अंधविश्वास का प्रतिरोध करना हर तर्कशील व्यक्ति का कर्तव्य

अंधविश्वास का प्रतिरोध करना हर तर्कशील व्यक्ति का कर्तव्य

  • यमुनानगर में तर्कशील विचार गोष्ठी का आयोजन

तर्कशील सोसायटी यमुनानगर इकाई द्वारा एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया जिस का मुख्य विषय ‘आज के संदर्भ में तार्किक सोच के विकास की आवश्यकता’ था । गोष्ठी का संचालन करते हुए अपने स्वागत व्यक्तत्व में राजेश बिंद्रा ने वैज्ञानिक चिंतन और तर्कशील सोच पर हो रहे निरंतर प्रहारों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जिस देश में उच्च पदों पर आसीन सत्ता पक्ष के लोग मिथीहासिक कहानियों को सत्य बताते हों, विश्व के पहले अंतरिक्ष यात्री भारतीय कह कर प्रचार करते हों और प्राचीन काल में उत्कर्ष शल्य चिकित्सा का उदाहरण स्वरूप मानव सिर पर हाथी के सिर का प्रत्यारोपण के प्रचार करते हों तो निस्संदेह वैज्ञानिक चिंतन के लिए यह बड़ा गंभीर संकट है और इस संकट का मुकाबला और प्रतिरोध करना हर तर्कशील व्यक्ति का कर्तव्य है ।

प्रो. राकेश शर्मा ने आज की शिक्षा प्रणाली में वैज्ञानिक चिंतन की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मानव तो जन्म से ही जिज्ञासु और वैज्ञानिक चिंतन वाला प्राणी है पर कुछ बेहद स्वार्थी और धूर्त लोगों ने अपने फायदे के लिए मानव के इस प्राकृतिक गुण का विनाश किया । प्रो. राकेश ने कहा कि वैज्ञानिक चिंतन अगर मानवतावादी नहीं है तो वो संपूर्ण विश्व के लिए घातक है । इस संदर्भ में उन्होंने ईरान युद्ध का उदाहरण देते हुए कहा कि विकसित विज्ञान द्वारा उत्पादित अत्याधुनिक हथियारों से आज हजारों बेगुनाह नागरिक , मासूम बच्चे मारे जा रहे हैं। आज ट्रंप MAGA का नारा लगा कर ईश्वर की शपथ ले कर व्हाइट सुपरमेसी को स्थापित करना चाहता है जो तर्कशील चिंतन के मूल सिद्धांतों से कोसों दूर है ।

मुख्य वक्ता बलबीर सिंह ने कहा कि आज धर्म का प्रचार प्रसार वैज्ञानिक चिंतन के सम्मुख एक प्रमुख चुनौती है । कोई भी धर्म अपनी मान्यताओं , परंपराओं और विचारों में बदलाव को तैयार नहीं है हालांकि मनुष्य का विकास और मानवता का इतिहास ही बदलते वक्त के साथ बदलने का है । यहां तक कि हमारे संविधान में भी जरूरत के अनुसार अब तक कई संशोधन हो चुके हैं परंतु धार्मिक ग्रंथों में एक शब्द भी बदलने का साहस धार्मिक लोग नहीं कर सकते, उल्टा स्वयं स्थापित धर्म गुरु इन ग्रंथों का सहारा ले कर समाज में अंधविश्वास और सामाजिक विषमता का प्रसार कर रहे हैं। वैज्ञानिक चिंतन की पहल हमें सर्वप्रथम अपने घर और आसपास से ही करनी होगी और अधिक से अधिक युवा साथियों और बच्चों में इसका प्रचार करना होगा । उन्होंने कहा कि असली धार्मिक पुस्तक तो हमारा संविधान होना चाहिए जो मानवता और बराबरी का संदेश देता है और सरकारों को समाज में वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा देने के लिए निर्देशित करता है। पर आज इस के ठीक उल्ट हो रहा है और अपने आप को आंबेडकरवादी कहने वाले लोग भी सिर्फ प्रतीकों की राजनीति कर रहे हैं।

साथी फकीर चंद ने भी कहा कि तर्कशील सोच को कुचलना भारत के संविधान की रूह का विनाश करना है और ये सब एक एजेंडे के तहत हो रहा है । सभी साथियों ने बड़ी तन्मयता और सक्रियता से इस गोष्ठी में भाग लिया विशेष कर अनुरोध कुमार , सुमितपाल , अनुपम सिंह , एम एस गिल , हरिनारायण , रामतीरथ यादव , रामनाथ बंसल , राहुल भान , ललित चोपड़ा , के एस अंसल , शशि गुप्ता , रोशन लाल , चरणजीत मेहरा , सिमरन और हर्षिता ।

रिपोर्ट: गुरमीत अंबाला

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