पंचकूला के अकादमी भवन में गुरु रविदास पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

पंचकूला के अकादमी भवन में गुरु रविदास पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

भक्ति आंदोलन ने समाज की कुरीतियों व पाखंड़ों को दूर करने का प्रयास किया, समाज को आईना दिखाया

पंचकूला/चंडीगढ़ । हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी तथा हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला (पंजाबी एवं डोगरी विभाग) द्वारा सोमवार को महाराजा दाहिर सेन सभागार में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का विषय मध्यकालीन भक्ति आंदोलन एवं गुरु रविदास था।

भक्ति आंदोलन एवं गुरू रविदास जी विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि प्रो. जगबीर सिंह, चांसलर, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि मैकाले की शिक्षा नीति ने हमें अपनी समृद्ध परम्परा से वंचित कर दिया। भक्ति आंदोलन ने समाज की गलतियों, कुरीतियों व पाखंड़ों को दूर करने का प्रयास करते हुए समाज को आईना दिखाया है। किसी भी परिवर्तन व सुधार के लिए प्रतिरोध का स्वर उसका मूलाधार है। परमसत् की खोज तथा प्रतिरोध का संकल्प हमारी ज्ञान परंपरा के मुख्य आधार हैं। भक्तिकाल के कवि आंतरिक विकारों का निवारण करने का प्रयास करते हैं। समाज के कटु यथार्थ से सीधा संवाद करना होगा ताकि बेहतर समाज का निर्माण किया जा सके। सन् 1947 के बाद जो विद्वान रह भी गए उन्होंने अपनी पंरपरा को आगे नहीं बढ़ाया बल्कि उसे कथा, कहानी के रूप में प्रस्तुत किया न कि ज्ञान के रूप में। सभी समाजों में कोई न कोई त्रुटियां रह जाती हैं तथा उन त्रुटियों को भक्तों ने सुधारा है।

संगोष्ठी में पधारे डॉ. मनमोहन सिंह, अध्यक्ष, चंडीगढ़ साहित्य अकादमी, चंडीगढ़ ने अपने बीज व्यक्तव्य में कहा कि गुरु रविदास जी की वाणी समाज और अध्यात्म इन दो तरीकों से समझी जा सकती है। भक्ति आंदोलन भारत की ज्ञान परम्परा की एक धारा है। भक्ति आंदोलन समाज की कुरीतियों, विसंगतियों व रूढ़ियों का विरोध करता है। भक्त कवियों व सिख गुरुओं ने समाज को नयी दिशा प्रदान की। उन्होंने बताया कि पंजाब नॉलेज का एक बहुत बड़ा हब था, वेद, उपनिषद तथा अन्य महत्त्वपूर्ण ग्रंथ यही लिखे गए हैं। भक्त विचार को सार्वभौमिक करते थे तथा नई सोच का निर्माण करते थे। अंगर इंसान अपनी सच्चाई को जान ले तो वह सारे भ्रमों से मुक्त हो जाता है। इसलिए गुरु रविदास जी को प्रेम के पुंज व सहज का कवि कहा गया है।

इस अवसर पर विशेष अतिथि के रूप में अमेरिका से जुड़े डॉ. सुहिन्दरबीर सिंह ने गुरु रविदास के योगदान पर ऑनलाइन वक्तव्य देते हुए कहा कि अपनी वाणी की रचना ही लम्बी आयु है। गुरु रविदास ने अपने आप को निम्न वर्ग से जोड़कर दिखाया है तथा समाज में समता, प्रेम एवं सहजता का संदेश दिया।

द्वितीय सत्र में डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, कार्यकारी उपाध्यक्ष, अकादमी ने अपने संबोधन में कहा कि डेरों के ग्रंथों में (पोथियों में) रविदास का उल्लेख हर पोथी में है। वंचित समाज को स्वाभिमान का संदेश उन्होंने आरम्भ किया था। रविदास जी ने पराधीनता के विरूद्ध लिखते हुए कहा कि पराधीन का क्या दीन है। रविदास जी कहते हैं कि अपनी प्रजा का पालन-पोषण करना राजा का धर्म है। स्वतंत्र भारत का राज कैसा हो यह रविदास जी की वह बेगमपुरा की कल्पना है। धार्मिक डेरों की कोई भी पोथी गुरु रविदास की वाणी के बिना अधूरी है।

बाद दोपहर प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. कुलवीर सिंह गोजरा, अध्यक्ष, पंजाबी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली ने कहा कि गुरु रविदास जी ने समग्र भारतीय समाज को समता की दृष्टि से देखा है। मध्यकालीन भक्ति आंदोलन में गुरु रविदास जी का विशेष स्थान है। इस सत्र में प्रो. संदीप सिंह मुंडे, डॉ. हरदेव सिंह, डॉ. जतिंदर सिंह ने भी अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

अंतिम सत्र की अध्यक्षता प्रो. गुरपाल सिंह संधू ने की तथा प्रो. सुखदेव सिंह मिन्हास विशेष अतिथि रहे। इस सत्र में डॉ. गुरप्रीत सिंह, डॉ. इतिका, डॉ. नेहा सहगल ने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। संगोष्ठी के अंत में संस्कृत प्रकोष्ठ के निदेशक, सी.डी.एल.कौशल ने सभी अतिथियों/श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।

अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में ऑनलाइन सेशन में 26 विद्वानों ने आलेख प्रस्तुत किए जिनमें इंग्लैंड से प्रसिद्ध कवयित्री दलबीर कौर, कनाडा से प्रसिद्ध साहित्यकारा सुरिन्द्र गीत विशिष्ट अतिथि रहे तथा प्रो. नवदीप कौर, पटियाला, प्रो. राजेन्द्र सिंह, बठिंडा व प्रो. परमीत कौर, पटियाला ने विभिन्न सत्रों की अध्यक्षता की। संगोष्ठी का संचालन प्रो. नरेश कुमार ने किया।

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