जसवीर त्यागी की स्त्री केंद्रित कविताएँ
यह दुनिया स्त्री के प्रेम की ऋणी रहेगी
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वह स्त्री बेख़ौफ़ एक छोर से दूसरे छोर तक
रोज चलती है
घर-गृहस्थी की बंधी दिनचर्या की रस्सी पर
वह स्नेह का शहतीर है
जिस पर टिकी हैं संबंधों की कड़ियाँ
वह जब थक जाती है
और खोलना चाहती है रस्सियाँ
कुछ ही देर बाद रस्सी खुद-ब-खुद
उसके पैरों की ओर सरकती हुई
जकड़ लेती है उन्हें
वह कुछ समय बचाकर
रखना चाहती है अपने लिए भी
महसूस करना चाहती है प्रेम और सुकून भरे पल
जब भी वह अपने एकांत संग होती है
गृहस्थी का कोई काम
हाथ पकड़कर अलग कर देता है उसे
बच्चों की फरमाइशें
खींचने लगती हैं उसे अपनी ओर
भूलकर अपने हाथ-पैरों का दर्द
भरती रहती है सबके
ख्वाहिशों के खाली पात्र
सच्चे समर्पण और त्याग की भावना से प्रेरित होकर निभाती है पत्नी,माँ,नारी
और सदगृहस्थ होने का धर्म
वह अपने प्रेम की रोशनी से जगमग करती है
घर का एक-एक अंधेर भरा कोना
प्रेम पर बड़े-बड़े प्रवचन देने वाले पंडित भी
पकड़ नहीं सकते उसका प्रेम
प्रेम के महत्त्व पर
भारी भरकम ग्रन्थ लिखने वाले विराट विद्वान भी
जान नहीं पाते उसकी प्रेम-पीर
ऐसी स्त्रियाँ ही बचाकर रखती हैं पृथ्वी पर प्रेम
यह दुनिया जब तक रहेगी
एक स्त्री के प्रेम की ऋणी रहेगी।
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उत्तर
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एक बीमार स्त्री से
मैंने उसकी तबियत के बारे में पूछा
मेरे सवाल पर
वह कुछ देर मौन रही
मैंने अपने शब्दों को
पुनःउसके पास भेजा
वह बोली-
आजकल जेठ माह की
आग बरस रही है
तीन-चार गेंदे
और कढ़ी पत्ता के पौधे सूख गये हैं
जबकि मैं तो सुबह-शाम
उनका ख्याल रखती हूँ
मेरे सवाल का उत्तर
उस स्त्री ने
कुछ इस अंदाज में दिया।
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मृत
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पुरोहित ने कहा-
वह मृत है
उनसे जुड़ी हर चीज
बेजान और बेकार है
उन्हें अब घर में रखना
अमंगलकारी है
विधवा स्त्री
सिर झुकाये
सब सुनती रही खामोश
इस तरह
एक पुरुष के साथ-साथ
एक स्त्री भी विदा हुई संसार से
लेकिन! उसका विदा होना
अनदेखा रहा।
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नींद
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घर के कामों से थककर
दिन में ही कभी-कभी
उसे हल्की-फुल्की नींद आ जाती है
जरूरी काम होने पर भी
मैं उसको जगाता नहीं
सोता हुआ इंसान
मुझे कोई फरिश्ता लगता है
आँख खुलने पर
वह कहती है-
अरे!आपने मुझे जगाया नहीं
कितना काम अभी बाकी है
कहती हुई वह काम में लग जाती है
उसकी हल्की-सी नींद
मुझे भारी सुकून से भर देती है।
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मन की बात
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वह बोली-
आपकी कविताएँ बहुत काम आती हैं
मन में कोई बात आये
तो हर भाव मिल जाता है
मैंने पूछा-
मन में क्या भाव आता है?
उसने कहा-
मैंने कवि मन नहीं पाया
कहकर वह चली गयी
उसके जाने के बाद
मैं देर तक उसके मन के भावों तक
पहुँचने का प्रयास करता रहा
कुछ हाथ नहीं आया
मैं एक पुरुष
मुझे स्त्री होना नहीं आया।
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करुणा
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किडनी रोग से ग्रस्त
बच्चे के बारे में
बात करते-करते
माँ का गला भर आता है
बोलते-बोलते रुक जाती है
शब्द मौन हो जाते हैं
माँ चाहकर भी
कुछ बोल नहीं पाती
उस समय
उसकी आँखें बोलती हैं
और बोलती आँखों को सुनने के लिए
कान नहीं,करुणा चाहिए।
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सम्मान
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महिला दिवस के आयोजन में
नेता जी ने महिलाओं के पक्ष में
भारी-भरकम भाषण देते हुए कहा-
स्त्री जननी है
पालनहार है
प्रगति का द्वार है
सुंदरता का आधार है
महिला दिवस पर
हमें महिलाओं का सम्मान करना चाहिए।
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चित नहीं लगता
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एक स्त्री ने कहा-
संसार में चित नहीं लगता
यह कहकर
वह खामोशी हो गयी
यह बात उस स्त्री ने
सदियों पूर्व मुझसे कही थी
उसके बाद
अनेक सदियां आयीं और गयीं
स्त्री के चित में
कोई बदलाव नहीं आया
जैसे समाज की सोच में
स्त्री के लिए कोई परिवर्तन नहीं आया
जब भी
किसी स्त्री से मिलता हूँ
उसके बताए बगैर ही समझ जाता हूँ
संसार में
एक स्त्री का चित क्यों नहीं लगता?
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दर्द
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उसके पैरों में दर्द था
फिर भी हर काम करती रही
मुझे वह कुछ ठीक नहीं लगी
पूछने पर बताया-
पैरों में दर्द है
मैंने उलाहना देते हुए कहा-
मुझे अपना समझती तो बताती
मैं हाथ बँटा देता
वह सहजता से बोली-
अपना समझती हूँ
तभी तो बताया नहीं आपको।
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पर्यायवाची
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एक स्त्री को
कितने सारे काम-काज पुकारते रहते हैं
एक पूरा होता नहीं
दूसरा पहले से ही
पंक्ति में खड़ा मिलता है
स्त्री हार नहीं मानती
सारे कामों को निपटाती हुई
विजय-पथ पर आगे बढ़ती है
कभी-कभी लगता है
स्त्री और काम पर्यायवाची हैं।
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प्रेरणा
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वह घर में काम करती है
स्कूल में पढ़ाती है
खेत में काम करती है
वह पशु-पक्षियों के लिए
अन्न-पानी का इंतजाम करती है
आने वाली बारिश की संभावना को देखते हुए
वह घर की छत में पड़ी दरारों में
सफेद सीमेंट भरती है
कम्प्यूटर-कार चलाती है
किसी जरूरतमंद की सहायता
करने में
वह सदा अग्रिम पंक्ति में खड़ी मिलती है
वह स्नेहमयी
ममतामयी
करुणामयी
कर्म-जननी है
नित नया इतिहास रचती है
प्रेरणा की पुस्तक में
वह नया पाठ रचती है।
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|| कामगार स्त्री ||
वह सुडौल कामगार स्त्री
शिशु को साथ लेकर
आती है काम पर
ठेकेदार चार बात सुनाता है
शिशु को देखकर
नाक भौं सिकोड़ता है
स्त्री के प्राण शिशु में बसते हैं
ठेकेदार स्त्री को अकेली देखकर
फेंकता है प्रेम का पासा
मौका पाकर करता है चुहलबाजी
और अहसान जताता है
उसी के रहमोकरम पर
मिल रही है स्त्री को रोज की दिहाड़ी
अपने काम में डूबी स्त्री
रहती है मौन
ठेकेदार उसके मौन को
स्वीकृति समझता है
कामगार स्त्री
सब जानती-समझती है
ईंट,रेत,मिट्टी,पानी का गुण
ठेकेदार की चालाकियों से ज्यादा
उसे अपने शिशु की
नींद की चिंता सताती है।
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|| एक स्त्री की जिंदगी ||
एक स्त्री ने अपनी आधी से ज़्यादा उम्र
लिख दी एक पुरुष के नाम
उस पुरुष को सहेजने-संवारने
खुश रखने और प्यार कर
एक सफल मानुष बनाने में ही
टोह ली अपने जीवन की सुख-सार्थकता
रात-रात भर जागकर तकती रही राह
करती रही उसकी नींद और सपनों की रखवाली
भूखी-प्यासी रहकर
मांगती रही उसकी सलामती
और दीर्घ आयु की दुआएँ
पुरुष जीवन-मझधार में
स्त्री को अकेला छोड़
निकल पड़ा अनंत यात्रा पर
मृत हैं जिसकी घर वापसी की संभावनाएं
स्त्री की बची-खुची
जिन्दगी जो शेष है
वह कटेगी काँपती-हाँफती
किसी शून्य को निहारती
अकेला छोड़कर गये पुण्य-पुरुष की
अनमोल स्मृतियों को सहेजती-संभालती।
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सुंदर
शब्द तो सबके पास होते हैं, लेकिन उन्हें एहसासों में ढालना हर किसी के बस की बात nahi
ये कविताएँ एक स्त्री के जीवन के अनंत त्याग, समर्पण और उसके कठिन संघर्ष को बेहद खूबसूरत तरीके से बयान करती हैं।
घर-गृहस्ती की जिम्मेदारियों के बीच अपनी हर खुशी और ख्वाहिश को पीछे छोड़ने वाली नारी के दर्द को सर आपने बहुत ही गहराई से दिखाया है।
हर एक पंक्ति सीधे दिल को छू लेती है और मन को पूरी तरह भावुक कर देती है।
इन्हें पढ़कर यह अहसास होता है कि यह दुनिया सचमुच एक स्त्री के प्रेम और उसके बलिदान की हमेशा ऋणी रहेगी।
जीवन की सच्चाई और ममता को दर्शाती हुई यह एक बेहद मर्मस्पर्शी और शानदार रचना है।
यह दुनिया स्त्री के प्रेम की ऋणी रहेगी,मृत,कामगार स्त्री और एक स्त्री की जिंदगी जैसी कविताएं स्त्री जीवन के अन्तर्वृत्तियों का गहरे स्तर पर पड़ताल करती है।