ग़दर आंदोलन : जिसने भारत में समता– समानता– बंधुत्व को मानने वाले सभी संगठनों और पार्टियों को दिशा दी

16 नवंबर 2025 करतार सिंह सराभा सहित 7 शहीदों की फाँसी की 111वीं बरसी पर

ग़दर आंदोलन : जिसने भारत में समता– समानता– बंधुत्व को मानने वाले सभी संगठनों और पार्टियों को दिशा दी

कृष्ण नैन

1. उस समय की परिस्थितियाँ

1896–97 और 1899–1900 में पंजाब ने भयावह अकाल झेला। पशुचारे की कमी, मनुष्यों–पशुओं की भारी मृत्यु और फसल न होने पर भी स्थिर लगान—इन सबने किसानों को तोड़ दिया।

1897–1905 के दौरान पंजाब में प्लेग का प्रकोप बाकी देश की तुलना में चार गुना अधिक विनाशकारी था। इसके साथ ही हैजा और चेचक ने स्थिति और भयावह कर दी।

कर्जदारी, शोषक जमींदारी व्यवस्था, बढ़े हुए कर, महँगी खाद्य सामग्री और दस्तकार–बुनकरों की बेरोज़गारी ने जनता की कमर तोड़ दी।

1905 में बंग-भंग ने उग्र राष्ट्रवाद को नई दिशा दी।

1907 में पंजाब का पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन (अजीत सिंह, लाला लाजपत राय) भूमि-क़ानूनों और ज़मीन की नीलामी के खिलाफ़ गुस्से का प्रस्फुटन था।

इस व्यापक बदहाली के चलते देश के भीतर (बंगाल, बिहार, असम, महाराष्ट्र) और विदेशों में बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। पंजाब के मज़दूर-सरदार इसी कारण हर जगह पहुँचे। आजकल भी बेकारी का यही आलम हैं।

अमेरिका में लगभग 7,000 और कनाडा में 4,000 भारतीय सिर्फ दस वर्षों में पहुँचे थे।

आजकल की तरह ही तब भी प्रवासी पलायन को रोकने के लिए 1908–1912 के दौरान भारतीय प्रवासियों को अमेरिका–कनाडा में नस्लभेद, जमीन खरीदने पर रोक, व्यवसाय खोलने की सीमाएँ, परिवारिक पुनर्मिलन पर प्रतिबंध और Continuous Journey Regulation (1908) जैसी सख्त नीतियों का सामना करना पड़ा। इससे भारतीयों में गहरा आक्रोश पैदा हुआ।

बिना जहाज बदले लगातार यात्रा कर कनाडा पहुंचने का बेतुका कानून क्यों बनाया था?

नस्लभेद, भारतीय श्रमिकों के सस्ते श्रम से स्थानीय श्रमिकों की नाराज़गी, भारतीयों में उभरती राजनीतिक चेतना का डर, और फ्रांसीसी–रूसी क्रांतियों के असर का भय—ये सब कारण इस नीति के पीछे थे।

कनाडा और भारत दोनों ब्रिटिश उपनिवेश थे और भारत सचिव की सिफ़ारिश पर ही 1908 का प्रतिबंध लागू हुआ था।

विदेशों में राजनीतिक चेतना का प्रसार

भारतीयों ने आर्थिक–सामाजिक शोषण के खिलाफ विदेशों में भी आवाज़ उठानी शुरू की।

उस समय की प्रमुख पत्र-पत्रिकाएँ जो जनजागरण का काम कर रही थीं—

1907 : रामनाथ पुरी – सर्कुलर-ए-आजादी

तारकनाथ दास – बैंकुवर – फ्री हिंदुस्तान

डी. डी. कुमार – स्वदेश

1910 में भारतीय सेना से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का आह्वान हुआ—अंग्रेजी सत्ता की जड़ ही सेना थी, इसलिए 1857 को दोहराने की पुकार तेज हो चुकी थी।

सबसे अहम भूमिका : लाला हरदयाल

1911 में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय (सैन फ्रांसिस्को) में प्रोफेसर रहते हुए उन्होंने खुले तौर पर सशस्त्र क्रांति का आह्वान किया।

1912 में दिल्ली में वायसराय लार्ड हार्डिंग पर हमले का उन्होंने खुला समर्थन किया और क्रांतिकारी गतिविधियों को बढ़ाने का आह्वान करते हुए अमेरिका से लेकर एशिया तक प्रचार किया।

उन्होंने 1913 में पोर्टलैंड में हिंदी एसोसिएशन ऑफ पैसिफ़िक कोस्ट की स्थापना की और मलय, हांगकांग सहित कई उपनिवेश-विरोधी समूहों को जोड़ा।

1913 : ग़दर पार्टी का गठन

21 अप्रैल 1913 : सेंट जॉन्स, ऑरिगन में प्रारम्भिक सम्मेलन हिंदुस्तान एसोसिएशन ऑफ पैसिफिक कोस्ट पार्टी बनीं।

25 जुलाई 1913 : सैन फ्रांसिस्को में आधिकारिक गठन

अध्यक्ष – सोहन सिंह भकना

सचिव – लाला हरदयाल

1 नवम्बर 1913 : ग़दर साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन (गुरुमुखी, उर्दू, हिंदी आदि में)

ग़दर पत्र खुले तौर पर सशस्त्र विद्रोह का आह्वान करता था।

क्रांतिकारी कविता संग्रह ग़दर की गूंज ने पूरे प्रवासी समाज में जोश भर दिया।

इसी लोकप्रियता के कारण संगठन का नाम ग़दर पार्टी और इसके सदस्य ग़दरी बाबा कहलाए।

विद्रोह की रणनीति को भारत तक पहुँचाने के लिए अनुशीलन समिति, रूस के गुप्त संगठनों और एशिया के कई देशों से संपर्क बढ़ाया गया।

25 मार्च 1914 को लाला हरदयाल गिरफ्तार हुए, परंतु बाद में यूरोप पहुँच गए।

ग़दर का तत्कालीन कारण : कामागाटा मारू प्रकरण (1914)

Continuous Journey Regulation की शर्तों को चुनौती देने के लिए हांगकांग के व्यापारी सरदार गुरदित्त सिंह ने कामागाटा मारू जहाज किराए पर लिया।

376 यात्री (114 सेवानिवृत्त भारतीय सैनिक सहित) 4 अप्रैल 1914 को रवाना होकर 23 मई को बैंकुवर पहुँचे।

दो महीने तक समुद्र में रोके जाने, राशन–ईंधन देने से इनकार, और स्थानीय भारतीय समर्थकों को रोकने की कोशिश ने इस घटना को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना दिया।

स्थानीय डॉ. विल्की ने प्रयास किया और सिर्फ 24 यात्रियों को उतरने दिया गया।

24 जुलाई को जहाज वापस भेज दिया गया।

27 सितम्बर 1914 को कलकत्ता (बजबज) पहुँचने पर अंग्रेजों ने यात्रियों को गिरफ्तार करने की कोशिश की। विरोध होने पर गोली चलवाई गई—28 लोग मारे गए, बाकी को लंबी सज़ाएँ दी गईं।

1914–1915 : युद्ध और विद्रोह की योजना

प्रथम विश्वयुद्ध शुरू होते ही ग़दरियों ने भारत लौटकर सशस्त्र क्रांति की तैयारी की।

करीब 8,000 से अधिक मजदूर–प्रवासी हथियार, धन और साहित्य लेकर भारत पहुँचे।

कई गिरफ्तार हुए, परंतु करतार सिंह सराभा जैसे युवाओं ने भूमिगत रहकर काम जारी रखा।

21 फरवरी 1915 : ग़दर षड्यंत्र

ब्रिटिश भारतीय सेना में व्यापक बगावत की योजना बनी।

लाहौर, फिरोज़पुर, मियांमीर, मेरठ आदि छावनियों में सहमति बन चुकी थी।

लेकिन कर्नल बेकन और किरपाल सिंह की मुखबिरी से योजना पकड़ी गई।

सैकड़ों गिरफ्तार हुए और लाहौर षड्यंत्र केस -1 चला।

16 नवम्बर 1915 को 19 वर्षीय करतार सिंह सराभा सहित 7 ग़दरियों को फाँसी और 14 को काला पानी की सज़ा दी गई।

1916–1947 : आगे का ग़दरी संघर्ष

1917–18 में अमेरिका में “Hindu–German Conspiracy Case” चला।

कई ग़दरियों को सज़ाएँ मिलीं।

1919 के बाद सोवियत रूस, अफ़गानिस्तान और भारत में क्रांतिकारी संगठनों से ग़दरियों का तालमेल बढ़ा।

1920 के दशक में किरती किसान पार्टी व भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के साथ गहरा संबंध बना।

1923–24 में अमेरिका में ग़दर पार्टी का पुनर्गठन हुआ।

1930–40 के दशक में कई ग़दरी कांग्रेस, समाजवादी और कम्युनिस्ट आंदोलनों में सक्रिय हुए।

एक भी ग़दरी RSS में नहीं गया—वे उसे ब्रिटिश समर्थक और जनविरोधी संगठन मानते थे।

स्वतंत्रता के बाद कई ग़दरी भारत लौटे, जिनमें भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह भी शामिल थे।

अमेरिका–कनाडा में ग़दर स्मारक हॉल स्थापित हुए, जो आज भी मजदूर–किसान के हक़ों और मानवता के पक्ष में वैचारिक कार्य करते हैं।

ग़दर आंदोलन : भारत में असली क्रांतिकारी चेतना की पहली लौ

 

ग़दर आंदोलन ने भारत को वह पहला संगठित ढाँचा दिया जिसमें

समता, समानता, बंधुत्व, लोकतंत्र और मानव कल्याण को क्रांति का आधार माना गया।

बाकी संगठन जहाँ अतीत से प्रेरणा लेते थे, वहीं ग़दरी

वर्तमान मजदूर–किसान के दर्द, शोषण और प्राकृतिक न्याय को क्रांति का मूल आधार मानते थे।

इन्हीं की प्रेरणा से भगतसिंह और साथियों ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाई और अंग्रेज़ी सत्ता की नींव हिलाई।

इन्हीं की वैचारिक विरासत से भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन आज भी जनसंघर्षों और मानवाधिकारों का अग्रिम वाहक बना हुआ है।