कविता
खूँटी पर खुदकुशी
ओमसिंह अशफ़ाक
खूँटी पर लटकी है रामदुलारी,
खूँटे से बंधी है बछिया बेचारी,
चूल्हे में सिंधड़ती गीली लकड़ी,
घड़ा पानी का औंधा पड़ा है।
मौके पर जुटी है उत्सुक भीड़-
लेकिन हर शख्स वहां ठगा-सा खड़ा है।
खूँटी पर खुदकुशी नामुमकिन है-
भला, ऐसे भी कोई मरा करता है ?
*
छोटी-माजरी में
एक साल के अरसे में
ये पन्दरहवीं खुदकुशी है-
सरकारी रिकॉर्ड में बेशक वे सब
कुदरती मौतें ही दर्ज हुई हैं—
कौन लाश की मिट्टी खराब करे
नाहक पुलिस के चक्कर में फंसकर लुटे-पिटे !..
तमाम दर्शक अपने-अपने ढंग से
गुत्थी को सुलझाने में लगे हैं—
रामदुलारी ने आखिर नया तरीका
कैसे ईजाद किया मरने का ?
*
रामदुलारी नवयौवना मजदूर औरत थी-
शादी को बामुश्किल तीन साल हुए थे।
शुक्र है दान-दहेज का लफड़ा
वहाँ नहीं था-
पर उसके जिंदा रहने का
उसकी नजर में-
कोई कारण नहीं बचा था।
हाड़तोड़ मेहनत की
वह छुटपन से आदी थी।
*
सोलह बरस बाप के घर में-
बैल की तरह खटती रही थी,
पर अब तो उसका ये गुण भी
व्यर्थ हो चला था।
इधर के वर्षों में-
हवा कुछ ऐसी चली थी
कि काम एक-मजदूर अनेक,
जाएं तो कहाँ जाएं ?
दूर-दूर से उजड़कर
पहले ही भतेरे लोग
इधर आ चुके थे…
*
रामदुलारी पंखे से लटककर भी
तो मर सकती थी ?
मगर पंखा घर में था ही नहीं।
सल्फास भी निगल सकती थी वह,
पर मुफ्त कहाँ मिलती है ?
रेल के नीचे कट सकती थी रामदुलारी
लेकिन दस कोस के सफ़र में
निश्चय डोल भी सकता था,
बीच रास्ते कोई जानकार
मिल-बोल भी सकता था !
और आग में जल मरने का मतलब होता-
सबके सामने निर्वस्त्र होना ?
रामदुलारी के विकल्प बेहद सीमित थे-
फिर भी उसे मौत के मुँह में
जाना ही पड़ा।
*
वह नहीं चाहती थी-
मछली की तरह तड़पना,
मुर्गी की मानिंद फड़फड़ाना,
गऊ की भांति रंभाना-
इन सबके दुख वह देख चुकी थी
अपनी छोटी-सी जिंदगी में।
इस कदर मजबूर हुई रामदुलारी
कि करनी पड़ी ईजाद उसको
नई तकनीक
मरने की ?
*
दुस्साहस किया उसने
और डाल लिया फंदा ओढ़नी का
अपने गले में-
पर इतना भर करने से वह
कैसे मर सकती थी ?
तब उसने जुगत लगाई-
लटककर खूँटी से मोड़ लिये दोनों घुटने
और समेट ली टांगें अपने आगोश में-
बस यूँ कहिए कि मौत से मिलने को
बजिद थी रामदुलारी।
*
कहना पड़ता है हमें बेहद दुख के साथ-
कि रामदुलारी अब इस दुनिया में नहीं रही,
पर मौत ने उसकी छोड़ दी है
एक नई बहस—
आशंकित हैं कई मर्द-लोग
कि औरतों ने ढूंढ़ लिये हैं
“आजादी” के नए तरीके !
कि अब उनकी मर्दानगी
का क्या होगा ?
*
बहरहाल-
इस बहस मेंअनुत्तरित है
अभी तलक वही बुनियादी सवाल-
कि आखिर लोग
धड़ाधड़ खुदकुशी क्यों कर रहे हैं?
और शासक जमात जानबूझकर
मूकदर्शक क्यों बन रहे हैं ?
(मई 2003)

मार्मिक भावपूर्ण कविता