पिता और पितृतुल्य

प्रोफेसर शिवकुमार मिश्र के न रहने पर: शोक-पत्र

पिता और पितृतुल्य

ओमसिंह अशफ़ाक

पिता जनवरी में गए और पितृतुल्य जून में चले गए। भौगोलिक दूरी कई सौ मील थी और वक़्ती फ़ासला फ़कत पाँच माह का है। मृत्यु के समय दोनों जगह मैं हाज़िर नहीं था।

फिर मन में ये कसक-सी क्यों है कि दोनों को अभी नहीं जाना था। कम से कम पितृतुल्य को तो 20 साल तक नहीं। बेशक दोनों ने अच्छी उम्र पाई है। कोई 103 बरस या 82 साल कम तो नहीं कही जाती। फिर ये मोह क्यों नहीं छूटता।

पिता ने दिया मुझे पैतृक- डी.एन.ए. और पितृतुल्य ने काव्य । पिता अनपढ़ थे पर सैकड़ों कहावतों, मुहावरों के ज़रिए दुनियादारी का भतेरा ज्ञान हासिल किया था। जीवन में ऐसे मौके भी आए जब अपने अनुभव और तर्क से कचहरी में किसी वकील को भी छका दिया था।

फिर भी मलाल था उन्हें कि वे पढ़ नहीं सके। उनके गाँव में सौ साल पहले भला शिक्षा के महत्व का इल्म कहाँ था? पितृतुल्य जन्में 20 साल बाद तब तक कानपुर पूरब का ‘मैनचेस्टर’ हो चुका था।

छान डाले उन्होंने वेद-शास्त्र-उपनिषद (और भी बहुत से मत-मतान्तर पढ़े-समझे)। खोज लाए संतों-भक्तों की वाणी का सार। और जाँचा-परखा उसे मार्क्सवाद की रोशनी में बारंबार।

इस तरह अज्ञान पीड़ित मानवता का उद्धार किया। उसी के चंद छींटे एक दिन मुझ पर भी आन पड़े और मैं धन्य हो गया! उनके ज्ञान की आँच में वक्त-बेवक्त सिकने लगा और अहिल्या की तरह पाषाण से इंसान बनने लगा।

अचानक तभी वे चल दिए। कुछ कहकर भी नहीं गए। हमें क्या करना है, क्या नहीं करना है, कुछ तो बता जाते? अभी तो सभी कुछ सुनना-सीखना बाकी था। उनकी उँगली पकड़ कर चलने का प्रयास भर ही तो किया था।

अब ये सफ़र कैसे कटेगा। मंज़िल तक कैसे पहुँचेगें। कुछ भी नहीं सूझता। सुना है पुराने वक्तों में ऋषियों-ज्ञानियों की उम्र कई-कई सौ साल हुआ करती थी। क्या अब वैसा नहीं हो सकता था?

आबिद आलमी गए, शमशेर गए, शहरयार गए, ग्रेवाल साहब गए और अब शिव कुमार मिश्र जी चल दिए, जो मेरे पितृतुल्य थे। मुझ हतभागे को छोड़कर, निष्ठुर हो नाता तोड़ गए!

बस! वायदे करते रहे—हाँ, हाँ ज़रूर आएँगे। अरे हाँ, तुम्हारी मिश्राणी अम्मा को भी ले आएँगे.. अभी घुटनों की दिक्कत है.. कम होगी तब आएँगे। मौसम थोड़ा ठीक हो जाएगा..तो आएँगे। कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में कोई कार्यक्रम होगा, तब तो मुलाक़ात होगी ही..!

मगर अफ़सोस! न तो वैसा कोई कार्यक्रम हुआ और न ही मिश्र जी आ पाए। भले उन्हीं घुटनों के साथ सारा देश घूमते रहे। न कभी रुके, न कभी थके। पर मेरे पास नहीं आए। न ही तो आए।

वे भला क्यों आते? मैं कौन हूँ उनका..दस्तक पुत्र?..नहीं। शिष्य भी..नहीं। महज़ एक मुरीद! मुझ जैसे मुरीद उनके, एक ढूँढो हज़ार मिलेंगे।

अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कहाँ से उनको खोजकर लाऊँ। बेहतर होता वे वशिष्ठ नारायण सिंह हो जाते! तब हम उन्हें कहीं से खोज तो लाते—इलाज कराते!

कभी हफ्ता-दस दिन का समय भी नहीं दिया कि बैठकर छाया में उनकी खुलवा लेते ज्ञान की सब पोटली। फिर वे बोलते रहते, किस्से-दर-किस्से खोलते रहते। हम सुनते..सब आरम्भ से अन्त तक और शताब्दियों में संचित ज्ञान का ख़ज़ाना, हमें मुफ्त में मिल रहा होता!

हम होकर मंत्रमुग्ध कभी उन्हें देखते, कभी कबीर, रहीम, रसखान को, उनकी पुतलियों के शीशों पर थिरकते पाते!

काश! ऐसा हो सकता..। वे सिर्फ पितृतुल्य नहीं थे। एक वट वृक्ष भी थे, जिसकी छाया में बैठ कर हम सब पखेरू कल्लोल किया करते थे।

जानता हूँ अब भावुकता से काम नहीं चलेगा। विवेक को संगठित करना ही होगा। कुछ दिन ज़रूर उहापोह में गुजरेंगे। फिर उनकी पोथियों को टटोलूँगा।

जो मुख से उच्चारित नहीं किया, वहाँ ज़रूर लिखा होगा। उम्मीद है कि सारे नाप-जोख, सारे रोड-मैप, पोथियों में सुरक्षित मिल जाएँगे, जो हमें उनके बिना जीना सिखा देंगे और उनके अधूरे छूटे कामों पर हमें लगा देंगे।

फिर उनको पूरा करते-कराते हम भी एक दिन अनन्त यात्रा पर निकल जाएँगे। और हमारे बाद नए लोग आएँगे, जो इस दुनिया को और भी सुंदर बनाएँगे..!

(जुलाई 2013)

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