कविता
चुनाव
अनुपम शर्मा
बरसात आई, मेंढ़क भी आए
मेंढ़कों को जलाशयों में से दुर्गंध आई
चारों तरफ फैला कीचड़ भी नज़र आया
मेंढ़कों के राजा ने सभा बुलाई
इल्ज़ाम किस पर लगाया जाए सब ने तरकीब सुझाई
फिर राजा
प्रजा से माफी मांगने निकला
पश्चाताप और आत्मग्लानि के साथ
बेशर्मों की तरह अपनी कमी को खुद ही बताकर उन्हें दूर करने का वादे के साथ
जब तक प्रचार चला
तब तक बरसात भी चली
फिर क्या हुआ?
बरसात खत्म, प्रचार खत्म।
