आदर्श व्यक्ति, आदर्श शिक्षक और समर्पित योद्धा – बनवारीलाल यादव

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 91

आदर्श व्यक्ति, आदर्श शिक्षक और समर्पित योद्धा – बनवारी लाल यादव

सत्यपाल सिवाच

अध्यापकों और कर्मचारियों के बीच काम करते हुए जिस शख्सियत का मेरे व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा उनमें बनवारीलाल यादव जी प्रमुख हैं। वे हर तरह से अलग से पहचाने जाने वाले व्यक्ति हैं। काम अपने निजी जीवन का हो, परिवार का हो, विद्यालय का हो अथवा यूनियन और समाज का – उनका नियमों का पालन करना, मर्यादा में रहना और पूर्ण समर्पण के साथ अपना अधिकतम देना – मैंने हमेशा उनमें यही पाया।

महेन्द्रगढ़ जिले के नारनौल क्षेत्र के गांव शोभापुर में दिनांक 13 मई 1942 को जन्मे बनवारीलाल बचपन से धीर-गंभीर प्रकृति के रहे हैं। वे बहुत अध्ययनशील, परिश्रमी और सूझबूझ रखने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने एम.ए. बी.एड. तक शिक्षा प्राप्त की और 13 फरवरी 1965 को छह माह आधार पर गणित अध्यापक नियुक्त हो गए। उन दिनों हम पंजाब सरकार के कर्मचारी थे। दिनांक 13 अक्तूबर 1966 को वे नियमित अध्यापक बन गए और 31 मई 2000 को मुख्याध्यापक पद से सेवानिवृत्त हुए।

वैसे तो सन् 1968 की हड़ताल के समय से ही अध्यापक संघ के समर्थक बन गए थे और हड़ताल में शामिल रहे। सन् 1970 में वे सक्रिय रूप से यूनियन के साथ जुड़ गए। बंसीलाल द्वारा थोपी गई तबादला नीति के कारण उन्हें गुड़गांव जिले के पलवल में बदल दिया गया। उस समय वे पत्नी व दो बेटियों सहित वहीं रहते थे। सन् 1973 की हड़ताल से गिरफ्तारी देने का आह्वान हुआ तो बच्चों को पलवल में ही छोड़कर इन्होंने गिरफ्तारी दी। उन दिनों मास्टर सोहनलाल अध्यक्ष व रामदत्त शर्मा महासचिव थे। आन्दोलन का समझौता हो जाने पर तबादला नीति रद्द कर दी गई और बनवारीलाल अपने गृह जिले राजकीय हायर सेकेंडरी स्कूल नारनौल में आ गए।

आपातकाल के बाद हुए चुनाव में 1978 में उन्हें जिला स्तरीय पदाधिकारी बनाया गया। जब 1982 में अध्यापक भवन सम्बन्धी और संगठन में जनवादी कार्यप्रणाली को लेकर विवाद खड़ा हुआ तो बनवारीलाल ने महेन्द्रगढ़ के साथियों के साथ मिलकर गलत रुझानों का डटकर विरोध किया।

वास्तव में तो सन् 1980 से ही गलत प्रवृत्तियां देखकर आवाज उठाने लगे थे। जिसके चलते तत्कालीन नेतृत्व ने महेन्द्रगढ़ जिले की ही उपेक्षा शुरू कर दी। इसके चलते महेन्द्रगढ़ की कमेटी को सोहनलाल ने भंग कर दिया था। यहाँ सदस्य संख्या शून्य थी। सन् 1982 में कुछ और जिलों का साथ मिलने के बाद वे सक्रिय हुए। जब फरवरी 1985 में यूनियन विभाजन को नहीं टाला जा सका तो बनवारीलाल के नेतृत्व में जिले में बिखरे संगठन को सुदृढ़ किया गया। उन्हें पहले संयोजक बनाया गया और विधिवत् चुनाव के बाद लालसिंह यादव को अध्यक्ष और इन्हें जिला सचिव चुना गया। वे सन् 1984 से दिसम्बर 1989 तक जिला सचिव के रूप में कार्यरत रहे। सन् 1990 में उन्हें राज्य कोषाध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया जिसे उन्होंने उच्च दक्षता, ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ निभाया। ये दो बार राज्य कोषाध्यक्ष रहे। इसके अलावा दो बार इन्हें राज्य मुख्य सलाहकार चुना गया।

सर्व कर्मचारी संघ का गठन होने पर इन्हें महेन्द्रगढ़ जिले के संयोजक का उत्तरदायित्व सौंपा गया। सेवानिवृत्त होने पर जब रिटायर्ड शिक्षकों को संगठित करना शुरू किया तो दीवान सिंह जाखड़ को अध्यक्ष और बनवारी लाल महासचिव की जिम्मेदारी दी गई।

ये स्वभाव से नये लोगों को आगे लाने में विश्वास रखते थे। उनके व्यक्तित्व का प्रभाव इतना गहरा था कि विमला यादव, कलावती , सावित्री देवी, कुसुम लता और निर्मला देवी आदि अनेक अध्यापिकाएं आन्दोलन की अगली कतारों का हिस्सा बनीं। इसी दृष्टि से उनकी पारखी नजरों ने हनुमानसिंह यादव, रामपत, अमींलाल, धर्मपाल शर्मा, रोहित गुप्ता, धर्मेन्द्र सिंह, बलबीर सिंह, जयसिंह, बृषभानु शास्त्री, सूबेसिंह जैसे अनेकों समर्पित साथियों का समूह तैयार किया। ये लोग अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा के थे – कोई कांग्रेसी, कोई भाजपा तो कुछ कम्युनिस्ट, एसयूसीआई समर्थक थे, लेकिन वे सभी को साथ लेकर चले और संघ के मंच को दलगत राजनीति से अलग रखा। उन्हें कुछ मुख्याध्यापकों व प्रधानाचार्यों का भी सहयोग मिला। इनमें सत्यनारायण शर्मा, राव प्रभु सिंह और हरदयाल प्रमुख हैं।

बनवारीलाल यादव 1973 की हड़ताल में दस दिन बनारस जेल में रहे और उन्हें निलंबित किया गया। सन् 1987 और 1993 के आन्दोलन में भी अग्रणी पंक्ति में रहे। महेन्द्रगढ़ जिले में सर्वकर्मचारी संघ के निर्माण भी उनकी बेहतरीन भूमिका रही। सन् 1993 में वे सेवा से बर्खास्त कर जेल में डाले गए। उसके बाद वे पदों पर न रहते हुए भी सन् 1997 के पालिका आन्दोलन और 1998 के नर्सिंग आन्दोलन में भी सक्रिय रहे। स्थानीय स्तर पर उन्हें अनेक बार पुलिस हिरासत में लिया गया। शिक्षा विभाग के अधिकारियों की ज्यादती के खिलाफ भी वे डटकर लड़े। एक महिला शिक्षक का गलत तबादला करने पर जिला शिक्षा अधिकारी सरला शर्मा के विरुद्ध मोर्चा लगाया। अन्ततः उन्हें तबादला रद्द करना पड़ा।

बनवारीलाल यादव ने कभी किसी राजनेता अथवा बड़े अधिकारियों की हाजिरी नहीं लगाई। कुछ काम पड़े तो संगठन व संघर्ष के बल पर ही हल करवाए। कर्मचारी नेताओं से सहयोग के रूप में वे एफसीआई के ओमसिंह, बनीसिंह, मास्टर शेरसिंह, हरफूल भट्टी, पिपली निवासी रामेश्वर दास गुप्ता आदि के सहयोग को विशेष रूप से याद करते हैं। उन्हें इस बात का दु:ख है कि कम्युनिस्ट विचारधारा होते हुए भी मंगलसिंह दिलावरी और उनके समर्थकों ने आन्दोलन का विरोध किया। बनवारीलाल जी ने सन् 1996 में हुए नारनौल सम्मेलन के प्रबंध और धनसंग्रह में धर्मेन्द्र यादव आदि का पूरा साथ दिया। वे उन दिनों राजकीय उच्च विद्यालय भूषणकलां में मुख्याध्यापक थे।

परिवार में उनकी पत्नी श्रीमती सरती देवी, बेटा चन्द्रप्रकाश हैं जो दिल्ली पुलिस में है और पौत्र अभिषेक है। पुत्रवधू सुश्री मंजु सुशिक्षित हैं, डबल एम.ए. और बी.एड. हैं। गाय पालती हैं और बहुत व्यवस्थित ढंग से घर को चलाती हैं। बनवारीलाल मेरे जैसे सैकड़ों कार्यकर्ताओं के लिए निष्काम भाव काम करने के आदर्श हैं। (सौजन्य: ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच

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