मुनेश त्यागी की कविता- चाहतें उनकी और हमारी

कविता

चाहतें उनकी और हमारी

मुनेश त्यागी

 

 

हमारी चाहत है,

रोटी, कपड़ा और मकान।

वो चाहते हैं,

हिंदू मुस्लिम पाकिस्तान।

 

करने दो उनको,

खालिस्तान, पाकिस्तान।

हम सब बोलें,

जिंदाबाद हो हिंदुस्तान।

 

वो चाहते हैं,

मिटें सब एकता के निशान।

हम चाहते हैं,

एकजुट हों मजदूर किसान।

 

वो चुप हैं देख कर,

हंसते खिलते हुए रेगिस्तान।

हम चाहते हैं अन्न उगलें

सारे के सारे खेत खलियान।

 

वो चाहते हैं,

सारी जनता रहे परेशान।

हम चाहते हैं,

जनता सारी हो खुशहाल।

 

वो चाहते हैं,

बस्तियां रहें अंधेरी और सुनसान।

हम चाहते हैं,

हट जाये अंधेरा, आ जाये विहान।