कविता
स्त्री
ओमसिंह अशफ़ाक
स्त्री दोगली नहीं हो सकती,
इसलिए नहीं कि यह उसकी
विवशता है,
बल्कि इसलिए कि दोहरा-जीवन
नहीं जी सकती स्त्री !
स्त्री जब प्रेम करती है,
तो ब्रह्मांड की शिला पर
समग्रता का लेख लिखती है !
पुरुष से भी यही अपेक्षा
करती है स्त्री,
लेकिन अक्सर छली जाती है !
मिट जाती है स्त्री,
पर समझौता नहीं करती।
स्त्री का ये मिज़ाज शाश्वत है,
अजर-अमर है ईश्वर की तरह-
स्त्री का चरित्र !
बहुत भरमाया गया,
फुसलाया गया उसको-
पर टस-से-मस न हुई !
गरियाया दुनियादार मर्दों ने
तिरिया चरित्र कहकर-
‘कुत्ते की दुम’ तक कहा ?
पर हाड़-मांस की बनी
मोम-सी-कोमल स्त्री,
चट्टान-सी कठोर ही रही ?
जानती थी वह-
जिस दिन पिघली,
विप्लव निश्चित है !
(1997)
