क्या केजरीवाल की ‘आप’ विचारहीनता के कारण टूट रही है?
उर्मिलेश


आम आदमी पार्टी(AAP) के 10 में से 7 राज्यसभा सांसद भाजपा-मय हो गये! इस टूट का नेतृत्व किया, पार्टी चीफ अरविंद केजरीवाल के सबसे ‘दुलरुआ’ रहे राघव चड्ढा ने! पंजाब के पिछले विधानसभा चुनाव के बाद जब वहां के एक लोकप्रिय आप नेता भगवंत सिंह मान की अगुवाई में सरकार बनी तो केजरीवाल ने एक योजना के तहत मान पर अपना पूर्ण नियंत्रण रखने के लिए राघव चड्ढा को पंजाब भेज दिया! उन्हें एक ऐसी कमेटी का सर्वेसर्वा बना दिया गया जिसकी सलाह और स्वीकृति के बगैर भगवंत मान सरकार कोई बड़ा फैसला नहीं करेगी। काफी समय तक इससे भगवंत मान अंदर ही अंदर असंतुष्ट रहे। पंजाब की दबंग नौकरशाही में भी इस तरह के ‘असंवैधानिक कामकाजी तंत्र’ पर नाराजगी जाहिर की जाने लगी। अंतत: केजरीवाल को पंजाब के लिए बनाये अपने उस कोआर्डिनेशन तंत्र को खत्म करना पड़ा! कुछ समय बाद राघव और केजरीवाल के बीच दूरियां बढने लगीं। सितम्बर, 2023 में राघव की बालीवुड की एक मशहूर अभिनेत्री से शादी भी हुई। वह भी एक बहुत प्रभावशाली परिवार से आती हैं।
धीरे-धीरे केजरीवाल और राघव के बीच पहले वाली घनिष्ठता लगातार कम होती रही। दिलचस्प बात है कि केजरीवाल और उनके कई साथी-नेता जब शराब घोटाले में नामजद हुए और कुछ जेल भी गये। राघव पर इसकी आंच नहीं आई। दूसरी तरफ उनके बॉस केजरीवाल मुश्किल में थे और उन्हें भी जेल जाना पड़ा। उसी के आसपास राघव चड्ढा अपनी आंख की सर्जरी के लिए विदेश चले गये। डेढ-दो माह बाद स्वदेश लौटे। उस समय भी केजरीवाल और राघव के बीच बढ़ती दूरी की खबरें आने लगी थीं। पार्टी की तरफ से पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज ने ऐसी खबरों का खंडन किया।
पर वे खबरें गलत नहीं थीं! अभी 24 अप्रैल को जिस तरह राघव चड्ढा और उनके दो अन्य सांसद-साथियों-संदीप पाठक और अशोक मित्तल के चमचमाते वाहन भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय मुख्यालय के मुख्य गेट से दाखिल होकर अंदर पहुंचे और वहां पार्टी के अध्यक्ष नितिन नवीन सहित कई नेताओं ने उन तीनों का स्वागत किया; उससे बिल्कुल साफ लग रहा था कि ये तैयारी काफी पहले से चल रही थी।
चड्ढा सहित कुल 7 राज्य सभा सदस्यों के दल-बदल से आम आदमी पार्टी में अब सिर्फ 3 राज्य सभा सांसद रह गये हैं: संजय सिंह(दिल्ली), नारायण दास गुप्ता(दिल्ली) और बलबीर सिंह सींचेवाल(पंजाब)। जिन सात ने दलबदल किया है, उनमें स्वाती मालीवाल तो काफी पहले ही पार्टी से अलग हो चुकी थीं।
अशोक मित्तल के पंजाब स्थित घर और अन्य ठिकानों पर हाल ही में एक केंद्रीय एजेंसी ने छापे डाले थे। इसलिए आप नेता संजय सिंह और अनुराग ढांडा जैसे लोग अगर इस दलबदल को “ऑपरेशन लोटस” बता रहे हैं तो इसे मानने में कोई दिक्कत नहीं! सिर्फ एक तथ्य जोडना जरूरी है कि राघव और संदीप पाठक जैसे आप नेताओं ने इस ऑपरेशन को कामयाब बनाने का रास्ता तैयार किया।
आम आदमी पार्टी के नेता केजरीवाल और संजय सिंह आदि कह रहे हैं कि दलबदल करने वाले सांसदों को पंजाब की जनता सबक सिखायेगी। क्या सबक सिखायेगी और क्यों सिखायेगी? क्या भाजपा का दामन थामने वाले इन सांसदों को पंजाब की जनता ने चुना था? क्या केजरीवाल ने इन्हें जनता से पूछकर पार्टी उम्मीदवार बनाया था? अगर नहीं तो इन सांसदों के दलबदल के लिए सिर्फ वे ही जिम्मेदार हैं! हां, इतने ढुलमुल लोगों को राज्यसभा के सांसद का उम्मीदवार बनाने के लिए केजरीवाल खास तौर पर जिम्मेदार हैं।
इन लोगों में कितने ऐसे होंगे, जो राजनीतिक रूप से जागरूक और सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध होंगे? राघव और संदीप जागरूक जरूर हैं पर उनकी भी पार्टी प्रतिबद्धता इतनी कमजोर क्यों साबित हुई? ईमानदारी और लोकतांत्रिकता के नाम पर राजनीति में आये केजरीवाल ने अपनी आम आदमी पार्टी में क्या इतना लोकतंत्र बचा रखा है कि कोई कार्यकर्ता उनसे पूछे कि आपने बड़े कारोबारी अशोक मित्तल, धनाढ्य पूर्व क्रिकेटर हरभजन, संजीव अरोड़ा
और विक्रमजीत सिंह को किस राजनीतिक अनुभव और सांगठनिक प्रतिबद्धता के आधार पर राज्यसभा की सदस्यता का उपहार दिया?
एक जमाने में आम आदमी पार्टी में अनेक योग्य राजनीतिक कार्यकर्ता मौजूद थे। पर बारी-बारी से केजरीवाल ने सबको बाहर का रास्ता दिखाया। वह अपनी अगुवाई में एक ऐसी पार्टी बनाना चाहते थे जिसके वह सिर्फ कन्वीनर ही नहीं, “सर्वेसर्वा” यानी “भगवान” भी हों! कुछ समझदार और कुशल लोगों के बाहर किये जाने के बाद आम आदमी पार्टी के वह “भगवान” बन भी गये!
लेकिन आम आदमी से पहले अन्ना हजारे और उनकी अगुवाई में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ जो कथित भ्रष्टाचार विरोधी “लोकपाल लाओ आंदोलन” चला, उसकी जमीन बनाने वाले और पर्दे के पीछे रहकर हर तरह से मदद करने वाले देश के सबसे बड़े “संकीर्ण दक्षिणपंथी खेमे” ने उनसे दिल्ली और आसपास सीमित भूमिका की अपेक्षा रखी थी!
लेकिन 2014 में केंद्रीय सत्ता में बदलाव के बाद भी केजरीवाल अपनी सीमित भूमिका का दायरा लगातार लांघते रहे! इससे अन्य विपक्षियों की तरह वह भी मोदी सरकार के निशाने पर आ गये! पंजाब में ‘आप’ की सरकार बनने के बाद दोनों के अंतर्विरोध और तीखे हो गये! एक वरिष्ठ दक्षिणपंथी नेता की मध्यस्थता की कोशिश भी चली। कुछ फार्मूले भी सुझाये भी गये! लगा बात बनेगी पर नहीं बनी!
अपनी तात्कालिक सफलता से केजरीवाल का अहंकार और बढ़ता रहा। अपनी कामयाबी पर वह इतने रीझे कि भूलते रहे कि उनकी पार्टी जिस अन्ना जी महराज की अगुवाई वाले कथित जन-अभियान के गर्भ से निकली है, उसे ‘हिंदुत्ववादियों के घनघोर दक्षिणपंथी खेमे’ ने ही पाला-पोसा था! जबकि उनके पूर्व सहकर्मी-सलाहकार प्रशांत भूषण ने कुछ साल पहले ही इस छुपे हुए तथ्य को सबके सामने ला दिया था!
ऐसे तमाम ठोस तथ्यों की रोशनी में मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आम आदमी पार्टी वस्तुत: विचारहीन, मौका-परस्त और शुरुआती सफलता के घमंड में डूबे लोगों का एक जमावड़ा रही है। इसलिए इसका लंबे समय तक एक दल के रूप में टिके रहना संभव नहीं है। हो सकता है संजय सिंह जैसे कुछेक ‘आप’ नेताओं को छोड़ एक दिन ‘आप’ का और भी बड़ा हिस्सा भाजपा में विलीन हो जाय! ऐसे में संजय सिंह जैसे लोगों को भी कांग्रेस या समाजवादी पार्टी में अपना नया ठिकाना बनाना पड़े!
आम आदमी पार्टी(AAP) में न तो पहली बड़ी फूट है और न यह आखिरी होगी! समय-समय पर टूटते-फूटते यह भी ‘तात्कालिक लाभ या मौके का फायदा’ उठाकर बने मौका-परस्त और अन्य विचारहीन दलों या संगठनों की तरह खत्म हो जाये या सिर्फ नाम के लिए बचे! फिलहाल तो इसके सामने बड़ी चुनौती है, अपनी अगुवाई वाली पंजाब की भगवंत सिंह मान सरकार को दलबदल की आशंका से बचाना। अगले कुछ महीने ‘आप’ और भगवंत मान सरकार के लिए मुश्किल भरे हैं। उर्मिलेश के फेसबुक वाल से साभार
