ओमप्रकाश तिवारी की कविता – सत्य, वहम और उपासना

ओमप्रकाश तिवारी की कविता – सत्य, वहम और उपासन

Omprakash Tiwari’s poem: Truth, Illusion, and Worshi

सूरज के चक्कर लगाती है धरती

खोजने वाले को मार डाला उपासकों की टोली ने

नहीं मरा सच न खोज करने वाला

इस सच से ही आगे बढ़ी मनुष्य की सभ्यता

खोजने वाले आज भी खोज रहे हैं सच

पूजने वाले आज भी पूज रहे हैं

सूरज, धरती और पेड़

कविता ओमप्रकाश तिवारी सत्य वहन उपासना

 

कविता

सत्य, वहम और उपासना

ओमप्रकाश तिवारी

 

जब उपासना शुरू होती है

तभी तर्क विलुप्त हो जाता है

आस्था का समुद्र उमड़ पड़ता है

विज्ञान उसमें डूब जाता है

साथ ही खत्म हो जाता है ज्ञान

फिर मनुष्य नहीं रह जाता मनुष्य

हो जाता है उपासक या भक्त

इसका उसका किसी का भी

विज्ञान को फेंक देता है कूड़े में

या स्थापित कर देता है किसी जगह

उस जगह को घोषित कर देता है पवित्र

यह भी कि यहीं से निकलेगा मनुष्य का कल्याण

सूर्य की उपासना क्यों शुरू की होगी मनुष्य ने

अज्ञानता मिटाने या बढ़ाने के लिए?

जो करते रहे उपासना वे पिछड़ गए

जिन्होंने खोज रहस्य वे अमर हो गए

सूरज के चक्कर लगाती है धरती

खोजने वाले को मार डाला उपासकों की टोली ने

नहीं मरा सच न खोज करने वाला

इस सच से ही आगे बढ़ी मनुष्य की सभ्यता

खोजने वाले आज भी खोज रहे हैं सच

पूजने वाले आज भी पूज रहे हैं

सूरज, धरती और पेड़

जगह जगह उगा दे रहे पवित्र स्थल

इसका उसका न जाने किसका

दावा यही करेंगे कल्याण

ऐसे किसी पवित्र स्थलों में नहीं है

बीमारी का उपचार

जहां मिलेगा इलाज

बीमार हैं वे अस्पताल

जहां मिलेगा उपचार का ज्ञान

बदहाल हैं वे स्कूल-कॉलेज

सूर्य ग्रहण खगोलीय घटना है

यह नहीं पढ़ाया जा रहा है

बताया जा रहा है सूरज पूजनीय है

जगह जगह होना चाहिए इनका पूजा स्थल

लोग मर रहे हैं बिना इलाज

गा रहे आरती और चालीसा

उन्हें ऐसा ही बनाया गया है

ताकि वे कर सकें उन पर शासन

बनी रहे उनकी सत्ता और अभिमान

वे स्कूल कॉलेज को समझते हैं बेकार

पाठ्यक्रम में पढ़ाते हैं झूठ और ग़लत सभ्याचार

संस्कृति के नाम पढ़ाते हैं असभ्यता

असंस्कृति को बताते हैं संस्कृति

अराजनीति को राजनीति

वे चाहते हैं लोग बने रहें आस्थवान

किसी न किसी के उपासक या भक्त

ख़ुद को समझते रहें दिन हीन

गाते रहें आरती और चालीसा

सिर नवाते रहें पवित्र स्थलों पर

अपनी जरूरतों के लिए

जीवन के लिए

खुशहाली के लिए

दुख दूर करने के लिए

ताकि कायम रहे उनकी सत्ता

सूरज ही सत्य है

यह सबका है

इसकी धूप सभी की है

सूरज पर नहीं है किसी का एकाधिकार

जो ऐसा जताता है

वही है मनुष्यता का खलनायक

वह कोई जादूगर नहीं है

ना ही अलौकिक है

ना ही अवतारी है

उसके सारे दावे वहम हैं

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