये नाम क्षेत्रीय भाषिक विविधता और शिल्प-विशेषताओं को दर्शाते हैं। पारम्परिक ग्रामीण समाज में ठठेरा की पहचान एक आवश्यक सेवा-प्रदाता के रूप में रही, जिसकी अनुपस्थिति में घरेलू जीवन की निरंतरता बाधित हो सकती थी।
4. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में ठठेरा परम्परा
धातु-शिल्प का इतिहास भारतीय सभ्यता जितना ही प्राचीन है। सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त कांस्य और तांबे के पात्र इस शिल्प की उन्नत अवस्था का प्रमाण हैं। वैदिक एवं उत्तर-वैदिक काल में भी धातु-पात्रों और औजारों के उल्लेख मिलते हैं।
हरियाणा, जो प्राचीन सभ्यताओं और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है, वहाँ ठठेरा परम्परा का निरंतर विकास हुआ। ग्रामीण समाज में यह शिल्प पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार ढलता गया।
5. ठठेरागिरी की पारम्परिक तकनीक
ठठेरागिरी एक जटिल और अनुभव-आधारित शिल्प है। ठठेरा अपने कार्य में अनेक विशिष्ट क्रियाओं का प्रयोग करता है, जिनमें—
तपाई : धातु को आग में तपाकर उसे कार्य-योग्य बनाना।
गलाई या गवाई : धातु को गलाकर ढलाई के लिए तैयार करना।
बढ़ाई (वर्धन) : पीट-पीटकर धातु का फैलाव बढ़ाना।
घड़ाई (घटन) : धातु को इच्छित आकार में ढालना।
जड़ाई : जोड़ या मरम्मत का कार्य।
मढाई या मठराई (मृष्टन) : सतह को चिकना और मजबूत बनाना।
इन सभी प्रक्रियाओं में ठठेरा धातु के स्वभाव, तापमान और मोटाई की सूक्ष्म समझ रखता है। यह ज्ञान पुस्तकीय न होकर अनुभव और परम्परा से अर्जित होता है।
6. उपकरण एवं कार्यसामग्री
ठठेरागिरी में प्रयुक्त उपकरणों की संख्या और विविधता इस शिल्प की तकनीकी परिपक्वता को दर्शाती है। इनमें हथौड़ा, हथौड़ी, बगला हथौड़ा, गोरमा हथौड़ा, घण, सलाई, सलाख, रांग, मेख, खरबै, गट्टक, इकवाई, कौंच, तमड़ा, सुम्बा, बेरुणा, टांकला, परकार, रेत्ता, कातरी, संडासी और अडांसी प्रमुख हैं।
ये उपकरण केवल औजार नहीं, बल्कि ठठेरे के कौशल और शिल्प-परम्परा के प्रतीक हैं। प्रत्येक उपकरण का विशिष्ट कार्य होता है और उसका प्रयोग विशेष अनुभव की मांग करता है।
7. निर्मित पात्र एवं उनकी उपयोगिता
ठठेरे द्वारा निर्मित धातु-पात्र हरियाणवी लोकजीवन की दैनिक आवश्यकताओं से गहराई से जुड़े रहे हैं। इनमें डेग, डेगची, कुण्डी, लोटा, सागर, परात, थाली, थाल, छाणणी, टोकणी, कुजड़ा, बाल्टी, पतीला, पतीली, भरतुआ, लोटुआ और बेखोरा प्रमुख हैं।
पीतल, तांबा तथा अन्य धातुओं की ढलाई से संबंधित कार्य को लोकभाषा में ‘भरत का काम’ कहा जाता है। ये पात्र न केवल टिकाऊ होते हैं, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उपयोगी माने जाते हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों प्रकार के समाज में इनका व्यापक प्रयोग रहा है।
8. ठठेरा और कलई परम्परा
कलई परम्परा ठठेरागिरी का एक महत्वपूर्ण अंग है। ग्रामीण हरियाणा में तांबा और पीतल के बर्तनों पर कलई कराना स्वास्थ्य एवं संरक्षण की दृष्टि से अनिवार्य माना जाता है।
कलई से पूर्व बर्तन को रेत से अच्छी तरह साफ किया जाता है। इसके बाद उसे आग पर गर्म कर रुई या कपड़े की सहायता से उस पर कलई चढ़ाई जाती है। यह प्रक्रिया बर्तन की आयु बढ़ाने के साथ-साथ उसमें रखे खाद्य और पेय पदार्थों को सुरक्षित रखती है। कलई की यह परम्परा लोकज्ञान और वैज्ञानिक समझ का समन्वय प्रस्तुत करती है।
9. ठठेरा और हरियाणवी लोकजीवन
हरियाणवी लोकसमाज में ठठेरे की उपस्थिति केवल आर्थिक या व्यावसायिक नहीं रही, बल्कि सांस्कृतिक भी रही है। बड़े गाँवों, कस्बों और नगरों में ठठेरों के लिए पृथक स्थान निर्धारित होते थे। आज भी अनेक स्थानों पर ‘ठठेरों वाली गली’ जैसे स्थलनाम मिलते हैं।
लोकभाषा में प्रचलित मुहावरे—ठठेरे की बिल्ली होना, ठठेरे ज्यूँ ठक-ठक करना, कलई खोलणा, ठठेरागिरी करणा—इस समुदाय की सामाजिक उपस्थिति और सांस्कृतिक महत्त्व को रेखांकित करते हैं।
10. समकालीन संकट और परिवर्तन
आधुनिक औद्योगिक उत्पादन, मशीन-निर्मित बर्तनों और प्लास्टिक एवं स्टील के व्यापक प्रयोग ने ठठेरागिरी की पारम्परिक परम्परा को संकटग्रस्त कर दिया है। बाजार-आधारित अर्थव्यवस्था में हस्तनिर्मित धातु-पात्रों की मांग घटती जा रही है। इसके परिणामस्वरूप अनेक ठठेरे इस परम्परागत पेशे से विमुख हो रहे हैं।
यह संकट केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है, क्योंकि इसके साथ लोकज्ञान और पारम्परिक तकनीकी कौशल के लुप्त होने का खतरा जुड़ा है।
11. संरक्षण एवं पुनरुत्थान की संभावनाएँ
ठठेरा शिल्प के संरक्षण के लिए अकादमिक अध्ययन, संग्रहालयों में प्रदर्शन, सांस्कृतिक नीति-निर्माण और बाजार-समर्थन आवश्यक है। यदि इस शिल्प को आधुनिक डिज़ाइन, स्वास्थ्य-बोध और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली से जोड़ा जाए, तो इसके पुनरुत्थान की संभावनाएँ सशक्त हो सकती हैं।
12. उपसंहार
ठठेरा समुदाय और धातु-शिल्प परम्परा हरियाणवी लोकजीवन की प्राचीन, बहुआयामी और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध धरोहर है। यह शिल्प मानव की रचनात्मकता, श्रम-संस्कृति और प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक है। इसके संरक्षण और संवर्धन के बिना लोकसंस्कृति की निरंतरता अधूरी रह जाएगी। अतः ठठेरागिरी को केवल अतीत की स्मृति न मानकर वर्तमान और भविष्य की सांस्कृतिक पूँजी के रूप में देखना आवश्यक है।
