समझदार और समर्पित नेता ऋषिकान्त शर्मा

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग-67

समझदार और समर्पित नेता ऋषिकान्त शर्मा

सत्यपाल सिवाच

ऋषिकान्त शर्मा में संगठन के संस्कार और प्रभाव अपने पिता मदन गोपाल शास्त्री से ही प्राप्त हुए हैं। वट वृक्ष की छाया में पले-बढ़े परंतु  पिता जी की विरासत से अध्यापक नेता नहीं बने बल्कि स्वतंत्र एवं स्वनिर्मित व्यक्तित्व के चलते उपलब्धि हासिल की। उनका जन्म 9 सितम्बर 1956 को हिसार जिले के गांव पेटवाड़ में मदनगोपाल शास्त्री और श्रीमती शशि देवी के घर में हुआ। वे एक बहन और चार भाई हैं। ऋषिकांत भाइयों में सबसे बड़े हैं। उनसे छोटे शिवकांत भिवानी में डॉक्टर हैं, उससे छोटे देवकांत सरकारी सेवा से रिटायर्ड हैं और हिसार में रहते हैं। सबसे छोटे न्यायमूर्ति सूर्यकांत सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस हैं और वे 24 नवम्बर 2025 को देश के मुख्य न्यायाधीश बने हैं। ऋषिकांत ने हायर सेकेंडरी के बाद दो वर्ष का कला अध्यापक डिप्लोमा किया। 14 नवंबर 1977 को अस्थायी रूप में कलाध्यापक नियुक्त हुए  किया। 16 सितंबर 1982 से उनकी सेवाएं दो वर्ष के आधार पर नियमित हुईं। उन्होंने 31 मार्च 2014 को रिटायरमेंट से छह महीने पहले ही ऐच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली।

अध्यापक के रूप में उन्हें “उत्तम शिक्षक सम्मान” से नवाजा गया। ऋषिकांत के पिता मदनगोपाल शास्त्री संयुक्त पंजाब में अध्यापक संघ के अध्यक्ष एवं महासचिव रहे। उन्हीं के प्रभाव से ऋषिकांत 1973 के अध्यापक आंदोलन में छात्रों को हड़ताल के पक्ष में अपने गुरुजनों का साथ देने के लिए प्रेरित करते थे। इस तरह अध्यापक आंदोलन से जड़ने का अनुभव तो उन्हें स्कूली छात्र के रूप में हो गया था। जब 1978-79 में अस्थायी एवं बेरोजगार अध्यापक संघ का गठन हुआ तो उन्हें हिसार जिले का अध्यक्ष बनाया गया। बाद में वे इसके राज्य प्रधान रहे। मुझे सन् 1984 में उनके साथ इस संगठन का महासचिव बनाया गया। जब फरवरी 1985 में व्यक्तिवाद के खिलाफ संघ में विभाजन हुआ तो उन्हें राज्य स्तर पर संगठन सचिव बनाया गया। बाद में 1986 से 1990 और 1992-94 तक वे महासचिव तथा 1990-92 तक अध्यक्ष रहे। तब फिर मुझे भी उनके साथ  महासचिव के रूप में काम करने का मौका मिला। बतौर अध्यापक संघ महासचिव वे सर्वकर्मचारी संघ की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य भी रहे।

ऋषिकान्त शर्मा ने पहले अस्थायी अध्यापकों, 1984 के बाद हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ 1987 से 1994 तक सर्व कर्मचारी संघ के सभी संघर्षो में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। सन् 1991 में वे 14 दिन तक जेल में रहे। सन् 1994 के बाद वे नेतृत्व में नहीं रहे, किन्तु संघर्षों में सेवानिवृत्ति तक भाग लेते रहे। 5 सितम्बर से 30 सितम्बर 1992 तक नांगल चौधरी से चण्डीगढ़ तक 600 किलोमीटर लम्बी पदयात्रा में अनेक विलक्षण अनुभव हुए। उन्होंने 3 अगस्त 2009 से 18 अगस्त 2009 तक कला अध्यापकों और पी.टी.आई. के वेतन संशोधन के आंदोलन में अनिश्चितकालीन अनशन किया, जो 16 वें दिन सफलता मिलने पर समाप्त हुआ। अध्यापक संघ के सहयोग से यह आंदोलन सफल हुआ।

आंदोलन का वह दौर ऐसा था जिसमें संघर्षों की बहुतायत थी व संगठन में गहरा अंदरूनी विमर्श था। ऐसे अवसर अपने सुविचारित, स्पष्ट, पारदर्शी एवं धैर्य के साथ आगे बढ़ने वाले ऋषिकान्त शर्मा को मास्टर शेर सिंह के बाद सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त थी। मेरा दृढ़ विश्वास है कि यदि वे संगठन में सक्रिय रहते तो राज्य में कर्मचारी आन्दोलन के बड़े नेता होते। बाद में रामराय स्थित संस्कृत महाविद्यालय की प्रबंध समिति के अध्यक्ष रहे। जिससे पिछले साल ही स्वेच्छा से कार्यमुक्त हुए हैं। अब वे अपनी पत्नी के साथ गांव में ही रहते हैं। तीनों पुत्र विवाहित हैं और परिवार में पूर्ण समृद्धि हैं। एक बेटा डिस्ट्रिक्ट अटार्नी है, दूसरा हरियाणा पुलिस में डी.एस.पी. और तीसरा नारनौंद में पैट्रोल पंप चलाता है।(सौजन्य: ओम सिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच