हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 84
सूरज भान शर्मा – अस्थायी शिक्षकों से प्राचार्य संगठन तक की संभाली जिम्मेदारी
सूरज भान मेरे ओ.टी. प्रशिक्षण के सहपाठी रहे। बाद में हमारी घनिष्ठता साथी से भाई के सम्बन्धों के रूप में विकसित हुई। यह सब बिना विशेष प्रयास के स्वाभाविक प्रक्रिया की तरह हुआ। हम दोनों उस दौर में कार्यकर्ता विकसित हुए जब अस्थायी सेवा में थे। दोनों ही सन् 1981 में चण्डीगढ़ अस्थायी शिक्षकों के प्रदर्शन में शामिल हुए थे। हमारी पहल पर रादौर खण्ड में अस्थायी शिक्षकों का सम्मेलन हुआ जिसका उद्घाटन करते हुए एम.एल.एन. स्कूल के मुख्याध्यापक पी. के. कौशिक ने टिप्पणी की थी – “आयोजकों की योजना और संकल्प को देखकर लगता है कि वह राज्य स्तरीय संगठन की नींव रखी जा रही हो।” पुरानी बातों को याद करते हुए ऐसा महसूस होता है कि यूनियन से जुड़ने का प्रारंभिक सफर सर्वाधिक रोमांचकारी था।
सूरज भान का जन्म 12 दिसम्बर 1955 को जीन्द जिले के थुआ गांव में हुआ। उनकी माता जी का नाम श्रीमती शान्ति देवी और पिता जी का नाम श्री गंगादत्त है। वे तीन भाई और दो बहनें हैं। साधारण किसान पृष्ठभूमि के परिवार में ग्रामीण परिवेश में पढ़े सूरज भान का शिक्षा प्राप्ति का सफर बहुत परिश्रम से जुड़ा हुआ है। उन्होंने बिरला संस्कृत महाविद्यालय कुरुक्षेत्र से शास्त्री की और राजकीय शिक्षण महाविद्यालय भिवानी से ओ.टी. की। इसके बाद वे कुछ समय तक कैथल के प्राइवेट विद्यालय में शिक्षक रहे। 5 नवम्बर 1980 को छह माह आधार पर सरकारी स्कूल में संस्कृत अध्यापक नियुक्त हो गए। इसके पश्चात 1 नवंबर 1986 से संघर्ष के परिणामस्वरूप सेवा नियमित हुई। 15 नवम्बर 2000 को उच्च विद्यालय के मुख्याध्यापक और 1 जुलाई 2007 को प्राचार्य पदोन्नत हुए। दिनांक 31 दिसम्बर 2013 को सेवानिवृत्त हुए।
वैसे तो सूरज भान ओ.टी. प्रशिक्षण खुलवाने के समय पर संघर्ष से जुड़ गए थे। जून 1981 में हम अस्थायी शिक्षकों की चण्डीगढ़ रैली में मिले। जुलाई 1981 में मेरी अस्थायी नियुक्ति भी उनके स्कूल गुमथला राव में हो गई। यहीं से हमारी सक्रियता साथ-साथ चली। वे 1982 में अस्थायी एवं बेरोजगार अध्यापक संघ के खण्ड सचिव बन गए और 1984 में जिला सचिव बने और साथ ही रादौर में हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ के पदाधिकारी चुने गए। सन् 1984 में जीन्द से मण्डी आदमपुर तक पैदल मार्च में शामिल हुए। सन् 1985 में हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ में शुद्धिकरण अभियान चला तो रादौर खण्ड दर्जनों गांवों तक शिक्षकों को सही पक्ष से परिचित करवाने में इनका अच्छा योगदान रहा।
सर्वकर्मचारी संघ के गठन के बाद चले तूफानी आन्दोलन में बहुत सक्रिय भूमिका में रहे। आन्दोलन के बाद सेवाएं नियमित होने पर वे कैथल क्षेत्र में चले गए और नवंबर 1987 में खण्ड कैथल में हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ में कोषाध्यक्ष चुने गए। इसके बाद हुए आंदोलन में उन्हें गिरफ्तार किया व कैथल जेल से 5 दिन बाद रिहा किया गया। उस समय चौधरी देवीलाल मुख्यमंत्री थे। भजनलाल सरकार के दौरान 1993 में चंडीगढ़ में गिरफ्तार हुए। एक सप्ताह जेल में रहे। फिर सेवा से बर्खास्त किए गए। एक माह बाद मांगें मान ली गईं। सेवा बहाल हुई जेल पीरियड को सेवा मैं बहाल किया गया ।
वे सन् 996-97 पालिका आन्दोलन और 1998 के नर्सिंग आन्दोलन तक सर्वकर्मचारी संघ के साथ रहे। मुख्याध्यापक और प्रिंसिपल पदोन्नत होने पर लगभग दस साल तक एसोसिएशन में भी जिला कैथल में अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली। अंतिम 3 साल तक वे प्रिंसिपल एसोसिएशन में प्रदेश स्तर पर काम करते हुए महासचिव पद संभालते हुए 31 दिसम्बर 2013 को सेवानिवृत्त हो गए। सूरज भान संगठन में काम करने के साथ-साथ 1991-92 में साक्षरता अभियान में भी सक्रिय रहे। वे कैथल जिला साक्षरता समिति के प्रमुख कार्यकर्ताओं में शामिल थे।
उन्होंने पहल करके सांस्कृतिक टीम का गठन किया और स्वयं भी संस्कृति कर्मी की भूमिका निभाई। इस अभियान में वे कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के विख्यात् पुरातत्ववेत्ता प्रोफेसर सूरजभान के साथ कैथल क्षेत्र के अनेकों गांवों तक पहुंचे।
उनकी जीवन साथी सन्तोष भी सेवानिवृत्त शिक्षक हैं। उनकी एक बेटी और दो बेटे हैं। बेटी प्रतिभा कुरुक्षेत्र में रहती हैं। दामाद कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में शिक्षक हैं। बड़ा बेटा विवेक पत्रकार और लेखक है और फिलहाल सपरिवार आस्ट्रेलिया में रहता है। छोटा गौरव कलाकार और सिनेमा कर्मी है व पुत्रवधू शिक्षक हैं। सूरज भान सन् 1987 से कैथल में रह रहे हैं। (सौजन्य: ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच
