कुमारी शिल्पा “राजपूत” की कविता – बहुत रात हो चुकी है 

कविता

बहुत रात हो चुकी है

कुमारी शिल्पा “राजपूत

 

बहुत रात हो चुकी है,

चारों ओर घोर सन्नाटा है।

नींद आँखों से दूर है,

हर छोटी-सी आहट पर

मन घबरा जाता है।

 

कहाँ से कहाँ ले आई है यह ज़िंदगी,

मन बार-बार

इसी सवाल पर अटक जाता है।

 

वर्तमान को छोड़

बार-बार भटकता हूँ भूतकाल में।

ऐसा नहीं कि कुछ नहीं मिला,

पर जो मिला उसमें

खुद को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते

अंततः हाथ लगी

सिर्फ़ हताशा।

 

अस्तित्व मेरा

मेरी उपलब्धियों में

कहीं खो गया।

क्या पाया मैंने

खुद को ही गँवाकर?

 

जीनी थी जब ज़िंदगी

दो जून की रोटी खाकर,

उम्रभर भागदौड़ में

लगे ही रहे—

जाने क्यों

खुद को ही ठगते रहे।

 

अब थक गया हूँ।

चाहता हूँ

थोड़ी देर बैठना—

अकेले, एकांत में,

खुद को समेटना।

 

न जाने क्यों

यह एकांत अब भाने लगा है।

रात्रि का सन्नाटा

मुझसे कुछ कहने लगा है।

 

खोजना चाहता हूँ

फिर से

अपने बचपन की तस्वीर,

मनाना चाहता हूँ

अपनी रूठी हुई तक़दीर।