डॉ. प्रियंका सौरभ की कविता- तरक़्क़ी किसके नाम?

कविता

तरक़्क़ी किसके नाम?

डॉ. प्रियंका सौरभ

 

भूख हर एक शाम तक पहुँची,

पर न रोटी ही थाल तक पहुँची।

 

सिंहासन चढ़ते रहे चेहरे सब,

भूख क्यों नीलाम तक पहुँची।

 

आज रोटियों पर पहरे बैठे,

नीति केवल निज़ाम तक पहुँची।

 

जंगल उगते रहे विकासों के,

आग हर एक मकान तक पहुँची।

 

रोशनी बाँटी गई काग़ज़ पर,

रात फिर हर धाम तक पहुँची।

 

शहर चमके तो गाँव बुझते हैं,

धूल ही खेत-खलिहान तक पहुँची।

 

विस्थापित हैं कई ज़िंदगियाँ,

कब दिलासा मकान तक पहुँची।

 

संतोषों का पाठ पढ़ाया गया,

दौलत केवल सलाम तक पहुँची।

 

अमन की बातें बहुत हुईं लेकिन,

जंग हर एक शाम तक पहुँची।

 

अब सवालों का वक्त आ पहुँचा,

चुप्पियाँ कब कलाम तक पहुँची।

 

हक़ की आवाज़ उठेगी जब-जब,

सत्ता काँपे निज़ाम तक पहुँची।

 

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