दूसरे विश्व युद्ध में भारतीय सेठों की बंपर कमाई
संजय श्रीवास्तव
युद्ध का मतलब तबाही, मौतें, दर्द। तबाही के इस आलम में अक्सर दुनिया के बहुत से व्यापारियों की किस्मत पलट जाती है. इस युद्ध में अमेरिकी हथियार कंपनियों और रूसी तेल ताइकून के वारे न्यारे हो रहे हैं. दूसरे विश्व युद्ध में ऐसा ही कुछ भारतीय व्यापारियों के साथ हुआ था. उनकी किस्मत इस वर्ल्ड वार ने सिरे से बदल दी थी.
द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) भारतीय औद्योगिक इतिहास के लिए ‘टर्निंग पॉइंट’ था. ब्रिटेन उसमें बर्बाद हो गया था लेकिन भारतीय व्यापारिक घरानों को मोटा मुनाफा हुआ था. युद्ध की जरूरतों को पूरा करने के लिए ब्रिटिश सरकार को उन पर निर्भर रहना पड़ा.
बिड़ला समूह के लिए यह समय सबसे अधिक लाभकारी रहा. युद्ध के दौरान जूट के बोरों और कपड़ों की मांग आसमान छू रही थी. बिड़ला ने युद्ध के दौरान सेना के लिए वर्दी, टेंट और जूट के सामान की आपूर्ति की. युद्ध के मुनाफे से ही जीडी बिड़ला ने हिंदुस्तान मोटर्स (1942) और यूनाइटेड कमर्शियल बैंक यानि यूको बैंक (1943) की नींव रखी. 1939 से 1945 के बीच बिड़ला की संपत्ति कई गुना बढ़ गई.
गुजराती व्यापारी वालचंद हीराचंद ने युद्ध के दौरान साहसी कदम उठाए. उन क्षेत्रों में हाथ डाला जहां ब्रिटिश एकाधिकार था. उन्होंने 1940 में हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट की स्थापना की, जो अब भारत की बडी पब्लिक सेक्टर कंपनी HAL में बदल चुकी है. इसके जरिए उन्होंने युद्ध के लिए विमानों की मरम्मत और निर्माण का काम किया. साथ ही सिंधिया स्टीम नेविगेशन के जरिए शिपिंग में भी विस्तार किया. युद्ध के दौरान हुए मुनाफे और अनुभव से उन्होंने प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स की शुरुआत की.
टाटा समूह पहले से ही स्थापित था लेकिन युद्ध ने ‘टाटा स्टील’ को ब्रिटिश साम्राज्य के लिए अपरिहार्य बना दिया. जमशेदपुर के कारखाने ने युद्ध के लिए आवश्यक बख्तरबंद गाड़ियों और रेल की पटरियां सप्लाई कीं. टाटा केमिकल्स की स्थापना कमोवेश तभी यानि 1939 में हुई थी. उसने युद्ध के दौरान रसायनों की कमी को पूरा किया. खुद को बाजार में जमा लिया.
अहमदाबाद के इस दिग्गज सूती वस्त्र उद्योगपति कस्तूरभाई लालभाई ने ने युद्ध के दौरान कपड़े की भारी मांग का फायदा उठाया. ब्रिटिश सेना की वर्दी के लिए बड़े पैमाने पर ठेके मिलने से अरविंद मिल्स और उनके अन्य उपक्रमों को जबरदस्त वित्तीय मजबूती मिली. दिल्ली क्लॉथ एंड जनरल मिल्स (DCM) के मालिक लाला श्रीराम को युद्ध ने उत्तर भारत का सबसे बड़ा उद्यमी बना दिया. उन्होंने न केवल कपड़ों की आपूर्ति की, बल्कि चीनी और रसायनों के क्षेत्र में भी बड़े स्तर पर विस्तार किया. युद्ध के दौरान ही सट्टेबाजी और आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई से कई छोटे मारवाड़ी व्यापारी भी बड़े ‘सेठ’ बनकर उभरे.
युद्ध के अंत तक भारतीय सेठों के पास इतना पैसा जमा हो गया था कि जब ब्रिटिश भारत छोड़कर जाने लगे, तो भारतीयों ने उनकी कई कंपनियां खरीद लीं. कई नई कंपनियां और कारखाने शुरू किए. चाय के बड़े बड़े बागान खरीदे. संजय श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से साभार
