सामाजिक सरोकार
एक अभिनव पहल
कुलभूषण उपमन्यु
भारत के गांव आज एक अजीब दोराहे पर खड़े हैं. पुराने समय का मॉडल कि “गांव में पैदा करो और शहर में बेच लो”, काम नहीं कर रहा है. उद्योग जगत ने ग्रामीण उत्पादक सामर्थ्य को निगल लिया है. खेती, पशुपालन सहित घाटे का सौदा बनती जा रही है और दस्तकारी चौपट हो गई है. गांव मौसमी या स्थाई पलायन के शिकार हो गए हैं. खेत खाली पड़ते जा रहे हैं, और पशु सड़क पर छोड़ दिए गए हैं. गांव की दुकानें शहरी उद्योगों में बने जरूरी, गैर जरूरी उत्पादों से पटे पड़े हैं. उत्पादक अब मात्र उपभोक्ता बन कर रह गया है. गांव के गांव खाली पड़ते जा रहे हैं, या फिर बद्दी, बरोटीवाला, चेन्नई, दिल्ली, में कमाओ और गांव में बैठ कर खाओ, की स्थिति है.
शहर, गांव को निगल रहा है और स्वयं भीड़ भडक्के, प्रदूषण और चेहरा विहीन समाज में जीने को अभिशप्त हो रहा है. इस समस्या को भले ही अनदेखा किया जा रहा है किन्तु देश के टिकाऊ विकास के लिए इसके भयानक परिणाम होने वाले हैं.
यह तो सही है कि हम पुरानी ग्राम व्यवस्था में नहीं लौट सकते किन्तु यह भी सही है कि गांवों को उजड़ने से बचाना और गांव की उत्पादक अर्थव्यवस्था को पुनर्स्थापित करना उतना ही जरूरी है जितना आधुनिक औद्योगिक शहरी विकास को प्रोत्साहित करना है. यह पुराने तरीके से तो नहीं होगा किन्तु कैसे होगा इस प्रश्न का उत्तर तो ढूंढना ही होगा. इस दिशा में कुछ मार्गदर्शक कार्य हुआ है.
ग्लाइड संस्था के संस्थापक प्रदीप घोष के माध्यम से संस्था ने उत्तर प्रदेश के दो गांवों में “ एक मौन समस्या समाधान हेतु ग्रामीण अजिविकाओं बारे पुनर्विचार” नामक कार्यक्रम के माध्यम से एक ऐसी पहल हुई है जिसकी भारत के हर गांव में जरूरत और प्रासंगिकता है. ग्लाइड के माध्यम से किसी सामाजिक संगठन के लिए गांव उदेरना, ब्लॉक निनगोही, और गांव रथ, ब्लॉक कुट्टार, उत्तर प्रदेश में ग्लाइड वर्कशॉप की गई.
उस सामाजिक संगठन ने हजारों किसानों को साथ चलाया और 31 फार्मर प्रोडूसर संस्थाएं बना कर कार्य आरंभ किया. जो कुछ मसाले बना कर और जूते बना कर शहर में बेचने पर आधारित था. किन्तु यह मॉडल काम नहीं कर रहा था और लोग कुछ दिनों के मनरेगा कार्य पर ही निर्भर होने को अभिशप्त थे. पलायन की दर 12.5 % थी. गांव भुतहा हो चले थे. इस यात्रा में ग्लाइड ने चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर ध्यान आकर्षित किया. यानि गांव में बनाओ और शहर में बेचो में बाजार की गुलामी से ऊपर उठने की बात. गांव की जरूरत की चीजें बना कर गांव में ही बेचीं जाएं ताकि गांव के साधनों से गांव में ही उत्पादन हो और गांव में ही उसकी खपत की जाए, ताकि गांव का पैसा गांव में ही रहे और गांव में ही रोजगार पैदा करे.
गांव वालों को शुरू में इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ कि ऐसा संभव हो सकता है. किन्तु गहराई में समझने के लिए गहन अध्ययन करने के लिए उन्हें मनाया गया और प्रयास किया गया कि गांव में उपलब्ध संसाधनों को समझा जाए, गांव में उपलब्ध कौशल को समझा जाए, और गांव के अंदर उपलब्ध बाजार का आकलन किया जाए. इस शोध से यह जानकारी सामने आई कि गांव में ही 57 प्रकार के कौशल उपलब्ध हैं, 217 प्रकार का कच्चा माल उपलब्ध है.
फिर आर्थिक साधनों का आकलन करने पर पता चला कि गांव का प्रति परिवार एक वर्ष का खर्च लाखों में है जिसमें से कुछ कमाई से और कुछ क़र्ज़ से पूरा होता है. यदि बाहरी बाजारों से आने वाली औद्योगिक वस्तुओं पर खर्च होने वाली राशी में से कुछ गांव में ही उत्पादन करके गांव में ही खरीदा जाए तो यह गांव वालों की आमदनी बन जाएगा. यही चक्रीय अर्थव्यवस्था का मूल सूत्र है.
ये लोग फैक्ट्री में बनी पैक की गई 350 वस्तुओं पर प्रति वर्ष 23.50 करोड़ रु खर्च कर रहे थे. अर्थात इतना पैसा सीधे बड़े उद्योग पतियों की जेब में इन दो गांव से जा रहा था. जिसके माध्यम से 2.35 करोड़ रु जी.एस.टी भी गांव से सरकार के खजाने में जा रहा था, जो गांव में आने वाली सामाजिक पेंशन और सहायता से ज्यादा था. इससे यह पता चला कि व्यवस्था गांव को नहीं संभाल रही बल्कि गांव व्यवस्था को चला रहे हैं.
इस जानकारी के बाद सामाजिक संस्था ने 85 ऐसे उत्पाद चिन्हित किए जिनको गांव में ही बनाया जा सकता था. जिसके लिए कौशल भी उपलब्ध था. पहले चरण में 4 उत्पादों से कार्य आरंभ करने का सोचा गया और आकलन लगाया गया कि इतने मात्र से ही 500 परिवारों के गांव में वार्षिक 63 लाख रु. की कमाई गांव वासियों को होगी. इस रणनीति में गांव अपने संसाधनों से अपने लिए उत्पादन करके गांव में ही रोजगार पैदा करता है, गांव का पैसा गांव में ही रहता है और पलायन की जरूरत भी नहीं रहती.
गांधी जी इसी अर्थव्यवस्था की बात करते थे और स्वावलंबी गांव व्यवस्था का उनका सपना इसी दिशा में सोचा गया था. आज फिर जरूरत है पुनर्विचार की और औद्योगीकरण की दिशा गांवों की उत्पादन क्षमता को पुन: स्थापित करने की ओर मोड़ने की. गांव अपने उत्पादों को गांव में ही प्रयोग करें और फैक्ट्री उत्पादों का प्रयोग उतने तक ही सीमित कर दें जो गांव में नहीं बनाया जा सकता. इससे हम स्वयं ही एक दूसरे को रोजगार दे रहे होंगे. गांव की खुशहाली का यही राजमार्ग है.
