हरियाणाः जूझते जुझारू लोग- 122
सत्यपाल नरवत – कर्मचारी से किसान नेता बनने का सफर
सत्यपाल सिवाच
फरीदाबाद जिले में सत्यपाल नरवत ने बिजली कर्मचारी के रूप में संगठन में काम करना शुरू किया और धीरे धीरे उनकी पहचान किसान नेता के रूप में स्थापित हो गई। उनका जन्म 20 जुलाई 1962 को फरीदाबाद के खेड़ी कलां गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ। माँ श्रीमती सागरदेवी और पिता श्री ब्रह्मजीत नरवत ने खेती करते हुए अपने तीनों बेटों को सरकारी नौकरी में लगवा दिया। एक भाई पहले एयरफोर्स में था और वहाँ आकर अध्यापक बना। दूसरा पोस्ट एंड टेलीग्राफ से रिटायर हुआ और ये बिजली कर्मचारी बने। इनकी चार बहनें हैं।
सत्यपाल ने 1978 में दसवीं करके आईटीआई से ड्राफ्ट्समैन में दो वर्षीय डिप्लोमा किया। ये 24 मार्च 1983 को पानीपत थर्मल में जूनियर ड्राफ्ट्समैन भर्ती हो गए और 1984 में फरीदाबाद आ गए। दिनांक 30 जुलाई 2020 को चीफ ड्राफ्ट्समैन पद से सेवानिवृत्त हुए। वे नौकरी में आने थोड़े समय बाद ही एच.एस.ई.बी. वर्करज यूनियन से जुड़ गए थे।
यद्यपि सालों तक समर्थक के रूप में ही रहे। सन् 1992 से 1998 तक यूनिट ऑडिटर और यूनिट कैशियर पद रहे। 1999 से 2016 तक यूनिट में सचिव/कैशियर का कार्यभार संभाला और 2016 से 2020 तक राज्य उपप्रधान रहे। वे संगठन पर भरोसा करने के चलते सक्रिय हुए और महसूस किया कि संगठन ही लोगों अन्याय और ज्यादतियों से बचा सकता है। साथ ही संगठन में काम करने से प्रतिष्ठा भी बढ़ती है। त्याग भाव, संतोष और संयम जैसे गुण भी यूनियन से मिलते हैं।
सत्यपाल नरवत का सीधी-साफ कहने का अंदाज है। वे बेतकल्लुफ होकर बताते हैं कि एक बार 1988 में फरीदाबाद से पिंजौर तबादले के अलावा कोई उत्पीड़न नहीं हुआ। राजनीतिक रसूख से वह तबादला भी साल भर में वापस हो गया था। यद्यपि पिंजौर की नौकरी बहुत अच्छी रही। सर्वकर्मचारी संघ बनने के अनुभव को याद करते हुए वे कहते हैं कि अकेले-अकेले संगठनों का दबाव नहीं बनता था।
सर्वकर्मचारी संघ से सभी को लाभ हुआ है। वे लगातार संघर्षों में भाग लेते रहे हैं लेकिन कभी सर्वकर्मचारी संघ में नेता नहीं रहे। उसके निर्णयों को बिजली क्षेत्र में लागू करवाने में लगातार योगदान दिया है। आन्दोलन को लेकर परिवार की ओर से दिक्कत तो नहीं आई लेकिन काम छूट जाने की शिकायत तो रहती ही है।
वे साफगोई से बताते हैं कि कृष्णपाल गुर्जर से 1984 से अब तक संपर्क रहे हैं। तब वे जिला पार्षद बने थे। उनके अलावा विधायक राजेश नागर, पूर्व मंत्री मूलचन्द व सीमा त्रिखा से भी संपर्क हैं। कांग्रेस नेता महेन्द्र प्रताप सिंह से भी अच्छे सम्बन्ध हैं। शासक पार्टी की जनविरोधी नीतियों के कारण अब अधिक आना जाना नहीं है।
नौकरशाही से सीमित ही जान-पहचान रही है। आन्दोलनों के दौरान आईएएस जितेन्द्र कुमार, यशेन्द्र सिंह, प्रवीण कुमार और अतुल कुमार से थोड़ा संपर्क रहा है। राजनीतिक रसूख से पुत्रवधू को कॉलेज में एक्सटेंशन लैक्चरर लगवाया था जो कोर्ट केस के कारण हट गई। बिजली में अधिकारी से कहकर एक भतीजे को डाटा एंट्री ऑपरेटर और एक को ड्राइवर लगवाया था। ये दोनों नौकरी ठेके पर थी। वैसे यूनियन के प्रभाव से 16 लड़कों को नौकरी दिलवाई।
वे आत्मालोचना करते हुए मानते हैं कि अपनी जाति का समर्थन करना सही नहीं था। मुंह पर बात कहने की आदत के चलते सामने वाले को नाराज कर देते और इस तरह बच्चों को नौकरी नहीं लगवा पाए। साफगोई के कारण सभी जगह कुछ लोगों को दूर कर दिया।
वे अपने अनुभव को साझा करते हुए कहते हैं कि जो कुछ हो सका कर्मचारियों व जनता की सेवा की। ड्यूटी के साथ सामाजिक काम भी किए और अपनी जाति के भी। इसके अलावा किसानों के मुआवजे व हित के लिए निस्वार्थ काम किया। वे पहले और अब के बारे में बड़ा अंतर देखते हैं। पहले सभी से मिलकर यूनियन से जोड़ा जाता था। फिर टेलीफोन करने का दौर आया और अब वाट्सएप पर मैसेज डालकर इतिश्री हो जाती है। निर्भीक होकर लड़ने की जगह सुरक्षित रहने की कार्यनीति के कारण अधिकारी हावी हो रहे हैं।
उन्होंने 11 मई 1982 को नया गांव पलवल निवासी राजदेवी से विवाह किया। उनके दो बेटे हैं। प्रदीप गुड़गांव में रियल इस्टेट का काम करता है और लक्षदीप ने गांव में प्ले स्कूल बना रखा है। दो पोते प्रियांश और देवांश हैं जो क्रमशः आठवीं और तीसरी कक्षा में पढ़ते हैं।
सत्यपाल नरवत नौकरी और यूनियन के साथ स्थानीय स्तर पर सामाजिक कार्यों में भी जुड़े रहे। अपने गांव समाज सुधार समिति बनाई। मानव उत्थान संस्थान के साथ जुड़कर उनका परिवार आध्यात्मिक कार्यों से जुड़ा रहा। वे लगातार गांव के विद्यालय में भवन निर्माण व अन्य विकास कार्यों में योगदान देते रहे हैं। उन्होंने भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर किसान आन्दोलन में भाग लिया और बल्लभगढ़ में जमीन का मुआवजा 16 लाख रुपए से बढ़वाकर 42 लाख रुपए प्रति एकड़ करवाया।
इसके लिए “किसान संघर्ष समिति नहर पार” के बैनर तले आन्दोलन चला। इस आन्दोलन में सर्वकर्मचारी संघ का भी सक्रिय सहयोग मिला। इसी दौरान पलवल क्षेत्र में केजीपी व केएमपी के चलते हुए आन्दोलन में ये सक्रिय रहे। सन् 2020-21 में संयुक्त किसान मोर्चे के बैनर तले चले आन्दोलन में भी इनकी भूमिका रही। इसी के कारण उन्हें लोग पूर्व कर्मचारी नेता की बजाए किसान नेता के रूप में पहचानते हैं।

लेखक सत्यपाल सिवाच
