बात बेबात
ज्ञान से ज्यादा “घोषणा” में पीएचडी
विजय शंकर पांडेय
विश्व गुरु बनने की दौड़ में हमारी उच्च शिक्षा ने नया मॉडल खोज लिया है—“गलगोटियाइजेशन”! यानी पहले डंका पीटो, बाद में डिस्क्लेमर जारी करो। ज्ञान बाद में, जनसंपर्क पहले।
कभी विश्वविद्यालय शोध से पहचाने जाते थे, अब ट्रेंड से। कल तक जिन संस्थानों का सपना था कि वे #NalandaUniversity की परंपरा को आगे बढ़ाएंगे, आज वे पीआर की परंपरा निभा रहे हैं—“लॉन्च करो, वायरल करो, फिर कहो—हमने ऐसा कब कहा?”
विश्व गुरु की परिभाषा भी अपडेट हो गई है। पहले गुरु शिष्य को सत्य सिखाता था, अब गुरु पहले ‘ओरियन’ सिखाता है और बाद में ‘ओह सॉरी’ पढ़ाता है। शिक्षा का नया सिलेबस कुछ यूँ है—
पेपर 1: कैसे किसी और की टेक्नोलॉजी को मंच पर अपना बताएं।
पेपर 2: सोशल मीडिया पर कम्युनिटी नोट से कैसे निपटें।
‘पुनर्मूषको भव’ की कहावत तो जैसे हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में गूंज रही है—पहले शेर बनो, फिर चूहे की विनम्रता ओढ़ लो।
विश्व गुरु बनने की राह में हम ज्ञान से ज्यादा “घोषणा” में पीएचडी कर रहे हैं। डिग्री हाथ में है, पर विश्व अभी भी पूछ रहा है—“सिलेबस असली है न?”
कभी जमाना था जब बच्चे साइंस प्रोजेक्ट में ज्वालामुखी बनाकर गर्व से कहते थे—“ये हमने बनाया है।” अब एआई के युग में रोबोटिक डॉग मंच पर चढ़ता है और संस्थान कहता है—“ये हमारा है… मतलब… भावनात्मक रूप से हमारा है!”
#galgotiauniversity ने एआई समिट में ‘ओरियन’ नाम से चीनी रोबोटिक डॉग को पेश किया। मंच पर तालियां बजीं, कैमरे चमके, और कुत्ता भी शायद सोच रहा था—“मेरा पासपोर्ट तो देख लो भई!”
फिर अचानक बयान आया—“हमने नहीं कहा कि हमने बनाया।” सोशल मीडिया ने चश्मा साफ किया और बोला—“वीडियो तो कुछ और कह रहा है।” तब एंट्री हुई X के ‘कम्युनिटी नोट’ की, जिसने बड़ी शालीनता से लिखा—“दावा भ्रामक है।”
अब हाल ये है कि रोबोटिक डॉग से ज्यादा एक्टिव इंसान सफाई दे रहे हैं। एआई समिट में असली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तो वही ‘कम्युनिटी नोट’ निकला, जिसने इंसानी याददाश्त रीफ्रेश कर दी।
लगता है अगली बार कोई ड्रोन उड़ता दिखे तो पहले पूछ लिया जाएगा—“भाई, ये सच में तुम्हारा है या सिर्फ फोटो के लिए?”
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