समय – समाज
स्क्रॉल करती उंगलियों में उलझी जिंदगी – डिजिटल लत का सच
डॉ रीटा अरोड़ा
अब सड़कों पर सिर्फ लोग नहीं दिखते-झुके हुए सिर और चमकती स्क्रीनें दिखती हैं। ट्रैफिक सिग्नल पर खड़े ड्राइवर, बस में खड़े यात्री, घरों में काम करके बाहर निकलकर आराम करती हुई नौकरानियां, पार्क में बैठी जोड़ी-हर कोई अपनी उंगलियों को स्क्रीन पर दौड़ाता हुआ। कोई रील देख रहा, कोई चैट में खोया, कोई लाइव गेम में। यह दृश्य अब सामान्य हो गया है। यह लत अब वर्ग, पेशा या उम्र नहीं देखती। अमीर-गरीब, पढ़ा-लिखा- अनपढ़, जवान-बूढ़ा-सब एक ही जाल में फंसे हैं। समय नहीं देखते-दिन हो या रात, सुबह की चाय के साथ या रात की नींद चुराते हुए।
यह सिर्फ मोबाइल का उपयोग नहीं है, सोच का ठहराव है। यह एक धीमा जहर है-जो बिना शोर के हमारी उत्पादकता, हमारे रिश्तों और हमारे मानसिक संतुलन को खत्म कर रहा है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हमें यह गलत भी नहीं लगता। एल्गोरिदम हमें जानबूझकर फंसाते हैं। एक रील देखते ही अगली आ जाती है-और हम स्क्रॉल करते चले जाते हैं। एक 14 साल की लड़की अगर डाइट रील देखती है तो एल्गोरिदम उसे और पतला होने, बॉडी शेमिंग और खतरनाक डाइटिंग कंटेंट दिखाएगा। एक नौजवान अगर गेमिंग देखता है तो रात-रात भर गेमिंग और जुआ ऐड्स। एल्गोरिदम आपकी उम्र या कमजोरी नहीं देखता, सिर्फ आपकी आदत देखता है।
आज भारत में इंटरनेट यूजर्स लगभग एक अरब से अधिक हैं। आर्थिक सर्वे 2026 ने साफ चेतावनी दी है-डिजिटल लत युवाओं की मानसिक सेहत, पढ़ाई और उत्पादकता को चूर-चूर कर रही है। स्कूल जाते बच्चे रील्स में खो जाते हैं, ऑफिस जाने वाले कर्मचारी मीटिंग में भी नोटिफिकेशन चेक करते रहते हैं, घर में मां-बाप बच्चों से बात करने की बजाय व्हाट्सएप ग्रुप में उलझे रहते हैं। रिश्ते टूट रहे हैं, लेकिन स्क्रीन नहीं। परिवार की डिनर टेबल अब चुप है-हर कोई अपना फोन देख रहा। दोस्तों से मिलना अब ‘ऑनलाइन’ हो गया है।
यह लत सिर्फ समय की बर्बादी नहीं, यह दिमाग की बर्बादी है। ध्यान भटकता है, नींद चोरी होती है, चिंता बढ़ती है। आर्थिक सर्वे कहता है-सोशल मीडिया की लत एंग्जायटी, डिप्रेशन, कम सेल्फ-एस्टीम और साइबर बुलिंग से सीधे जुड़ी है। 15-24 साल के युवाओं में यह सबसे ज्यादा। गेमिंग डिसऑर्डर नींद छीनता है, आक्रामकता पैदा करता है। बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता (attention span) घटकर 8-9 सेकंड रह गई है। ऑनलाइन जुआ पैसे और जान दोनों ले रहा है। स्ट्रीमिंग और रील्स बिंज-वॉचिंग एक नई बीमारी बन गई है। हम ‘कनेक्टेड’ हैं, लेकिन अकेले। भीड़ में भी अकेले।
सबसे खतरनाक पहलू यह है कि हम इसे ‘प्रोग्रेस’ मान बैठे हैं। स्मार्टफोन हमें ‘स्मार्ट’ नहीं, बेवकूफ (Dumb) बना रहा है। पहले लोग किताब पढ़ते थे, अब स्क्रीन। पहले गप्पें मारते थे, अब इमोजी भेजते हैं। उत्पादकता का ग्राफ गिर रहा है-ऑफिस में फोकस नहीं, पढ़ाई में रिजल्ट नहीं। नौजवान जो देश का भविष्य हैं, वे स्क्रीन के गुलाम बन गए। जरूरत है सख्त नियम की-टीनएजर्स के लिए सोशल मीडिया पर लिमिट, स्कूलों में डिजिटल डिटॉक्स प्रोग्राम, कंपनियों पर जिम्मेदारी कि एल्गोरिदम इतने खतरनाक न बनाएं।
लेकिन असली जिम्मेदारी हमारी है। जब तक हम इसे समझकर नियंत्रित नहीं करेंगे, हम सिर्फ स्क्रॉल करते हुए अपनी जिंदगी बर्बाद करते रहेंगे।
अब सवाल यह नहीं है कि मोबाइल कितना स्मार्ट है, सवाल यह है कि हम कितने सजग हैं।
एक पल ठहरकर सोचिए-क्या आप स्क्रीन को चला रहे हैं या स्क्रीन आपको।
