ढाई घंटे में दून पहुंचने की जिद!

ढाई घंटे में दून पहुंचने की जिद

 

डॉ सुशील उपाध्याय

 

इन दिनों दिल्ली–देहरादून एक्सप्रेसवे देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। सरकार और मीडिया दोनों ही इसे एक बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि अब दिल्ली से देहरादून की दूरी महज ढाई घंटे में तय की जा सकेगी। इस दावे के साथ उत्साह, गर्व और विकास का विमर्श भी जोड़ा जा रहा है। लेकिन इस चमकदार प्रचार के बीच कुछ बुनियादी सवाल लगभग गायब हो गए हैं। सबसे अहम प्रश्न यही है कि ढाई घंटे में देहरादून पहुंचने की इस सुविधा का असली लाभ किसे होगा और इसकी कीमत कौन चुकाएगा।

फिलहाल, एक्सप्रेसवे का बड़ा हिस्सा खोल दिया गया है और इसके शुरुआती प्रभाव देहरादून शहर में साफ दिखाई देने लगे हैं। जनवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में, जब शनिवार, रविवार और 26 जनवरी, तीन दिन की छुट्टी एक साथ हुई, तब देहरादून और उसके आसपास के पर्यटन स्थलों पर जिस तरह की भीड़ उमड़ी, वह कई दृष्टियों से चिंताजनक रही। यह स्थिति एक तरह का संकेत भी है कि भविष्य में हालात किस दिशा में जा सकते हैं। तर्क यह है कि दिल्ली से देहरादून की यात्रा आसान होने से उत्तराखंड में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। इसमें संदेह नहीं कि पर्यटन उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख आधार है। हर साल दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक यहां आते हैं। कई बार (कुंभ आदि के समय में) तो पर्यटकों की संख्या राज्य की कुल आबादी से भी अधिक हो जाती है। लेकिन पर्यटन के इस विस्तार का दूसरा पक्ष भी है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया गया है।

प्रश्न यह नहीं है कि दिल्ली से देहरादून ढाई घंटे में पहुंचा जा सकता है या नहीं। (इसमें देहरादून के साथ हरिद्वार भी जोड़ लीजिए क्योंकि एक्सप्रेस-वे का एक हिस्सा हरिद्वार को कनेक्ट कर रहा है, भविष्य में ऋषिकेश तक इसका विस्तार संभावित है। तब यहां भी ढाई घंटे में पहुंचने का प्रचार होगा।) असली प्रश्न यह है कि देहरादून पहुंचने के बाद क्या होगा। शहर के भीतर यातायात की स्थिति पहले से ही अत्यंत दबाव में है। उत्तराखंड निर्माण के 25 साल के भीतर देहरादून में पंजीकृत वाहनों की संख्या 4 गुना और आबादी दो गुना से अधिक हो चुकी है, जबकि शहर के भौगोलिक आकार में इसके अनुरूप बदलाव नहीं हुआ।शहर के भीतर कुछ किलोमीटर की दूरी तय करने में घंटों लग जाना अब सामान्य अनुभव बन चुका है। मसूरी में बर्फबारी के पहले सीजन के दौरान देहरादून से मसूरी की यात्रा, जो कुल मिलाकर लगभग 35 किलोमीटर की है, ढाई से तीन घंटे में पूरी हो सकी। यह स्थिति तब है, जबकि अभी एक्सप्रेसवे का पूरा दबाव सामने नहीं आया है। मसूरी के बाद धनोल्टी, चकराता और आसपास के अन्य पर्यटन स्थलों की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। गौरतलब है कि पहाड़ी रास्ते सीमित विकल्प देते हैं, सड़कें संकरी हैं और पार्किंग की व्यवस्था नाकाफी है। ऐसे में जब एक साथ हजारों वाहन इन क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं, तो जाम और अव्यवस्था तयशुदा बात हो जाती है। उत्तराखंड के सरकारी महकमे भी अब यह स्वीकार कर रहे हैं कि एक्सप्रेसवे पर यातायात शुरू होने के बाद देहरादून शहर में जाम की समस्या और गंभीर हो गई है। विशेष रूप से आशारोड़ी क्षेत्र में जहां से मसूरी और हिमाचल की ओर जाने वाला यातायात गुजरता है। आने वाले समय में इसी मार्ग से यमुनोत्री धाम की यात्रा करने वाले वाहनों का दबाव भी बढ़ने वाला है। ऐसा ही हाल हरिद्वार रोड पर जोगीवाला में भी दिखेगा। इसका सीधा अर्थ है कि भविष्य में हालात और अधिक जटिल हो सकते हैं। जो लोग इस उम्मीद में दिल्ली से निकलेंगे कि वे ढाई घंटे में देहरादून पहुंचेंगे, आसपास के पर्यटन स्थल घूमेंगे और शाम तक वापस दिल्ली लौट जाएंगे, उन्हें शायद यह अंदाजा नहीं है कि देहरादून शहर के भीतर ऐसा कोई मार्ग नहीं बचा है, जहां बिना जाम के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुंचा जा सके। शहर में ऐसी कोई समुचित पार्किंग व्यवस्था नहीं है, जहां पर्यटकों के हजारों वाहनों को सुरक्षित रूप से खड़ा किया जा सके और फिर उन्हें सार्वजनिक परिवहन के माध्यम से मसूरी, धनोल्टी या अन्य पर्यटन स्थलों तक भेजा जा सके। यह स्थिति केवल पर्यटकों के लिए ही नहीं, बल्कि स्थानीय निवासियों के लिए भी बड़ी परेशानी का कारण बनने जा रही है। विकास के नाम पर यदि आम लोगों का जीवन अधिक जटिल और तनावपूर्ण हो जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

यह सही है कि देहरादून शहर के भीतर रिस्पना और बिंदल नदियों पर एलिवेटेड रोड तथा आईएसबीटी से हरिद्वार की ओर एलिवेटेड रोड जैसी परियोजनाओं पर काम शुरू हुआ है। लेकिन ये परियोजनाएं कब तक पूरी होंगी, इस बारे में अभी कोई स्पष्ट स्थिति सामने नहीं आई है। अभी सब कुछ शुरुआती चरण में है। जब तक ये योजनाएं धरातल पर पूरी तरह उतरती हैं, तब तक शहर को किस तरह की कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ेगा, इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। इस पूरी स्थिति को और जटिल बनाने वाला एक बड़ा कारक आने वाले समय में दिखेगा। वर्ष 2027 में हरिद्वार में कुंभ मेले का आयोजन होना है। जनवरी से अप्रैल तक कुंभ की भारी भीड़ और उसके तुरंत बाद शुरू होने वाली चारधाम यात्रा का दबाव केवल हरिद्वार तक सीमित नहीं रहेगा। देहरादून, ऋषिकेश, मसूरी और आसपास के सभी पर्यटन स्थल इसकी चपेट में आएंगे।

मसूरी, चकराता और धनोल्टी जैसे पर्यटन स्थलों की धारण क्षमता कितनी है, इस पर अब तक कोई ठोस और तथ्यपरक अध्ययन सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा कि किसी क्षेत्र में एक समय में कितने पर्यटक और कितने वाहन सुरक्षित रूप से आ-जा सकते हैं, तब तक नियोजन अधूरा ही रहेगा। धारण क्षमता से अधिक दबाव न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि पर्यटन के अनुभव को भी नकारात्मक बना देगा। अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि पर्यटकों को सीमित करने की बात विकास विरोधी है और इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर कम होंगे। यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन मूल प्रश्न फिर वही है कि रोजगार किस कीमत पर पैदा किया जा रहा है। यदि रोजगार के नाम पर शहर की बुनियादी संरचना चरमरा जाए, पर्यावरण पर भारी दबाव पड़े और लोगों का जीवन कठिन हो जाए, तो ऐसे विकास और उसके प्रचार की समीक्षा जरूरी हो जाती है।

ढाई घंटे में देहरादून (और हरिद्वार) पहुंचने का नारा यकीनन आकर्षक है, लेकिन यह समझना भी आवश्यक है कि ढाई घंटे में पहुंचने वाले लोग यहां किस उद्देश्य से आने जा रहे हैं। यदि किसी के सामने आपात स्थिति है, तो वह पहले भी हवाई यात्रा के माध्यम से एक घंटे के भीतर दिल्ली से देहरादून पहुंच सकता था। और यदि बड़ी संख्या में लोग केवल मनोरंजन और पर्यटन के उद्देश्य से आ रहे हैं, तो देहरादून जैसे अपेक्षाकृत शांत और घाटी में बसे शहर को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। आने वाले वर्षों में ढाई घंटे वाला स्लोगन और विस्तार पाएगा, इसकी पूरी संभावना है। जैसे ही कर्णप्रयाग तक रेल लाइन शुरू होगी, तब यह कहा जा सकता है कि दिल्ली से ढाई घंटे में देहरादून और वहां से ढाई-तीन घंटे में कर्णप्रयाग पहुंचा जा सकेगा। दिल्ली से जिस दूरी को तय करने में पहले 14 से 15 घंटे लगते थे, तब वह पांच से छह घंटे में पूरी हो सकेगी। निस्संदेह, इसे विकास की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा और लोग उत्साहपूर्वक इसका स्वागत भी करेंगे। लेकिन विकास के इस नए पैमाने के साथ जिम्मेदारी और दूरदर्शिता भी जरूरी है। उत्तराखंड में केवल सड़कों, एक्सप्रेसवे और रेल लाइनों का निर्माण ही पर्याप्त नहीं है। शहरी परिवहन, सार्वजनिक परिवहन, पार्किंग, ट्रैफिक प्रबंधन और पर्यावरण संतुलन जैसे मुद्दों पर समान रूप से गंभीरता की जरूरत है।

फिलहाल, यही उम्मीद की जा सकती है कि देहरादून, मसूरी, धनोल्टी, ऋषिकेश और हरिद्वार के लिए सरकार द्वारा प्रस्तावित अर्बन ट्रांसपोर्ट की योजनाएं अगले कुछ वर्षों में वास्तव में धरातल पर उतरेंगी। यदि ऐसा हुआ तो संभव है कि भविष्य में लोगों को वैसी परेशानियों का सामना न करना पड़े, जैसी परेशानियों का अनुभव जनवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में तीन दिनों के अवकाश के दौरान करना पड़ा।

लेखक -डॉ सुशील उपाध्याय

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