राजकुमार कुम्भज कविता- शपथ है हिंदी में हिंदी की

कविता

शपथ है हिंदी में हिंदी की.

राजकुमार कुम्भज

 

शपथ है हिंदी में,हिंदी की

जो कुछ कहूँगा,सच्चे अंदाज़ में कहूँगा

मदिरापान करते हुए मेला लगाऊॅंगा

निषिद्धताओं पर भूरे-भूरे प्रवचन दूँगा

मनगढ़ंत कथाऍं गढूँगा,चाहे जितनी

झूठ और फ़रेब और कपट से छलछलाती

अजूबा हो जाऊॅंगा बेमतलब ही

चीज़ों के बदलूॅंगा नाम क्रमशः और पुनः

उत्तरोत्तर अफ़लातून कहलाऊॅंगा

कहूॅंगा बच्चों से बार-बार कहूँगा यही-यही

अपनी ज़ुबान,अपनी भाषा,अपने रौब में

बचाते हुए नज़रें,मातृभाषा में कहूँगा

सीखें बार-बार सीखें शपथ ले लें

अच्छी है हिंदी,सरल है,सच्ची है हिंदी

कमी है यही कि किसी काम की नहीं है

दो दुनिया में,दो रोटी,दो दाम की नहीं है

घर के घर में भी बदनाम ही रही है

बस पीटते रहो ढ़ोल,खोजते रहो पोल

और बोलते रहो मनमर्ज़ी के लंपट बोल

हिंदी इज़ ए वैरी फ़न्नी लेंग्वेज़

रद्दी भी अंग्रेज़ी की बिकती है महॅंगी

दोहराऊॅंगा,कमोबेश यही सब दोहराऊॅंगा

पादुकाऍं उठाई हैं,पादुकाऍं उठाऊॅंगा

यहाँ-वहाँ बनाऊॅंगा ख़ास वातावरण स्वैग

सर्कस हो जाऊॅंगा,जोकर कहलाऊॅंगा

शपथ है हिंदी में,हिंदी की.

_______

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *