उद्योगपति परस्त और मजदूर विरोधी चार काले कानू
मुनेश त्यागी
चार काले कानून आए हैं सेवायोजकों को
और अमीर बनाने के लिए,
चार काले कानून आए हैं मजदूरों को
और गरीब बनाने के लिए।
मजदूर कानूनों को बदलने की कोशिश में लगी और बहुत दिनों से कोशिश करती आ रही वर्तमान केंद्र सरकार अपने प्रयासों में सफल हो गई है। उसने 29 केंद्रीय श्रम कानून बदलकर चार श्रम संहिताएं लागू करने की घोषणा कर दी है और सरकार इन कानून को प्रगतिशील और मजदूरों के हित में बता रही है जबकि हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं है। ये चारों काले कानून बिल्कुल भी करोड़ों मजदूर के हित में नहीं हैं।
इन चार काले कानूनों के दुष्परिणाम बहुत भयंकर होने जा रहे हैं। इन कानूनों के लागू होने के बाद कार्य दिवस 12 घंटे का कर दिया गया है, निश्चित अवधि की नौकरी खत्म कर दी गई है, मजदूरों का यूनियन बनाने का अधिकार और उनका हड़ताल करने का अधिकार लगभग खत्म कर दिया गया है। अब मुनाफे के भूखे उद्योगपतियों द्वारा मजदूरों को शोषण और जुल्म की जंजीरों में बंद कर दिया गया है। नौजवानों के स्थाई नौकरी के सपनों का विनाश और खात्मा कर दिया गया है।
प्रधानमंत्री का यह कहना कि ये कानून श्रमिकों से जुड़े सुधारवादी और बहुत प्रगतिशील हैं, बिल्कुल गलत और निराधार हैं। ये समस्त कानून एकदम मजदूर प्रगति विरोधी काले कानून हैं । ये चारों कानून श्रमिकों/मजदूरों को ब्रिटिश कालीन युग में ले जाएंगे।इन श्रम कानूनों ने मजदूरों का कार्य दिवस 8 घंटे से बढ़ाकर 12 घंटे कर दिया गया है, जो किसी भी स्थिति में जायज नहीं है। इन काले कानूनों ने यूनियन बनाना संभव कर दिया गया है, मजदूरों के वेतन बढ़ाने के अभियान और हड़ताल के अधिकार को लगभग असंभव बना दिया है। भारत की जनता और किसानों मजदूरों ने अपनी जान की बाजी लगाकर अंग्रेजों से यूनियन बनाने और हड़ताल करने का अधिकार प्राप्त किया था।
इन चार श्रम कानूनों को लाकर सरकार ने अंग्रेजों को भी पीछे छोड़ दिया है। उसने मजदूरों के साथ खुलेआम धोखाधड़ी करके, इन कानूनों को लाकर मजदूरों को मुनाफे के भूखे पूंजीपतियों का फिर से भयंकर शिकार और गुलाम बना दिया है और उनके पैरों में शोषण और अन्याय की जंजीरें डाल दी हैं। ये चारों श्रम संहिताएं पूरी तरह से मजदूर विरोधी हैं जो मौजूद श्रम सुविधाओं को छीनने वाली हैं। ये चारों श्रम कानून उद्योगपतियों के मुनाफे को बढ़ाने के लिए लाये गए हैं। इन मजदूर विरोधी कानूनों के लागू होने पर मजदूरों को काम पर रखना और निकालना सेवायोजकों के लिए बहुत आसान और मनमाना हो जाएगा। इन कानूनों को लागू होने पर ले ऑफ, छटनी और मिलबंदी के लिए सरकार की इजाजत लेने की जरूरत खत्म कर दी गई है और अब कारखानों में मजदूरों की संख्या 100 से बढ़कर 300 कर दी गई है।
ये कानून कारखानेदारों को इस बात की इजाजत देते हैं कि अब मजदूरों को बड़ी संख्या में बिना मुआवजा दिए और रिटायरमेंट की सुविधा और पेंशन दिए बिना ही नौकरी से निकाला जा सकता है। इन काले कानूनों ने स्थाई नौकरी की व्यवस्था को खत्म कर दिया है। अब मजदूरों को छोटी-छोटी निश्चित अवधि के लिए काम पर रखा जाएगा लेकिन उन्हें लंबी अवधि की मिलने वाली सुविधाओं और सुरक्षाओं से वंचित कर दिया जाएगा। इन परिस्थितियों से स्थाई रोजगार में कमी आएगी और मजदूरों का अस्थाईकरण बढ़ जाएगा जिससे नौजवानों के स्थाई नौकरियों के सपने धराशाई हो जाएंगे। इससे मजदूर किसानों की नौजवान पीढ़ियों का भविष्य बर्बाद हो जाएगा।
इन चारों काले कानूनों के नाम के अलावा, कुछ भी नया प्रगतिशील और लाभदायक नहीं है। इनसे मजदूरों को नई मनमानी और कानूनविहीन नयी जंजीरों में बांध दिया गया है, उनसे सारे प्रगतिशील कानून और अधिकार छीन लिए गए हैं और मजदूरों को गुलामी का नया कानूनीजामा पहना दिया गया है। इनसे मजदूरों का मनमाना शोषण, जुल्म और अन्याय बढ़ेगा, तमाम अमीरों और औद्योगिक घरानों और कारखाना मालिकों का मुनाफा बढ़ेगा।
इन कानूनों के लागू होने के बाद सरकार और पूंजीपतियों की श्रम न्यायालय में भी दखलअंदाजी बढ़ जाएगी। अब श्रम कानून में पीठासीन अधिकारियों की नियुक्तियों में अमीरों और सरकार की दखलअंदाजी बढ़ जाएगी और अब मजदूरों को न्याय से वंचित किया जाएगा और उन्हें अन्याय का शिकार बनाया जाएगा। इससे सेवायोजकों के अन्याय का साम्राज्य बढ़ेगा और ज्यादा मजबूत होगा। इन कानूनों के लागू होने से संविधान की मौजूदगी में, संविधान का खात्मा कर दिया गया है।
यहां पर यह बात भी गौर करने वाली है कि आरएसएस से जुड़ी भारतीय मजदूर संघ यानी बीएमएस को छोड़कर देश के बाकी 10 केंद्रीय मजदूर संघों ने इन कानून का जबरदस्त विरोध किया है और उन्हें तत्काल वापस लेने की मांग की है। इन 10 मजदूर संघों में सीटू, एटक, इनटक, एचएमएस, टीयूसीसी, एसईडब्लूए, आइसीसिटीयू, एलपीएफ और एटीयूसी शामिल हैं
सरकार ने मनवाने एकतरफा और गैरजनतांत्रिक रूप से इन काले कानूनों को बनाया है। यह भारतीय राज्य के कल्याणकारी चरित्र पर सबसे बड़ा हमला है। वर्तमान 29 केंद्रीय कानून को खत्म कर दिया गया है। इनका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ उद्योगपतियों के मुनाफों को बढ़ावा देना है। सरकार ने इन कानूनों को बनाने से पहले इन 10 केंद्रीय मजदूर संगठनों की लगातार कोशिशों के बाद भी उनसे कोई चर्चा और बातचीत नहीं की, उनसे कोई सलाह मशविरा नही किया।
29 श्रम कानून बिल्कुल प्रगतिशील, न्यायिक और मजदूर समर्थक और हितकारी थे। सरकार इन्हें क्यों लागू नहीं कर रही थी, इसका सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। हकीकत यह है कि भारत के 85% मजदूरों को सेवायोजकों द्वारा न्यूनतम वेतन नहीं दिया जा रहा था। दरअसल यह सरकार मजदूर हितकारी नहीं बल्कि पूंजीपतियों की मुनाफाखोरी को बढ़ाने वाली सरकार है। इसलिए इन पूंजीपति हितकारी और मजदूर विरोधी काले कानून को लेकर आई है। अब देश के किसानों मजदूरों नौजवानों और छात्रों के पास केवल एक ही चारा बचा है कि वे एकजुट होकर पूरी ताकत के साथ सरकार की इन मजदूर विरोधी गतिविधियों का मुकाबला करें और सरकार को इन किसानों, मजदूरों और जन विरोधी कानूनों को वापस लेने को मजबूर करें, केवल तभी सरकार और पूंजीपतियों द्वारा थोपी जा रही नई गुलामी, शोषण और अन्याय से छुटकारा पाया जा सकेगा।
अब तो मिलजुल कर
ही टकराने का इरादा है,
नतीजा कुछ भी निकले
आज बगावत का इरादा है।
