धर्मेन्द्र यादव – भरोसेमंद, लड़ाकू और संघर्ष की मिसाल

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग -91

 

धर्मेन्द्र यादव – भरोसेमंद, लड़ाकू और संघर्ष की मिसाल

सत्यपाल सिवाच

कभी-कभी जीवन ऐसे मोड़ लेता है जहाँ कुछ लोग टूट जाते हैं, और कुछ लोग तराशे जाते हैं। धर्मेन्द्र यादव का जीवन दूसरा उदाहरण है। हर कठिनाई ने उन्हें मजबूत बनाया, हर संघर्ष ने सजग बनाया और हर हार ने उन्हें फिर से उठ खड़े होने की ताकत दी।

एक परिवार, एक सपना और एक असमय बिछोह

धर्मेन्द्र यादव का जन्म 28 मार्च 1960 को श्री रामचन्द्र यादव और श्रीमती रेशमी देवी के यहाँ महेन्द्रगढ़ जिले के मिर्जापुर बाछौद गांव में हुआ। उनके पिता जी 1958 से 1971 तक अध्यापक रहे। वे नौकरी के दौरान  ही कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय  से सायंकालीन कक्षाओं से एल.एल.बी. की पढ़ाई कर रहे थे। जैसे ही  उन्हें यह डिग्री हासिल हुई तो नौकरी छोड़कर वकालत करने लगे।

लेकिन नियति ने उनके परिवार के लिए एक कठिन परीक्षा तय की थी। 4 सितंबर 1973 को अदालत से घर लौटते हुए पिता की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई। उम्र मात्र 36 वर्ष। उस समय धर्मेन्द्र की उम्र सिर्फ 13 साल थी। घर में बुजुर्ग दादा-दादी, दो बहनें और एक भाई—सिर्फ सात एकड़ जमीन के सहारे माँ रेशमी देवी ने बहुत परिश्रम से पालन पोषण किया और परिवार को संभाला। दादा जी नम्बरदार थे और गांव में उनका काफी सम्मान था, जिसने परिवार को सामाजिक शक्ति भी दी।

पढ़ाई, खेल और पहली जीत

धर्मेन्द्र ने गांव के विद्यालय से दसवीं कक्षा पास की और नारनौल कॉलेज से बी.ए., सतीश बी.एड. कॉलेज, रेवाड़ी से बी.एड. की। पढ़ाई के साथ खेल में भी उनका उत्साह कम नहीं था। बैडमिंटन में स्कूल और कॉलेज स्तर पर चैम्पियन रहे। भाषण प्रतियोगिताओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जिले में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त किया।

27 अप्रैल 1980 को दादा-दादी की इच्छा के अनुसार उन्होंने वैवाहिक जीवन शुरू किया। उनके परिवार में एक बेटी और दो बेटे हैं। इनके दुखों के दिनों और युनियन की गतिविधियों के दौरान पत्नी का बहुत सहयोग रहा।

अध्यापन में योगदान और निरंतर सीख

8 नवंबर 1986 को धर्मेन्द्र यादव की नियुक्ति तदर्थ आधार पर राजकीय उच्च विद्यालय आकेड़ा (नूंह) में एस.एस. मास्टर के रूप में हुई। नियमित अध्यापक आने पर रा.उ.वि. नगीना (फिरोजपुर झिरका) और रा.मा.वि. नांंगल मुबारिकपुर में समायोजन किया गया। दिनांक 01.01.1991 से यूनियन के संघर्षों के चलते सेवाएं नियमित हो गई और उसके बाद रा.उ.वि. गढ़ी रूथल जिला महेन्द्रगढ़ में स्थानांतरण हो गया।

अध्यापन के दौरान उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक से हिन्दी और राजस्थान विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। गढ़ी रूथल, अटेली, कुंजपुरा और नीरपुर विद्यालयों में उनकी सेवाएँ यादगार रहीं।

जून 2013 में वे माध्यमिक विद्यालय के मुख्याध्यापक और अगस्त 2017 में इतिहास प्राध्यापक बने। 31 मार्च 2018 को वे सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त हुए।

यूनियन संघर्ष और नेतृत्व

धर्मेन्द्र यादव ने आरंभ से ही यूनियन गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। 1993 से 2018 तक हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ और सर्वकर्मचारी संघ में तीन-तीन बार अध्यक्ष पद संभाला। एक बार वह अध्यापक संघ में राज्य सचिव भी रहे।

जिस दौर में वे यूनियन में पदाधिकारी बने वह जुझारू संघर्षों का समय था। सन् 1993 के ज्वाइंट एक्शन कमेटी के संघर्ष में ही उन्हें सीधे लड़ाई में उतरने का प्रशिक्षण मिला। वे पंचायती राज के शिक्षकों की लड़ाई में भी सक्रिय रहे।

जिसमें :

  • साढ़े छह हजार शिक्षकों को कम वेतन और पंचायती राज प्रणाली से छुटकारा मिला और पूरे वेतन के साथ शिक्षा विभाग में शामिल किया गया।
  • सर्व कर्मचारी संघ के अध्यक्ष रहते हुए इनके कार्यकाल में ज़िला महेन्द्रगढ़ में 550 पार्ट-टाइम कर्मचारियों को दो वर्षों की लंबी लड़ाई के बाद नियमित किया गया।

संघर्षों के दौरान उन्होंने कई बार धरना, प्रदर्शन, हड़ताल और जेल भरो आंदोलन में भाग लिया।आन्दोलन के दौरान महेन्द्रगढजेल में भी रहे।1993 की हड़ताल के दौरान उन्हें सेवा से बर्खास्त किया गया, लेकिन समझौते के बाद बहाल किया गया।

समाज और किसान आंदोलन

सेवानिवृत्ति के बाद भी धर्मेन्द्र यादव संघर्ष से दूर नहीं हुए। रिटायर्ड कर्मचारी संघ के जिला प्रेस सचिव के रूप में सक्रिय रहे। अखिल भारतीय किसान सभा के बैनर से NHAI द्वारा अधिग्रहीत भूमि का मुआवजा बढ़वाने के लिए 57 दिन तक आंदोलन चलाया।

दादा जी के निधन के बाद 1985 से ही गांव नम्बरदार के रूप में सामाजिक कार्य कर रहे हैं। इस समय सर्वजातीय मंच के अध्यक्ष के रूप में सामाजिक बुराइयों, भेदभाव और अन्याय के खिलाफ लगातार आवाज उठा रहे हैं।

परिवार, संघर्ष और सिद्धांत

आंदोलनों के दौरान परिवार का सहयोग हमेशा उनके साथ रहा। माँ कई बार चिंतित होतीं कि कहीं बेटा मुसीबत में न फंस जाए। यद्यपि 28 अप्रैल 2010 को उनकी मृत्यु हो गई परंतु धर्मेन्द्र के लिए माँ की सीख हमेशा प्रेरणा बनी—“सही के साथ रहो, चाहे अकेले क्यों न रहना पड़े।”

धर्मेन्द्र यादव ने कभी व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनेताओं या अधिकारियों से संपर्क नहीं बनाया। उनका जीवन सिद्धांत स्पष्ट है—न्याय जहाँ खतरे में हो, वहाँ खड़ा होना ही सबसे बड़ी सेवा है।

आज की पीढ़ी के लिए संदेश

धर्मेन्द्र यादव कहते हैं—“संकट सिर्फ पेंशन, रोजगार या वेतन का नहीं है। निजीकरण बढ़ रहा है, समाज को जाति–धर्म के नाम पर बांटने की कोशिश हो रही है। अब पहले से अधिक जागरूक, एकजुट और सक्रिय होना होगा। अन्याय से लड़ना सीखो—क्योंकि लड़ाई से भागना सबसे बड़ा अन्याय है।”

निष्कर्ष: धर्मेन्द्र यादव – एक आंदोलन

उनका जीवन सिखाता है कि संकट हार नहीं, बल्कि संघर्ष का अवसर होता है। पिता की असमय मृत्यु ने उन्हें झुकाया नहीं, गरीबी ने उन्हें रोका नहीं, और संघर्षों ने उन्हें तोड़ा नहीं—बल्कि एक नेता और प्रेरक बनाया। (सौजन्य ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखकः सत्यपाल सिवाच

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