कविता
वर्षा
ओमसिंह अशफ़ाक
गरजा घन..
सहमा बच्चा ।
बरसा मेघ..
हर्षा बच्चा ।
भीगा छम-छम..
छमा-छम उल्लसित
कृषक-मन..!
उपजेगा अबकी
प्रचुर-अन्न..!
कटेंगे कर्ज के बंधन-
मिटेंगी सब व्याधि
हटेंगी कई अड़चन..!
लो, फिर गरजा घन..!!
अरे, रे ..वो देखो..
उग आया नखलिस्तान,
आंखों के मरुस्थल में
इसी क्षण..!!
वाह..!
क्या खूब गरजे
प्यारे घन..!
बरसो बार-बार,
करो हरित सिंगार,
मिटे प्यासी-धरती की
तपन..!
लो, फिर गरजा घन..!
बरसा मेघ..
हर्षा बच्चा..
भीगा छम-छम..छम-छम..!!
(21.4.2003)
