ओमसिंह अशफ़ाक की कविता – बन्दा रिक्शा खींच रहा है!

कविता

बन्दा रिक्शा खींच रहा है!

ओमसिंह अशफ़ाक

 

नया-नया किसी गांव से आया!

लगता  है  झिझका-शरमाया!

ना रहने का कोई ठौर-ठिकाना!

यूँ शहर लगे उसको बेगाना!

सुंदर-सुंदर भवन बने हैं!

ना रहते इनमें कई जने हैं!

अभी, पास भवन के एक खड़ा है

(देखो) लगता कैसा बड़ा-बड़ा है!

क्या बाहर निकल कोई कह सकता है?

हाँ, तू भी इसमें रह सकता है!

बन्दा रिक्शा खींच रहा है!

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जब उजड़ गांव से शहर में आया!

था पहली नज़र में उसको भाया!

मुफ्त की टूटी यहां चलती है!

दिन में भी बिजली जलती है?

चीजों की इफरात यहां है!

अब गांव में ऐसी बात कहां है?

शहर की तो है बात ही न्यारी—

खत्म हुई समझो दुश्यारी?

निश-दिन मेहनत रोज करूंगा!

पीछे भी कुछ भेज सकूंगा!

बन्दा रिक्शा खींच रहा है!

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बच्चों की जब याद सताती!

पत्नी सपने में आ जाती!

प्यार से उसका सिर सहलाती!

खट्टी-मीठी बात बताती!

फिर हाले-दिल वो खोल सुनाता!

दिनभर की सब बात बताता—

चिंता की कोई बात नहीं है!

यहां मालिक का घूंसा-लात नहीं है!

बस, रहने की थोड़ी तंगी है!

बाकी बात तो सब चंगी है!

मुश्किल में हम जी लेते हैं!

घूंट सब्र का पी लेते हैं!

बन्दा रिक्शा खींच रहा है!

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रिक्शे पर ही सो लेते हैं!

फ़िल्म देख खुश हो लेते हैं!

रेहड़ी पे खाना, खा लेते हैं!

टूंटी पर ही नहा लेते हैं!

सच्ची बात बता देते हैं!

कभी पव्वा एक चढ़ा लेते हैं?

फिर ना मच्छर भी काटे हैं!

नींद में ठाठे-ही-ठाठे हैं!

फिक्र हमारी तुम ना करना!

उस ज़ालिम की नजर से बचना!

नाम है जिसका ठाकुर रतना!

पूरा होगा, एक दिन सपना!

जी को अपने वश में रखना!

बन्दा रिक्शा खींच रहा है!

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अब, सारी बातें एक ही खत में—

बोलो कैसे कह सकते हैं?

बिना तुम्हारे बहुत दिनों तक!

हम यहां कैसे रह सकते हैं?

पहले सब क़रजा़ तारेंगे!

बैठ मौज फिर हम मारेंगे!

एक ठो घर- इंतजाम करेंगे!

संग तुमको ले आराम करेंगे!

बच्चों को इस्कूल भेजकर-

शिक्षा का भी ध्यान धरेंगे

बन्दा रिक्शा खींच रहा है!

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ये रिक्शा ना उसका अपना है

अभी स्थगित ये सपना है—

पर धीरे-धीरे हो जायेगा!

फिर पूरी कमाई खुद खायेगा!

ना मालिक का कुछ देना होगा!

शहर में घर एक लेना होगा!

फिर ना मारेगा कोई सिपाही!

ना ताड़ेगा कोई दरोगा?

आह! मुट्ठी दोनों भींच रहा है!

बन्दा रिक्शा खींच रहा है!

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शहर में वो अपवाद नहीं है!

इकला ही बर्बाद नहीं है!

जब मोड़ से उसने रिक्शा मोड़ा!

लेबर चौक था—आगे थोड़ा!

वहां फ़ौज कमेरी खड़ी हुई थी!

बाजू-से-बाजू अड़ी हुई थी!

कोई लिये हाथ में छैणी-हथौड़ी!

कोई कूची-ब्रश और बांस-की-घोड़ी!

कोई साथ लिये था, छोटी-सीढ़ी!

कोई बेच रहा था- मूढ़ा-पीढ़ी!

थी नजर किसी को ग्राहक पे पैनी!

कोई पीता बीड़ी, मलता खैनी!

अरे! भूख ने यहां पे ला पटका है

धंधा ना उसका पुश्तैनी!

ना “ऊँचे कुल” में जन्म हुआ—

क्या! इसीलिए वो नीच रहा है?

बन्दा रिक्शा खींच रहा है!

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कोई परने में रोटी लिये हुए था!

कुत्ता भी नज़र वहां किए हुए था!

एक करनी-बसोली वाला आया!

जब तक उसने, उसे चेताया!

कुत्ता रोटी ले भागा था!

ज्यों सहम नींद से वो जागा था!

फिर रिक्शेवाले ने किया इशारा!

भाई कुत्तों का ही होने दो गुजारा?-

बाईं आंख को नटखट मींच रहा है!

बन्दा रिक्शा खींच रहा है!

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दो लद्धड़ पीछे लदे हुए हैं!

पेट-से अपने पदे हुए हैं!

तेज-तेज, अरे और तेज का—

कोड़ा वे उस पर फटकारें!

कौन दिशा में रिक्शा जाए!

बन्दे का ना हाल बिचारें?

रिक्शा चढ़ाई चढ़ता जाए!

रिक्शेवाला तो गश खाए?

माथे से पसीना टपक रहा है!

सुबह से सूरज भभक रहा है!

गर्दन पे लटूरे अस्त-व्यस्त!

हालत बन्दे की लस्त-पस्त!

खिचड़ी दाढ़ी उलझ रही है!

जीवन की पहेली ना सुलझ रही है!

बन्दा रिक्शा खींच रहा है !

और बतीसी भींच रहा है !

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