धर्मचन्दः पहले कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद किसानों के हक की लड़ाई

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 90

 

धर्मचन्दः पहले कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद किसानों के हक की लड़ाई

 

सत्यपाल सिवाच

 

पलवल क्षेत्र के घुघेरा गांव में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे धर्मचन्द सरकारी सेवा से रिटायर होने के बाद भी घर नहीं बैठे, बल्कि किसानों को न्याय दिलवाने के संघर्ष के मैदान में डटे हैं। उनका जन्म 8 अप्रैल 1955 को श्रीमती श्यामो और श्री ग्यासीराम के घर हुआ था। वे तीन भाई और तीन बहनें हैं। उन्होंने दसवीं कक्षा शिक्षा प्राप्त की और बिजली बोर्ड में 13.11.1975 को नियुक्त हो गए। वे 30 अप्रैल 2013 को असिस्टेंट फोरमैन पद से सेवानिवृत्त हो गए।

धर्मचन्द अपने यूनियन में सक्रिय होने के कारणों पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि उनके पिता पंचायत सदस्य रहे। उनसे प्रेरित होकर ये शुरू से गलत कामों और तरीकों के विरोधी हो गए थे। उन्होंने दूसरी यूनियन के लोगों के गलत कामों को भी देखा। इसी कारण से वे सन् 1977 में ही यूनियन से जुड़ गए थे। वे बिजली कर्मचारियों की यूनियन में सब यूनिट सचिव और यूनिट कैशियर रहे। बाद में 1993-2013 तक सचिव रहे। वे 1993 से 1995 में सर्वकर्मचारी संघ खण्ड सचिव चुने गए। सेवानिवृत्ति के बाद 2016 से अब (2025) तक अखिल भारतीय किसान सभा के जिला अध्यक्ष हैं।

धर्मचन्द को कोई  देखता है तो उनके कमजोर से शरीर को देखकर उनके भीतर छिपी स्टेनलेस स्टील की मजबूती, जागरूकता और साहस का अनुमान नहीं लगा पाता। वे स्वभाव से शांत, लेकिन संघर्ष में आगे रहने वाले आदमी हैं। सन् 1987 की हड़ताल में उन्हें 13 दिन तक चण्डीगढ़ की बुड़ैल जेल में रखा गया। वे बाद में दो बार फिर जेल गए और पाँच दिन वहाँ रहे। उनके खिलाफ 1993 में एस्मा के तहत केस दर्ज किया गया और उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। जब घर पर नहीं मिले तो पुलिस उनके बेटे को पकड़कर ले गई। सभी प्रकार की उत्पीड़न की कार्रवाइयां समझौते के बाद निरस्त कर दी गईं। सन् 2020-21 के किसान आन्दोलन में रास्ता रोकने पर उनके धारा 307 के तहत मामला दर्ज किया गया जो अब भी चल रहा है।

धर्मचन्द संघर्षों में आना इसलिए भी अच्छा लगा कि इनसे आत्मविश्वास बढ़ता है। व्यक्ति खराब परिस्थितियों से जूझना सीख जाता है। वह कहते हैं कि सर्वकर्मचारी संघ के अनुभव बहुत ही सुखद हैं जिनके चलते राज्य को देश में अग्रणी स्थान मिला है। वे बताते हैं कि परिवार के सदस्य उनके यूनियन में भाग लेने से नहीं रोकते थे। इसके उनके भाई – भतीजे किसान आन्दोलन में स्वयं भी भाग लेते हैं। अभी कुछ दिन पहले एक भाई कर्णसिंह का आकस्मिक निधन हो गया।

वे सन् 1987, 1991, 1993, 1997-98 के आन्दोलनों को खासकर याद करते हैं जब उन्हें मुश्किल हालात में भी डटे रहने का प्रशिक्षण और हौसला प्राप्त हुआ। बिजली क्षेत्र निजीकरण व ठेका प्रथा के खिलाफ लड़ाइयां भी ऊर्जा देती रहीं। उन्होंने सन् 1991 से 2013 तक सभी हड़तालों में भाग लिया। किसान आन्दोलन के चलते इलाके अच्छी पहचान कायम हुई है। अपने इलाके के नेता कर्णसिंह दलाल और रघुवीर सिंह तेवतिया विधायक से सम्पर्क रहे हैं। एक बार भाई और भतीजे की सिफारिश के लिए उनसे मिले थे।  कोई निजी काम नहीं करवाया। पूरे दौर में किसी आला अधिकारी से संपर्क नहीं रहा।

वे बताते हैं कि आज के दौर में स्थिति में बदलाव है। पहले साधनों के अभाव में सभी से तालमेल हो जाता था। अब संपर्क करना तो सरल है लेकिन साथियों की रुचि में कमी दिखाई देती है। बीच में ऐसा दौर भी आया जब लोग आन्दोलन में आने लगे थे। अब जाति और धार्मिक कट्टरता के चलते माहौल बिगड़ रहा है। लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महंगाई जैसे जीवन के सवालों को छोड़कर संकीर्ण मुद्दों पर बंट जाते हैं। ऐसे कठिन समय पर राजनीतिक शिक्षा और जागरूकता पैदा करने की जरूरत है।

परिवार के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि उनका विवाह 19.05.1973 को सुश्री भगवती के साथ हुआ। उनके दो बेटे और एक बेटी है। तीनों बच्चे विवाहित हैं। बड़े बेटे ने बिजली के सामान की दुकान की है और छोटा आउटसोर्सिंग पर बिजली में एएलएम पद पर काम करता है। उनका दृढ़ विश्वास है कि यदि कोई कर्मचारी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी और यूनियन का काम करता है तो उसे लोगों के बीच पूरा सम्मान मिलता है।

13,14 मई 1987 सर्व कर्मचारी संघ हरियाणा की हड़ताल को बंसीलाल सरकार ने पुलिस दमन से कुचलने का प्रयास किया डी सी और एस पी स्वयं पुलिस फोर्स के साथ कार्यालयों में पहुंचे तो बड़ी संख्या में पदाधिकारी भी ड्यूटी पर चले गए परन्तु पलवल मण्डल में हजारों कर्मचारियों में से केवल हम कुछ गिने चुने साथी ही हड़ताल पर रहे 1993 की हड़ताल में भी भजन लाल सरकार द्वारा की गई बर्खास्तगियों के बाद भी ऐसा ही हुआ था। (सौजन्यः ओमसिंह अशफ़ाक )


लेखक- सत्यपाल सिवाच

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