जूझते जुझारू लोग- 65
मजदूर वर्ग के प्रतिबद्ध नायक – आर.सी. जग्गा
सत्यपाल सिवाच
जब आर. सी. जग्गा सर्वकर्मचारी संघ हरियाणा के अध्यक्ष बने तो मुझे उनके साथ महासचिव के रूप में काम करने का मौका मिला। उस दौर के अनेकों ऐसे अनुभव हैं जिन्हें मैं आज भी बहुमूल्य मानता हूँ। हमारी जोड़ी में बेहतरीन समतुल्य क्षमताएं थी। वे अच्छे वक्ता थे, मैं भी अपनी बात ठीक से कह सकता था। वे नपे-तुले शब्दों में लिख सकते थे, मुझे भी लिखने का अभ्यास था। वे राजनीतिक पेचीदगियों को जानते थे, मैं भी घटनाक्रम को मौके नजाकत के साथ पहचान सकता था। वे भी संघर्षशील थे, मुझे भी पीछे झांकने की आदत न थी। ऐसी अनेक बातें कही जा सकती हैं जिनके चलते हमारी टीम अत्यन्त विषम स्थिति में भी आन्दोलन को आगे बढ़ाने में सफल रही। मैं आर. सी. जग्गा की मेहनतकश जनता के लिए संवेदनाओं का प्रशंसक रहा हूँ।
रमेश चंद्र जग्गा को संघर्ष के संस्कार अपने पिता जी से मिले थे। वे स्वतंत्रता सेनानी स्वर्गीय सीताराम जग्गा के सपूत थे। शहीद भगतसिंह और क्रांतिकारियों से प्रेरित होकर छात्र जीवन में सक्रिय हो गए। तब सीता राम जग्गा नौवीं कक्षा में ही थे जब उन्हें मियांवाली जेल में तरह-तरह की यातनाएं दी गई थीं। फिर वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ गए। बाद में उन्होंने “बोल्शेविक” नाम से अखबार निकाला। पिता जी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़े तो बेटा देश के भीतर शासक वर्गों की लूट के खिलाफ लड़ा। उनकी माता जी स्वर्गीय बिमला देवी को भी आजादी से पहले के दौर से ही न्याय के लिए लड़ने के अनुभव थे। उनके घर के द्वार आन्दोलनकारियों के लिए सदैव खुले रहते थे। रमेश का जन्म दिनांक 12.3.1951 को हिसार जिले के हांसी कस्बे में हुआ।
इनका परिवार विभाजन के बाद पाकिस्तान के खानेवाल क्षेत्र से आकर हाँसी में बस गया था। ये दो भाई और एक बहन हैं। उन्होंने बी.एस.सी. और एम.ए. राजनीति शास्त्र तक शिक्षा प्राप्त की। शुरू में छह माह आधार पर राजकीय उच्च विद्यालय सोरखी में विज्ञान अध्यापक नियुक्त हो गए। सन् 1973 के शुरू में अध्यापकों की हड़ताल शुरू हुई उसमें शामिल हो गए और कच्ची नौकरी होने के कारण उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। वास्तव में यह उनके संघर्षों की शुरुआत थी। शुरुआती दौर में ही कामरेड पृथ्वीसिंह गोरखपुरिया के प्रभाव से वामपंथी आन्दोलन में जुड़ गए थे।
बाद में इसी साल वे बिजली बोर्ड में यू.डी.सी. (अपर डिवीजन क्लर्क) के पद पर सेवा में आ गए। उन्होंने सन् 1978 में उषा जी के साथ अन्तर्जातीय विवाह किया। उषा जी ब्राह्मण परिवार में जन्मी हैं।
बिजली में नौकरी लगते ही वे सन् 1973 में पहली बार वे कर्मचारी आंदोलन में दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हुए। सन् 1981 में बिजली की यूनियन के विभाजन के बाद वे प्रगतिशील समूह के साथ सक्रिय हो गए। उनकी पहल पर यूनियन की ओर से “शक्ति स्वर” पत्रिका शुरू की गई। आर.सी.जग्गा इसके मुख्य सम्पादक रहे। उस समय हिसार में बनवारीलाल बिश्नोई, जयपाल सिंह, भूपसिंह बेनीवाल, ओमप्रकाश शर्मा आदि अनेक कार्यकर्ता थे। उन्होंने यूनियन के भीतर शिक्षक, चिंतक और दिशा देने वाले साथियों के रूप में जगह बना ली थी। जब जून 1996 में बनवारीलाल बिश्नोई सेवानिवृत्त हो गए तो जग्गा को संगठन का महासचिव बनाया गया और वे सेवानिवृत्त होने तक इस पद पर रहे।
जब 1986-87 में सर्वकर्मचारी संघ का गठन हुआ तब तक वे राज्य स्तर नेतृत्व में शामिल हो चुके थे लेकिन एक यूनियन से एक ही पदाधिकारी होने के प्रावधान के कारण वे सन् 1997 के फरीदाबाद सम्मेलन में सर्वकर्मचारी संघ के महासचिव चुने गए। सन् 1999 में उन्हें अध्यक्ष बनाया गया। तत्पश्चात् 2001, 2003, 2005 व 2008 में महासचिव चुने गए। इस तरह वे पाँच बार महासचिव और एक बार अध्यक्ष के रूप में मुख्य पदों पर रहने वाले पदाधिकारी रहे।
अन्य विभागों के कर्मचारियों के पक्ष में दो, तीन और कभी-कभी चार दिन की भूख हड़ताल की।
हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसीलाल के कार्यकाल में 1996-97 में एक दिन की हड़ताल का नोटिस देने के लिए उन पर 15 लाख रुपये का जुर्माना हुआ था। हरियाणा में उत्पीड़न का अपनी तरह का पहला मामला बन गया था। वे अपने जीवन में 18 बार जेल गए। जब हिसार में केन्द्रीय कमेटी को गिरफ्तार किया गया तो वे उसमें भी शामिल थे। सन् 1995 में राज्य के कर्मचारियों के लिए अलग वेतन आयोग बनाया गया तो उसके लिए ज्ञापन तैयार करने वाली कमेटी में उनकी मुख्य भूमिका रही।
जग्गा एक कुशल वार्ताकार भी थे। मंत्री, मुख्यमंत्री और अधिकारी उनके लहजे और तर्कों से प्रभावित हो जाते थे। वे अकाट्य तर्कों के साथ अपनी बात रखते; विनम्रता बनाए रखते हुए अपनी बात पर दृढ़ रहते और सैद्धांतिक मामलों में कभी नहीं झुकते थे। उनकी काबिलियत को देखकर उन्हें अखिल भारतीय राज्य सरकारी कर्मचारी महासंघ में अतिरिक्त महासचिव पद पर चुना गया था ताकि हिन्दी भाषी क्षेत्रों में बेहतर काम किया जा सके। अपने संगठन के प्रति प्रतिबद्धता इतनी गहरी थी कि जब उन्हें ऑल इंडिया पर पदाधिकारी बनाने का प्रस्ताव दिया गया तो उन्होंने अपने राज्य के नेताओं से परामर्श के उपरांत ही हाँ कही। सेवानिवृत्त होने पर उन्हें एक टीस थी कि पेंशनर्स को जोड़ कर उनकी ऊर्जा और अनुभवों को समाज के हित में लगाया जाए। उन्हीं की पहल पर हरियाणा में 2012 रिटायर्ड कर्मचारी संघ हरियाणा का गठन किया गया। वे शेष जीवन काल में इसके अध्यक्ष रहे। उन्होंने हिसार में नागरिक मंच में शामिल होकर जनहित के कार्यकर्मों में हिस्सा लिया। वे सेवानिवृत्ति के बाद सीटू में सक्रिय रहे और राज्य उपाध्यक्ष रहे।
वे मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत थे। जब हिसार में धागा मिल को बंद किया गया तो उन्होंने मजदूरों की मदद के लिए संसाधन एकत्रित में समय लगाया। उन्होंने व भूपसिंह ने अपने-अपने घरों से शुरू करके काफी मात्रा में अनाज इकट्ठा किया। सन् 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी की हत्या के बाद सिक्ख विरोधी दंगे हुए तो महाबीर कालोनी साइड से दंगा पीड़ित लोग आते मिले तो भूपसिंह बेनीवाल और जग्गा उन्हें विद्युत नगर डिस्पेंसरी में ले आए। वहाँ भी कुछ लोगों ने विरोध किया तो उन्हें कालोनी में बाबू अमरनाथ जी के घर रखा और उनके लिए दवाइयों व भोजन की व्यवस्था की। स्थिति सामान्य होने पर उन्हें गुरुद्वारे में शिफ्ट किया।
उनके दो बच्चे निजी फर्मों में काम करते हैं। दोनों विवाहित हैं। बड़ा बेटा मुम्बई में है और छोटा फरीदाबाद में। उषा जी भी फरीदाबाद में रहती हैं। उनकी पत्नी भी हिसार में जनवादी महिला समिति की नेता के रूप में कार्यरत थीं। वे जनवादी महिला समिति की राज्य नेता थीं। जग्गा साहब ने हमेशा अपनी पत्नी को कर्मचारियों और महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ने में सहयोग दिया।
वे 31 मार्च 2009 को लेखा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए। उनकी पत्नी श्रीमती उषा लता जग्गा भी एक सरकारी कर्मचारी थीं और उन्होंने हमेशा उनके आंदोलनों में उनका साथ दिया। दिनांक 27 मई 2021 को मात्र 70 वर्ष की आयु में फरीदाबाद के एक अस्पताल में कोरोना से लड़ते हुए उनका निधन हो गया। (सौजन्य ओम सिंह अशफ़ाक)

लेखक: सत्यपाल सिवाच
