जयपाल की चार कविताएं -कामरेडों के अंग-संग

जयपाल की चार कविताएं -कामरेडों के अंग-संग

(1)

कामरेड की गठरी

 

ज्ञान की गठरी का पहाड़

जिसे न कभी मार्क्स ने सिर पर उठाया

न लेनिन और न एंगेल्स ने

उसे उठाए घूम रहे हैं कुछ कामरेड

 

(2)

 

कामरेड का संदूक

 

ज्ञान के तालाबंद संदूक को

अपने सिर पर लाद कर चलने वाले

कामरेडों

एक बार संदूक जमीन पर उतार कर भी देख लो

थोड़ी बहुत हवा भी जरूरी है

सिर और संदूक

दोनों के लिए

 

(3)

 

कामरेड की छतरी

 

कॉलेज में

जिन दिनों मार्क्सवाद पढ़ा था

उन्हीं दिनों मैंने जातिवाद की छतरी उतार फेंकी थी

लेकिन छतरी की डंडी हाथ में ही रह गई थी

क्या करें !

छूटती ही नहीं है

काफ़िर मुँह को लगी हुई !

 

 (4)

 

क्रान्तिकारी कविता

 

बादलों के पार कहीं दूर जाकर

जहाँ से लोग तो क्या

धरती भी दिखाई न दे

मैंने लिखी एक विस्फोटक और क्रान्तिकारी कविता

कविता सीधी जमीन से जा टकराई

और राख का ढेर हो गई

——————

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *