मैं… एक मटका हूँ
डॉ रीटा अरोड़ा
*जिसने घरों की प्यास ही नहीं, रिश्तों की गर्माहट भी संभाली थी*
मैं घर के आँगन में रखा वही पुराना मिट्टी का मटका हूँ, जिसे कभी इस परिवार का सबसे जरूरी हिस्सा माना जाता था। आज मैं घर के पीछे वाले छोटे स्टोर में धूल से ढका पड़ा हूँ। कभी-कभी कोई पुरानी चीज़ ढूँढते हुए मुझे देख लेता है और कह देता है –
“अरे, यह मटका अभी तक रखा है?”
“अभी तक…” यह शब्द मेरे भीतर बहुत देर तक गूंजते रहते हैं।
एक समय था, जब सुबह की पहली किरण मुझ पर पड़ती थी और माँ सबसे पहले मुझे भरती थीं। मेरी भीगी सतह पर हाथ फेरते हुए वह मुस्कुराती थीं, जैसे मैं कोई बर्तन नहीं, परिवार का सदस्य हूँ। मेरे ऊपर भीगा कपड़ा रखा जाता था और पास ही तुलसी का पौधा होता था। पूरे घर में मिट्टी और ठंडे पानी की मिली-जुली खुशबू फैल जाती थी।
गर्मी की दोपहर में जैसे ही खेतों से थके हुए लोग लौटते, सबसे पहले मेरे पास आते। पीतल का गिलास मेरी ठंडी साँसों से भरकर उनके हाथों तक पहुँचता था। पहला घूंट पीते ही चेहरे पर जो सुकून उतरता था, वही मेरी असली कीमत थी।
एक समय था, जब पूरा परिवार एक ही मटके से पानी पीता था। किसी को अपना गिलास अलग रखने की जरूरत महसूस नहीं होती थी। प्यास साझा थी… इसलिए अपनापन भी साझा था।
आज हर इंसान अपनी अलग बोतल लेकर चलता है, जैसे पानी नहीं, अपनी-अपनी दुनिया उठाए घूम रहा हो।
मुझे बच्चों की वह भीड़ याद है, जो खेलते-खेलते दौड़कर मेरे पास आती थी। कोई गिलास गिरा देता था, कोई आधा पानी पीकर भाग जाता था। और माँ दूर से डाँटती थीं – “अरे धीरे… मटका टूट जाएगा!”
सच कहूँ तो मैं मिट्टी का जरूर था… लेकिन उस घर की धड़कनों से बना था। मेरे आसपास सिर्फ पानी नहीं रखा होता था… जीवन रखा होता था। दादी वहीं बैठकर आम काटती थीं। बुज़ुर्ग वहीं बैठकर हुक्का पीते थे। औरतें वहीं बैठकर बातें करती थीं। घर के सारे सुख-दुख मेरी ठंडी छाँव में गुजरते थे।
मैंने कई रिश्तों को बनते देखा है। कई नाराज़ लोगों को पानी पीते-पीते शांत होते देखा है। कई मेहमानों को कहते सुना है – “वाह… कितना मीठा पानी है!” शायद उन्हें नहीं पता था कि मिठास पानी में नहीं, उस घर के अपनापन में थी।
मुझे आज भी वे गर्मियों की शामें याद हैं, जब बिजली चली जाती थी। पूरा परिवार छत या आँगन में बैठता था। कोई हाथ वाला पंखा झलता था, कोई दादी से कहानी सुनता था। और बीच-बीच में कोई उठकर मेरे पास आता और गिलास भरकर सबको पानी पिलाता था। उस समय पानी पीना केवल आदत नहीं, एक ठहराव हुआ करता था।
फिर धीरे-धीरे समय बदल गया।
एक दिन घर में चमचमाता फ्रिज आया। उसके आने पर मिठाई बाँटी गई। सब लोग खुश थे कि अब “ज्यादा ठंडा पानी” मिलेगा। उस दिन पहली बार मुझे एहसास हुआ कि शायद अब मेरा समय खत्म होने वाला है। धीरे-धीरे मैं रसोई से हटकर बरामदे में पहुँचा… फिर बरामदे से स्टोर तक।
लेकिन फ्रिज के पानी में वह सुकून नहीं होता, जो मेरे भीतर था। मेरे पानी में मिट्टी की हल्की-सी सौंधी महक रहती थी। वही महक जो पहली बारिश के बाद धरती से उठती है। वही महक जो आदमी को अचानक बचपन की गलियों में पहुँचा देती है।
पहले लोग मेरे पास बैठते थे। बातें करते थे। हँसते थे। रिश्ते निभाते थे।
आज लोग फ्रिज खोलते हैं, बोतल निकालते हैं और मोबाइल देखते हुए पानी पी लेते हैं। पानी ठंडा है…
लेकिन उसमें रिश्तों की गर्माहट नहीं बची।
कभी-कभी रात में जब घर पूरी तरह शांत हो जाता है तो मुझे लगता है जैसे मैं अब भी किसी के कदमों की आहट सुन रहा हूँ। जैसे कोई बच्चा भागता हुआ आएगा और बिना गिलास के सीधे मुँह लगाकर पानी पीने लगेगा।
लेकिन फिर याद आता है… अब बच्चों को प्यास से ज्यादा वाई-फाई की चिंता होती है।
मुझे आधुनिकता से शिकायत नहीं है। दर्द सिर्फ इतना है कि इंसान ने सुविधा लेते-लेते संवेदनाएँ भी बदल दीं। आज भी अगर किसी गाँव के पुराने घर में मेरे जैसा मटका रखा दिख जाता है तो लगता है जैसे बचपन अब भी कहीं साँस ले रहा है।
अगली बार जब आप फ्रिज से बोतल निकालकर पानी पिएँ तो एक पल मेरे बारे में सोचिएगा।
उस मिट्टी की खुशबू को याद कीजिएगा…
दादी के हाथों का वह पीतल का गिलास…
और गर्मियों की वह दोपहर, जब पूरा परिवार मेरे आसपास बैठा करता था।
तब शायद समझ आएगा – *मैं सिर्फ पानी नहीं ठंडा करता था…*
*मैं घरों के भीतर बची हुई इंसानियत को भी ठंडा, शांत और ज़िंदा रखा करता था।*

लेखिका – डॉ रीटा अरोड़ा
