ओमसिंह अशफ़ाक की कविता: भूकंप में बच्चे

कविता

भूकंप में बच्चे

ओमसिंह अशफ़ाक

 

बच्चो,

तुम गा रहे हो अभी भी

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा

झंडियां तुम्हारी कागज की

फड़फड़ा रही हैं अभी भी

हवा के झोंकों के साथ

मलबे के ढेर पर..

गूंज रहा है हवा में समवेत गान तुम्हारा

तुतली ज़बान में तुम्हारी-

**

स्वर तो अमर है

रहेगा शाश्वत सवार ईथर की तरंगों पर

देता रहेगा हमेशा सुनाई

उनको जिनके हो लाडले तुम!

चेहरे तुम्हारे अंकित हैं

उन सबकी आंखों में

तारे थे जिनकी आंख के तुम!..

अनवरत चलती रहेगी

प्रभात फेरी तुम्हारी-

बिना झंडियों के भी

नष्ट हो जाएंगीं जो

मलबे के ढेर में..

**

जीवित रहोगे तुम सदा

यादों में हमारी

सालते रहेंगे तुतले-तुतले बोल..

आएगा जब-जब गणतंत्र दिवस

बैठेंगे हम मन की खिड़की खोल..

नजर आओगे तुम कतारबद्ध जुलूस में

वर्दी पहने स्कूल की

उठाए नन्हे हाथों में

झंडियां तिरंगी

करते होड़ एक दूसरे से

ऊंची फहराने की।

**

बच्चो,

हम गुनहगार हैं तुम्हारे..

तुमने तो किया था विश्वास हम पर सहजवृत्ति से

कि करेंगे हम पुख़्ता इंतजाम

बाल सुरक्षा का।

पर हम तो बोलहंता निकले..

नहीं रहा होगा कोई

ज्ञात-अज्ञात इतिहास में

हमसा कृतघ्न

चिन डाली जिसने रेत की दीवारें

और खड़े किए महल मलबे के

लाज़मी था ढहना जिनका

बिना भूकंप के भी

एक दिन।

**

बच्चो,

तुम्हें भूकंप ने नहीं मारा

कुदरत का कहर भला

तुम पर क्यों टूटता?

सुंदर से फूल थे तुम तो

कुदरत के बगीचे में-

तुमसे कोई प्रतिशोध

हो ही नहीं सकता था।

**

यह तो हम ही थे आत्महन्ता

हवस में धन की जो

रहे खेलते मौत का खेल

बनाते रहे ऊंची अट्टालिका

भरते रहे धन की तिजोरियां

यह सोचकर कि इनमें हमने थोड़े रहना है

और जो रहेंगे उन्होंने भला किसको कहना है,

किसने सुनना है?

कहने सुनने की प्रथा तो

खत्म हो चुकी है यहां

कभी की।

**

बच्चो,

अब मैं क्या सफाई दूं तुम्हें

इस ख़ालिस बेवफाई की

किसे सांत्वना दूं मैं?..

आखिर करे क्यूं कोई यकीन

किसी क़ातिल के बयान पर!…

 

(11.02.2001)

 

(संदर्भ: 26 जनवरी 2001 की सुबह 8.46बजे, गुजरात के कच्छ जिले के भुज शहर में 52वें गणतंत्र दिवस मौके पर आया 7.7 तीव्रता का भूकंप जिसमें गणतंत्र दिवस की प्रभात फेरी निकालते हुए 400 स्कूली बच्चे दीवार के नीचे दब कर मारे गए थे और 12हजार से ज्यादा की जनहानि हुई थी)

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