कविता
बाईयां
मोहनदास नैमिशराय
मुंह अंधेरे आ जाती हैं
पानी भरने बाईयां
सीढ़ियों से चढ़ते हुए
कितने मंजिल पर हो फ्लैट
उनके पांवों को नहीं होता दर्द
न ही होती थकान उनके शरीर में
उफ तक वे नहीं करतीं
घड़ी भर सुस्ताने का टाईम भी नहीं मिलता उन्हें
एक एक फ्लैट से लाती है पहले खाली घड़े
सीढ़ियां उतर कर नल के नीचे
लाइन में रखती है घड़े
नंबर आने पर
घड़ा उठा कर पेट के सहारे
हाथ से पकड़ कर पानी से भरा घड़ा
वे चढ़ती है सीढ़ियां बार बार
जब तक चार पांच घड़े पानी
नहीं हो जाता पूरा
पानी हो जाने पर
बतातीं है वे
मैम साब पानी हो गया पूरा
प्याले और प्लेट उतारती है
पानी उबलने पर चाय की पत्ती
डालती है,फिर दूध और चीनी
चाय तैयार होने पर
पहले मैम साब को देती है
फिर अपने लिए
पहली चाय वह यहीं पीती है
रसोई के बाहर एक कोने में खड़े होकर, साथ में
बिस्किट का टुकड़ा
जो पहले से ही रखा होता है
उसके लिए, रसोई के दूसरे कोने में
चाय पीकर समय देखती है
दीवार घड़ी में
सुबह के ६ बजे
धूप के कुछ टुकड़े
प्रवेश करते हैं रसोई में
किरणों के साथ आती हैं चिड़िया
फुदकती है, गाती हैं
बाई बाजरा डालती है
बाजरा चुगते हुए वे
खुश होती है
मचलती है
उनका मचलना और फुदकना देख
जैसे बाई पिघलती है
पिघलते हुए ढेर सारे
बर्तन साफ़ करना
अभी तीन जगह और जाना है
पल भर आइने के सामने खड़ी हो
अपने आप से कुछ कहती है
पसीना पौछती है
आइने में अपने आप को बिखरते
देखती है
बिखरे बाल
पानी ढोते हुए ब्लाउज का भीग जाना
कभी-कभी हाथ से निचोड़ती हैं
सीढ़ियां चढ़ते हुए
बैलेंस रख नहीं पाती कभी
भूल जाती है कदमताल
ऊपर चढ़ना फिर उतारना हर बार
जितने घर उतनी ही बार
भीगना और सूखना
बाइयों की दिनचर्या में शामिल
कभी आंसुओं से भीगना
कभी पानी से
फर्क क्या पड़ता है
आंखें भी सूख जाती हैं
कभी नदी भी बन जाती है बाईयां
जैसे आंसुओं से आंखें
और पानी से ब्लाउज जैसे नदी का सूख जाना
और हार जाना फ़िर पानी से
पर बाईयों के भीतर
कहीं कुछ रिसता है
जैसे किसी पहाड़ी के नीचे पानी
उनके भीतर भी कुछ रिसता है
चाहे पानी हो या आंसू
( मुंबई प्रवास में लिखी गई )
