गंभीर हमलों का शिकार हो गया है भारत का जनतंत्र और गणतंत्र
मुनेश त्यागी
ना हिंदू खतरे में, न मुसलमान खतरे में
मैं देख सुन रहा हूं, हमारा जनतंत्र खतरे में।
सुप्रीम कोर्ट के जज कहें जरा गौर से देखो
संविधान खतरे में, हमारा गणतंत्र खतरे में।
79 साल पहले जब भारत एक लंबे आजादी के संघर्ष के बाद अंग्रेजी साम्राज्यवाद की गुलामी की बेड़ियों को चकनाचूर करके आजाद हुआ था तो उस समय भारतीय संविधान का निर्माण किया गया था और उसमें बहुत सारे जनकल्याणकारी बुनियादी सिद्धांतों को शामिल किया गया था जिसमें चुनी हुई सरकार, जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, गणतंत्र, समाजवाद, आपसी भाईचारा, न्याय, समता, समानता, बोलने लिखने की आजादी, ससम्मान जीने का अधिकार, धर्म की आजादी, सबको शिक्षा सबको रोजगार, उन्नत खेती, बेहतर मजदूरी, किसानों को फसलों का वाजिब दाम, सस्ता और सुलभ न्याय, आर्थिक समानता और बढ़ती आर्थिक विषमता का विनाश, जीने लायक वेतन और फेयर वेतन, साझी संस्कृति, धर्मांधता का विनाश, ज्ञान विज्ञान की संस्कृति, मीडिया की आजादी, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, सरकारी एजेंसियों की निष्पक्षता और स्वतंत्रता, भारत का स्वतंत्र चुनाव आयोग और जनकल्याण की बुनियादी व्यवस्था स्थापित करने की बात की गई थी और इन सभी बुनियादी सिद्धांतों को संविधान में शामिल किया गया था।
मगर आज आजादी के 79 साल बाद भी जब हम स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से गणतांत्रिक भारत के संविधान के उपरोक्त मूल्यों का आंकलन करते हैं तो हम पाते हैं कि पिछले तीस सालों में और विशेष रूप से पिछले दस सालों में, संविधान के उपरोक्त बुनियादी सिद्धांतों को धराशाई कर दिया गया है और अब वर्तमान सारी व्यवस्था पूरी जनता, किसानों, मजदूरों, छात्रों, नौजवानों, महिलाओं, पिछड़ों, अभावग्रस्तों के जनकल्याण की नीतियों को छोड़कर, हमारी पूरी शासन प्रणाली और पूरा शासक वर्ग, चंद अमीरों के विकास और उनकी मुनाफाखोर साम्राज्य को आगे बढ़ाने की मुहिम में लगा हुआ है और उसका जन कल्याण की नीतियों को आगे बढ़ाने में कोई विश्वास नहीं रह गया है। अब हमारा गणतंत्र गणतंत्र में बदल गया है। भारत के गणतांत्रिक बुनियादी मूल सिद्धान्तों की असली हकीकत इस प्रकार है,,,,,
जनता की सरकार…
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जब भारत का संविधान लागू किया गया था तो उस समय “हम भारत के लोगों” ने एक ऐसी सरकार की कामना की थी कि जो पूरी जनता की, किसानों मजदूरों की, छात्रों नौजवानों की, एससी एसटी ओबीसी यानी सारी जनता के कल्याण के लिए और विकास के लिए काम करेगी। वह उसकी हजारों साल पुरानी गरीबी, शोषण, जुल्म और तमाम तरह के अन्यायों को दूर करेगी और भारत को सबके विकास के मार्ग पर आगे बढ़ाएगी, मगर यह सरकार जो “सबका साथ सबका विकास” के नारे की बात करके ग्यारह साल पहले सत्ता में आई थी, उसने हम भारत के अधिकांश लोगों यानी किसानों, मजदूरों, छात्रों, नौजवानों और महिलाओं के लिए लगभग कुछ भी नहीं किया है और उनकी समस्त आशाओं पर पानी फेर दिया है। आज यह सरकार सिर्फ और सिर्फ सामंतो, पूंजीपति वर्ग और साम्प्रदायिक ताकतों के गठजोड़ की सरकार बन गई है और अब यह अपने चंद पूंजीपति दोस्तों के हितों को ही आगे बढ़ा रही है और केवल उनका ही विकास कर रही है। इस सरकार को किसी भी दशा में जनता की सरकार नहीं कहा जा सकता और इसने जनता, गणतंत्र और संविधान की उन तमाम आशाओं और आकांक्षाओं को धराशाई कर दिया है
सम्प्रभुता…
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भारत के संविधान की प्रस्तावना में संप्रभुता, जनतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, न्याय और आपसी भाईचारे की बात की गई है मगर जब हम संविधान के और सरकार के वर्तमान स्वरूप को देखते हैं तो उसने भारत के गणतंत्र के उपरोक्त मूल्यों को बदल दिया है और उसने जनतंत्र को धनतंत्र में, समाजवाद को पूंजीवाद में और गणतंत्र को चंद देसी विदेशी धन्ना सेठों के साम्राज्य को आगे बढ़ने के संविधान बदल दिया है। अब यह जनता का गणतंत्र नहीं, चंद बड़े पूंजीपतियों का गणतंत्र बनकर रह गया है।
धर्मनिरपेक्षता…
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हमारा संविधान धर्मनिरपेक्षता की बात करता है, मगर पिछले ग्यारह सालों का शासन बता रहा है कि भारत की सरकार का धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों को सुरक्षित रखने और आगे बढ़ाने में कोई विश्वास नहीं है। उसने धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों को पूरी तरह से नकार दिया है। धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के अनुसार भारतीय राष्ट्र और राज्य का कोई धर्म नहीं होगा, हमारा राष्ट्र और राज्य धर्मनिरपेक्ष होंगे, मगर सरकार ने संविधान के इस बुनियादी सिद्धांत को तिलांजलि दे दी है और अब वह अपनी धर्मनिरपेक्ष भूमिका को छोड़कर, धर्मांता के मार्ग पर आगे बढ़ रही है और राजनीति और देश के शासन सुशासन में धर्मांधता का प्रवेश करा रही है।
समाजवाद…
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भारत का संविधान समाजवादी समाज की स्थापना की बात करता है। समाजवादी व्यवस्था पूरे समाज और देश के तमाम लोगों के सम्पूर्ण विकास की बात करती है और उन्हें समाजवाद के मुकम्मल तौर-तरीकों से आगे बढाती है। मगर हम देख रहे हैं कि हमारी सरकार ने समाजवाद के अधिकांश मूल्यों को धराशाई कर दिया है और अब वह सिर्फ और सिर्फ चंद बड़े पूंजीपतियों के हितों को और चंद पैसे वाले के हितों को आगे बढ़ने का काम कर रही है और वह केवल पूंजीवाद और साम्राज्यवाद को बढ़ाने की नीतियों का शिकार हो गई है और वह दिल खोलकर धनतंत्र को आगे बढ़ा रही है। इसका समाजवादी मूल्यों को आगे बढ़ाने में कोई भी विश्वास नहीं है।
आपसी भाईचारा…
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हमारा संविधान जनता के आपसी भाईचारे की बात करता है। यह उसका बुनियादी सिद्धांत है। मगर हमारी सरकार लगातार जनता के अंदर धर्म, जाति और वर्णवादी व्यवस्था को आगे बढ़ाने की बात कर रही है। वह सत्ता में बने रहने के लिए जान पूछकर जनता के आपसी भाईचारे और उसकी एकता को तोड़ रही है और उसके अंदर जातीय और धार्मिक नफरत के बीज बो रही है, जिस कारण आज जनता बेहाल है। वह मानसिक रूप से इतनी तोड़ दी गई है कि वह सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ एकजुट होकर कार्रवाई नहीं कर रही है और वह पूरी तरह से जाती है बंटवारे का शिकार बनकर रह गई है।
स्वतंत्रता …
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हमारा संविधान भारत के हर एक नागरिक को बोलने, लिखने, पढ़ने और यूनियन बनाने की आजादी देता है। मगर हम पिछले कई वर्षों के शासनकाल में देख रहे हैं कि सरकार ने बोलने, लिखने और यूनियन बनाने की आजादी पर भयंकर कुठाराघात किया है। आज सरकार की नीतियों की आलोचना करना एक गुनाह हो गया है। आज सही लिखने पढ़ने और सही आलोचना करने वालों बहिष्कार किया जा रहा है और कुछ को जेल की सींकचों के पीछे भेजा जा रहा है, उनकी जमानत नहीं हो रही है और मजदूरों द्वारा यूनियन बनाना तो जैसे एक अपराध हो गया है। आज मजदूर अपनी यूनियन बनाकर मालिकान की ज्यादतियों का विरोध नहीं कर सकते। जो मजदूर यूनियन बनाते हैं, उनके नेताओं को झूठे केस में फंसा कर जेल भिजवा दिया जाता है और मजदूर नेताओं को मालिक नौकरी से निकाल देते हैं, जिस कारण आज मजदूरों ने डर के मारे,यूनियन बनाना लगभग छोड़ दिया है। अब वे यूनियन बनाने की बात ही नहीं करते और इस कारण उनका सबसे ज्यादा शोषण किया जा रहा है।
ससम्मान जीने का अधिकार…
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हमारा संविधान सभी नागरिकों को ससम्मान जीने का अधिकार देता है। मगर सरकार की जन विरोधी नीतियों के कारण भारत की अधिकांश जनता का, सम्मान के साथ जीने का अधिकार छीन लिया गया है। उसके बुनियादी अधिकार छीने जा रहे हैं, उसके पास रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य का भयंकर अभाव है और सरकार इस अभाव को दूर करने का कोई काम नहीं कर रही है। बस वह दिखावा कर रही है, जिस कारण अधिकांश जनता बुरे हाल में जीने को मजबूर है। सरकार की गलत नीतियों के कारण जनता से ससम्मान जीने का अधिकार छीन लिया गया है।
सबको शिक्षा और रोजगार
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भारत का संविधान सबको शिक्षा और सबको रोजगार देने की बात करता है। आजादी के लगभग 40 साल तक भारत की अधिकांश जनता को सस्ती और लगभग मुफ्त शिक्षा दी गई थी, जिस वजह से गरीब से गरीब आदमी भी अपने बच्चों को पढाने की स्थिति में था। इस वजह से भारत के गरीब लोग भी विकास के मार्ग पर आगे बढ़ सके। मगर आज हालात ये हैं कि छात्रों के अनुपात में स्कूल नहीं हैं, छात्रों के अनुपात में अध्यापक नहीं हैं, सरकार ने हजारों प्राइमरी स्कूल बंद कर दिए हैं, सरकार शिक्षा का बजट लगातार घटाती जा रही है और उसने शिक्षा का निजीकरण करके उसे मुनाफा कमाने का एक जरिया बना दिया है, जिस कारण भारत की अधिकांश गरीब जनता सही शिक्षा पाने के अधिकार से महरूम कर दी गई है।
खेती और मजदूरी
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भारत का संविधान उन्नत खेती और मजदूरी की बात करता है, खेती के विकास की बात करता है, किसानों को उनकी फसलों का उचित और लाभकारी दाम देने की बात करता है, मगर अफसोस की बात है कि वर्तमान सरकार वायदा करने के बावजूद भी भारत के करोड़ों किसानों की अधिकांश फसलों का वाजिब दाम नहीं दे रही है और किसान भयंकर शोषण का शिकार हो रहे हैं। यही हाल मजदूरों का है। भारत का संविधान और अधिकांश श्रम कानून, न्यूनतम वेतन देने की बात करते हैं, मगर आज भारत के 85% मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं दिया जा रहा है। आज उनसे 12-12 घंटे काम कराया जा रहा है, मगर उन्हें ओवरटाइम नहीं दिया जा रहा है और जहां 12 घंटे का ओवर टाइम करने के बाद उन्हें 26,000 रुपए मासिक तनख्वाह मिलनी चाहिए, वहीं हकीकत यह है कि उन्हें 9 से 10 हजार रुपए प्रति मासिक ही दिए जा रहे हैं। और अब तो सरकार ने सारी सीमाएं पार कर दी है और फॉर लेबर कोड्स लाकर मजदूरों को आधुनिक गुलाम बना दिया है। अब सरकार केवल मलिकों के मुनाफे बढ़ाने के अभियान में लगी हुई है।
सस्ता और सुलभ न्याय
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भारत का संविधान सस्ते और सुलभ न्याय की बात करता है। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार वादकारियों को उनके दरवाजे पर न्याय मिलना चाहिए, मगर संविधान के इस बहुत ही जरूरी प्रावधान को भी धराशाई कर दिया गया है। आज हमारे देश में 5 करोड़ 42लाख से ज्यादा मुकदमे अदालतों में लंबित हैं। मुकदमों के अनुपात में न्यायालय नहीं हैं, मुकदमों के अनुपात में बाबू और स्टेनो नहीं हैं, जिस कारण जनता को सस्ता और सुलभ न्याय नहीं मिल रहा है और जनता के लिए सस्ता और सुलभ न्याय, एक दूर का सपना बनकर रह गया है। बहुत परेशान करने वाला एक तथ्य यह भी है कि उत्तर प्रदेश में 26 श्रम न्यायालय हैं जिनमें से 17 श्रम न्यायालय में कई कई साल से पीठासीन अधिकारी नहीं है और वादकारियों के साथ लगातार अन्याय किया जा रहा है और लगातार कोशिश करने और मांग करने के बावजूद भी सरकार पीठासीन अधिकारी नियुक्त करने को तैयार नहीं है।
आर्थिक समानता
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भारत का संविधान आर्थिक समानता की बात करता है और बढ़ती आर्थिक विषमता का विरोध करता है। संविधान कहता है कि भारत की जनता में आर्थिक समानता होनी चाहिए, पैसे का वितरण समुचित होना चाहिए, मगर हकीकत यह है कि आज भारत की अधिकांश जनता गरीब हो गई है। वह अमीरी का शिकार हो गई है और आज आर्थिक असमानता अपने चरम पर है। आज भारत के एक प्रतिशत लोगों के पास भारत के धन का 51% है। और 10% लोगों के पास 90% धन समाहित हो गया है। आज आर्थिक असमानता अपने चरम पर पहुंच गई है। एक हकीकत यह भी है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 85 करोड़ से ज्यादा लोग गरीब हैं। इन्हें गरीबों से निकलना का सरकार के पास कोई चारा नहीं है।
जीने लायक वेतन
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भारत का संविधान जीने लायक वेतन और “फेयर वेजिज” की बात करता है, मगर संविधान के इस बुनियादी सिद्धांत को भी धराशाई कर दिया गया है। आज अधिकांश मजदूरों को यानी 85% मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं मिलता, फेयर वेतन की तो बात ही छोड़ दीजिए।
साझी संस्कृति
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भारत का संविधान “कंपोजिट कल्चर” यानी साझी संस्कृति की बात करता है। उसका कहना है कि भारत की संस्कृति मिली जुली है। यहां के सभी धर्म के लोगों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था, सभी जातियों के लोगों ने, भारत के विकास में भागीदारी की है और उसे आगे बढ़ाया है। मगर सरकार की नीतियां भारत की कंपोजिट कल्चर और साझी विरासत के खिलाफ काम कर रही है। वह जान पूछ कर इतिहास में गलत संशोधन कर रही है और सही इतिहास को बदल रही है ताकि जनता अपना सही इतिहास जानकर भारत को सही रास्ते पर आगे बढ़ाने से असमर्थ हो जाए। इस प्रकार हमारी वर्तमान सरकार ने भारत की साझी संस्कृति को धराशाई कर दिया है। भारत में लगातार सांप्रदायिक ताकतें बढ़-चढ़कर काम कर रही हैं, जनता को हिंदू मुसलमान में बांट रही हैं ताकि जनता की एकजुटता को तोड़ा जा सके और वह एकजुट होकर सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ कोई कार्यवाही ना कर सके।
धर्म …
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भारत का संविधान हर नागरिक को धर्म में विश्वास करने की आजादी देता है और वह सब तरह की धर्मांता, अंधविश्वास, ढोंग और पाखंडों का विरोध करता है। आज हालात इतने खराब हो गए हैं कि धार्मिक अंधविश्वासों को खत्म की बजाय, सरकार लगातार लोगों की ज्ञान वैज्ञानिक की चेतना और संस्कृति पर हमला कर रही है, उसे ज्ञान विज्ञान की संस्कृति से कोसों दूर ले जा रही है और जनता में लगातार धर्मांता, अंधविश्वास, ढोंग और पाखंडों को बढ़ा रही है। जिंदगी में कहीं भी धर्म के दस लक्षणों के निशान नहीं दिखाई दे रहे हैं।
स्वतंत्र मीडिया
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भारत का संविधान स्वतंत्र मीडिया और मीडिया के “चौथे स्तंभ” होने की बात करता है मगर पिछले ग्यारह सालों में सरकार और पूंजीपतियों ने प्रिंट मीडिया और टीवी चैनलों को अपना गुलाम बना लिया है और उनकी स्वतंत्रता पूरी तरह से खत्म कर दी है। आज भारत का मीडिया जनता की बात नहीं करता। वह बेरोजगारी, भुखमरी, शोषण, जुल्म, अन्याय, गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकार की जन विरोधी नीतियों पर वह कोई बात नहीं करता। वह सरकार का गुलाम और पिछलगू बन गया है। वह सरकार की जन विरोधी नीतियों पर कोई चर्चा नहीं करता और उसने विपक्ष के जनवादी, धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और ज्ञान विज्ञान की जानकारी देने वाले लेखकों और कवियों को तो जैसे मीडिया से गायब भी कर दिया है। बहुत सारे लोगों ने तो टीवी की एक तरफा खबरें देखना ही छोड़ दिया है। अब वह “जेबी मीडिया” और “गोदी मीडिया” बनकर रह गया है।
स्वतंत्र न्यायपालिका…
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भारत का संविधान स्वतंत्र न्यायपालिका की बात करता है। मगर आज भारत का शोषक और शासक वर्ग और सरकार, हमारे देश में स्वतंत्र न्यायपालिका का सबसे ज्यादा विरोध कर रहे हैं। वे स्वतंत्र न्यायपालिका के रास्ते में तरह-तरह के अवरोध पैदा कर रहे हैं। भारत की सर्वोच्च न्यायालय के जज का कहना है कि सरकार लगातार जानबूझकर न्यायपालिका की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप कर रही है। सरकार समय से न्यायाधीशों की नियुक्ति नहीं करती, न्यायपालिका का बजट नहीं बढ़ाती, सरकारी, कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं करती और जब-जब न्यायपालिका, सरकार की जन विरोधी नीतियों का, संविधान विरोधी नीतियों का विरोध करती है, उसके खिलाफ फैसले देती है तो सरकार द्वारा भारत की न्यायपालिका पर तरह-तरह के हमले किए जाते हैं। आज सरकार की नीतियों ने आजाद न्यायपालिका के रास्ते में भयंकर अवरोध पैदा कर दिए हैं और स्वतंत्र न्यायपालिका का काम करना जैसे नामुमकिन कर दिया है।
स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसियां
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भारत का संविधान केंद्रीय सरकारी एजेंसियों की निष्पक्षता, ईमानदारी और पारदर्शिता की बात करता है। मगर सरकार की जन विरोधी नीतियों के कारण, सरकारी एजेंसियों की आजादी छीन ली गई है, जैसे एडीसीबी, ईडी, इनकम टैक्स और चुनाव आयोग की निष्पक्षता और स्वतंत्रता खतरे में पड़ गई है। उनकी आजादी छीन ली गई है और सरकार ने इन्हें अपना एक पिछलग्गू और गुलाम विभाग बना लिया है।
जनकल्याणकारी योजनाएं
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भारत का संविधान जन कल्याण की बात करता है। आज हम देख रहे हैं किसानों को फसलों का वाजिब दम नहीं मिलता, मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं मिलता, श्रम कानूनों को लागू नहीं किया जाता, शिक्षा और रोजगार से जनता के बच्चों को वंचित किया जा रहा है, स्वास्थ्य सेवाओं को मुनाफाखोरी का अड्डा बना दिया गया है। जनकल्याणकारी योजनाएं आज दूर का सपना बनकर रह गई हैं।
वैज्ञानिक संस्कृति
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भारत का संविधान जनता के बुनियादी कर्तव्यों में ज्ञान विज्ञान को बढ़ाने, अन्वेषण की संस्कृति को पैदा करने, जनता में विवेक को बढ़ाने और वैज्ञानिक संस्कृति की बात करता है मगर पिछले ग्यारह सालों से एक साजिश के तहत संविधान में लिखी गई वैज्ञानिक संस्कृति पर सबसे बड़ा हमला किया जा रहा है और सरकार जान पूछ कर जनता में अंधविश्वास को बढ़ाने का काम कर रही है। इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह निकल रहा है कि जनता अपनी बुनियादी समस्याओं का विवेकपूर्ण और वैज्ञानिक समाधान ढूंढने की स्थिति में नही रह गई है और उसे लगातार धर्मांधता, अंधविश्वास विश्वास और पाखंडों के जाल में फसाया जा रहा है और वह इसी जाल में फंस कर रह गई है।
शहीदों के सपनों का गणतंत्र नहीं
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रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस आदि ने भारत में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन और आजाद हिन्द फौज का निर्माण किया था जिसमें उन्होंने कामना की थी कि आजादी के बाद भारत में एक गणतंत्र कायम किया जाएगा जिसमें सबको समता, समानता, न्याय, भोजन, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सबके विकास के पुख्ता इंतजाम इंतजाम किए जाएंगे और तमाम तरह के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक शोषण और गैर बराबरी का खात्मा किया जाएगा। इन्हीं सपनों और मूल्यों के लिए, भारत के लाखों स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी जाने कुर्बानी की थीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों के इन्हीं सपनों को भारत के संविधान में शामिल किया गया था, मगर आज के शासक वर्ग ने शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों के उस गणतंत्र का खात्मा कर दिया है।
उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि भारत की वर्तमान सरकार का संविधान के बुनियादी सिद्धांतों में कोई विश्वास नहीं है। वह जनकल्याण की नीतियों में विश्वास नहीं करती। वह किसानों, मजदूरों, छात्रों, नौजवानों, महिलाओं, एससी, एसटी और ओबीसी को विकास के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ाना चाहती। वह सिर्फ और सिर्फ चंद देशी विदेशी पूंजीपतियों और औद्योगिक घरानों के हितों और मुनाफों को बढ़ाने के लिए काम कर रही है, उसका संवैधानिक मूल्यों को और बुनियादी सिद्धांतों को आगे बढ़ाने में और अमल में लाकर धरती पर उतारने में, कोई विश्वास नहीं है और इस प्रकार उसने संविधान को बिना बदले ही, संविधान के मूलभूत सिद्धांतों का खात्मा कर दिया है। यह हमारे शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों का गणतंत्र नहीं है। वर्तमान शासक पूंजीपति वर्ग की जनविरोधी नीतियों ने भारत की गणतांत्रिक व्यवस्था पर सबसे ज्यादा चोट की है जिस कारण भारत की गणतांत्रिक व्यवस्था को आज सबसे बड़ा खतरा पैदा हो गया है। अब भारत की तमाम जनता किसान मजदूर नौजवान छात्र महिलाएं शिक्षित होकर संगठित होकर संघर्ष के मैदान में उतरें और मेहनतकशों की सरकार कायम करें, तभी जाकर भारत के संविधान में दिए गए बुनियादी गणतांत्रिक सिद्धांतों को धरती पर उतारा जा सकेगा और और भारत के जनतंत्र और गणतंत्र की रक्षा की जा सकेगी। हम तो यही कहेंगे-
मजूर आ किसान आ, वतन के नौजवान आ
तुझे सितम की सरहदों के पार अब निकालना है,
ये राह पुर खतरा है पर तुझे इसी पै चलना है
जमाने को बदलना है जमाने को बदलना है।
