कॉरपोरेट का अमृतकाल, जनता की बदहाली
धर्मेन्द्र आज़ाद
टीवी पर “5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी”, “अमृतकाल”, “विश्वगुरु” और “विकसित भारत” के चमकदार विज्ञापन लगातार चलते रहते हैं। ऐसा माहौल बनाया जाता है मानो देश बस कल सुबह ही स्वर्ग में बदलने वाला हो। लेकिन ज़मीन पर हक़ीक़त कुछ और ही कहानी सुनाती है।
उन्नत शिक्षा को आम जन तक पहुँचाने के प्रयास करने के बजाय, पिछले लगभग दस वर्षों में देशभर में करीब 93,000 सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए। दूसरी तरफ़ प्राइवेट स्कूल और कोचिंग उद्योग अरबों-खरबों का कारोबार बन चुके हैं।
यानी पहले सरकारी शिक्षा को कमज़ोर करो, फिर निजी शिक्षा को “अवसर” बताओ — शायद यही नया विकास मॉडल है।
बेरोज़गारी चरम पर है। सरकारी आँकड़ों में भले ही बेरोज़गारी दर 5-7% दिखाई जाती हो, लेकिन भारत में रोज़गार की असली तस्वीर इससे कहीं ज्यादा भयावह है। क्योंकि यहाँ बेरोज़गारी मापने का तरीका ही ऐसा है कि अगर कोई युवक सप्ताह में सिर्फ़ एक घंटा भी काम कर ले, तो उसे “रोज़गार प्राप्त” मान लिया जाता है।
यानी एक इंजीनियर दिनभर नौकरी खोजे और शाम को किसी फ़ूड डिलीवरी ऐप पर दो घंटे खाना डिलीवर कर दे — तो सरकारी आँकड़ों में वह “रोज़गारयुक्त युवा” कहलाएगा। डेटा मुस्कुरा देगा, लेकिन उसकी ज़िंदगी नहीं।
भारत में सिर्फ़ बेरोज़गारी नहीं, बल्कि भारी मात्रा में छिपी हुई बेरोज़गारी और अल्प-रोज़गार भी मौजूद है। लाखों पढ़े-लिखे युवा अपनी योग्यता से बहुत नीचे, 10-12 हज़ार रुपये की अस्थायी नौकरियों, कॉन्ट्रैक्ट वर्क और गिग इकॉनमी में फँसे हुए हैं।
ऐसे कामों में न सुरक्षा है, न स्थायित्व, न सम्मान और न भविष्य — बस गधे की तरह काम और बदले में ज़िल्लत।
डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, नौकरियाँ घट रही हैं।
काम के घंटे बढ़ रहे हैं, वेतन घट रहा है।
स्थायी रोजगार खत्म हो रहा है, फ्लेक्सिबिलिटी के नाम पर ज़ोमैटो, ब्लिंकिट टाइप गिग कल्चर को बढ़ावा दिया जा रहा है। और इसी को कहा जाता है — “न्यू इंडिया”।
उधर निजी अस्पतालों का हाल यह है कि मरीज बीमारी से कम और बिल देखकर ज्यादा डर जाता है। सरकारी अस्पतालों में लाइनें इतनी लंबी हैं कि कई बार इलाज शुरू होने से पहले ही मरीज दम तोड़ देता है।
मज़दूर यूनियन बनाए तो कहा जाता है कि “राष्ट्रहित” खतरे में पड़ जाएगा।
बढ़ती महँगाई से परेशान मज़दूर अगर न्यूनतम वेतन बढ़ाने की माँग करें, तो उसे साज़िश और “अर्थव्यवस्था पर हमला” बता दिया जाता है। संघर्षरत मज़दूरों को जेलों में ठूँस दिया जाता है, फर्जी धाराओं में फँसाया जाता है और उनकी आवाज़ को कानून-व्यवस्था के लिये खतरा घोषित कर दिया जाता है।
लेकिन अगर कोई बड़ा उद्योगपति हजारों करोड़ का कर्ज लेकर विदेश भाग जाए, तो उसे “बिजनेस फेल्योर”, “मार्केट रिस्क” या “प्रतिकूल आर्थिक परिस्थिति” कहकर टाल दिया जाता है।
फिर जब जनता पूछती है कि शिक्षा और स्वास्थ्य मुफ्त या सस्ते क्यों नहीं हो सकते, तो जवाब आता है —
“सरकार के पास पैसा नहीं है।”
अगर यह सच है तो फिर बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिए पैसा कहाँ से आता है?
रिजर्व बैंक और संसद में दिए गए आँकड़ों के अनुसार, 2014-15 से 2023-24 के बीच बैंकों ने लगभग ₹16 लाख करोड़ के कर्ज राइट-ऑफ किए।
2019 में कॉरपोरेट टैक्स 30% से घटाकर 22% कर दिया गया।
बड़ी कंपनियों को टैक्स छूट, सस्ती ज़मीन, सस्ती बिजली, PLI स्कीम, इंसेंटिव और राहत पैकेज दिए जाते हैं — और इसे कहा जाता है “आर्थिक सुधार”।
लेकिन अगर कोई गरीब बच्चा मुफ्त शिक्षा माँग ले, तो कहा जाता है —
“फ्री की आदत देश को बर्बाद कर देगी।”
यानी, अरबपति को राहत = आर्थिक सुधार, गरीब को राहत = रेवड़ी
यही है भारत का आधुनिक आर्थिक दर्शन।
पूंजीवाद का पूरा खेल भी कुछ ऐसा ही है —मुनाफ़ा निजी हाथों में, लेकिन नुकसान जनता के सिर पर।
जब मुनाफ़ा होता है, तो उसे “उद्यमिता” कहा जाता है, और जब घाटा होता है, तो जनता के टैक्स के पैसे से “बेलआउट पैकेज” दिया जाता है।
टीवी स्टूडियो में बैठे एंकर और पैनलिस्ट भारत को चौथी सबसे बड़ी इकॉनमी, शेयर बाज़ार की चमक और सुपर रिच की बढ़ती संख्या दिखाकर देश को राष्ट्रवादी उत्साह से भर देना चाहते हैं।
लेकिन उन्हें यह नहीं दिखता कि करोड़ों युवा आज भी स्थायी नौकरी, सस्ती शिक्षा, इलाज और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
देश सिर्फ़ मंदिरों की ऊँचाई, शेयर बाज़ार की चमक और अरबपतियों की संख्या से महान नहीं बनता।
देश तब महान बनता है, जब आम इंसान बिना डर, बिना भूख और बिना अपमान के जी सके।
इसलिए समय की माँग है कि मेहनतकश जनता, छात्र, युवा, किसान, कर्मचारी और बुद्धिजीवी देश की दशा और दिशा की गंभीरता को समझें।
जनआंदोलनों के माध्यम से सरकारों पर दबाव बनाएं, एकजुटता दिखाएं और बड़े सामाजिक-आर्थिक बदलावों के लिए व्यापक जनसंघर्षों की तैयारी करें।
क्योंकि इतिहास गवाह है —
जब जनता जागती है, तब सबसे चमकदार प्रचार भी हक़ीक़त को ज्यादा देर तक नहीं छिपा पाता।
