कठोर वैचारिकता के साथ एक दर्पीले स्वाभिान वाली व्यावहारिक बुद्धि के राजनेता

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों की सीरीज में पढ़िए: ज्योति बसु के बारे में

कठोर वैचारिकता के साथ एक दर्पीले स्वाभिान वाली व्यावहारिक बुद्धि के राजनेता

त्रिभुवन

 

ज्योति बसु : ऐसा राजनेता, जो प्रधानमंत्री भी हो सकता था, भारत रत्न भी ठुकरा सकता था और फिर भी अंततः अपनी ही नहीं, आज के दौर की हर पार्टी से नैतिक आभा में बड़ा दिखता है

हेरॉल्ड लॉस्की के व्याख्यानों से लौटता हुआ वह युवा बंगाली केवल कानून पढ़कर बैरिस्टर बनने नहीं आया था; वह सत्ता, राज्य, वर्ग और मनुष्य के बीच के उस तनाव को अपने भीतर लेकर लौट रहा था, जिसने बाद में भारतीय राजनीति की एक अनोखी शख़्सियत गढ़ी।

ज्योति बसु उन विरल भारतीय नेताओं में थे, जिनका सार्वजनिक जीवन ब्रिटिश राज के आख़िरी दौर में शुरू हुआ और जिनकी राजनीति में कठोर वैचारिकता के साथ एक दर्पीले स्वाभिान वाली व्यावहारिक बुद्धि भी मौजूद रही। यही कारण है कि वे एक साथ कम्युनिस्ट भी थे, प्रशासक भी; आंदोलनकारी भी थे और व्यवस्था को चलाने की कला जानते हुए एक लंबे शासन-पुरुष भी।

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में उनका 23 वर्ष का कार्यकाल केवल एक रिकॉर्ड नहीं, भारतीय लोकतंत्र के ललाट पर सजग, आँखों में स्पृहणीय और चाल-ढाल में गरिमा वाला कालखंड है।

ज्योति बसु की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वे भारत के प्रधानमंत्री बन सकते थे; लेकिन बने नहीं; और बने नहीं इसलिए कि उनकी अपनी पार्टी ने उन्हें बनने नहीं दिया। 1996 में यूनाइटेड फ्रंट सरकार के गठन के समय वे सर्वमान्य नामों में थे; बाद में ख़ुद बसु ने इसे “हिस्टॉरिक ब्लंडर” कहा। लेकिन यहाँ उनका यह महसूस करना सत्य-सापेक्ष भी था और तथ्य सापेक्ष भी। उन्हें अफ़सोस था, लेकिन अवज्ञाकारिता का भाव नहीं था। वे पार्टी-निर्णय से सहमत नहीं थे, फिर भी उसके बाहर जाकर निजी महत्वाकांक्षा का झंडा नहीं उठाया। यही वह जगह है, जहाँ उनका व्यक्तित्व सोमनाथ चटर्जी से अलग दिखाई देता है। सोमनाथ चटर्जी 2008 में लोकसभा अध्यक्ष पद छोड़ने को तैयार नहीं हुए और अंततः पार्टी से निकाल दिए गए; लेकिन ज्योति बसु ने चोट खाई, पर अनुशासन नहीं छोड़ा।

इसीलिए बसु का दुःख निजी अपमान नहीं, राजनीतिक इतिहास का दुःख बन गया। और हाँ, एक तथ्य स्पष्ट रहना चाहिए: इस प्रकरण को अक्सर राजीव गांधी से जोड़ा जाता है, लेकिन 1996 में मामला कांग्रेस के बाहरी समर्थन वाली यूनाइटेड फ्रंट व्यवस्था का था; राजीव गांधी तब जीवित नहीं थे।

फिर भी उस प्रसंग पर एक राजनीतिक टिप्पणी आज भी चुभती है, और उसे सुधारे हुए रूप में कहा जाना चाहिए कि सीपीएम नेताओं की अदूरदर्शिता देखिए कि जिस समय कांग्रेस-समर्थित व्यवस्था में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने की नौबत आई, नेतृत्व ने कहा कि वह काँग्रेस जैसी बुर्जुआ पार्टी के साथ किसी प्रकार का सहयोग नहीं कर सकती। उसके किसी नेता को यह एहसास नहीं हो पाया कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो राजनीति के राष्ट्रीय राजमार्ग पर निकट भविष्य में आ रही अंधेरे की सुरंग जाने किस रक्तस्नात प्रांतर में आकर विलीन हो जाएगी और वामदलों के लिए कोई पगडंडी ही न बचेगी। उनके ये ग़लत निर्णय इसलिए हुए कि वे लोक के यथार्थ से कट गए थे और वैश्विक से लेकर स्थानीय बदलावों से अनभिज्ञ हो चुके थे। उनकी हालत उन पौराणिक पंडितों जैसी हो गई थी, जो ग्रंथ के गर्हित सच को ही युग का सच मानकर चलते हैं।

आज हालात यह हैं कि उसी काँग्रेस के साथ दूरी और निकटता दोनों की रणनीतियों में माकपा को बार-बार उलझना पड़ता है। यह वाक्य केवल व्यंग्य नहीं, भारतीय वाम की एक दीर्घ राजनीतिक त्रासदी का सार है। और यह भी सच है कि बसु के समर्थक इस तर्क को इसलिए और ताक़त से रखते हैं; क्योंकि उनके मुख्यमंत्री रहते पश्चिम बंगाल 1984 की सिख-विरोधी हिंसा और 1992 के बाद फैली सांप्रदायिक उथल-पुथल के बरअक्स अपेक्षाकृत शांत रहा। अतिशयोक्ति छोड़ दें तो भी इतना मानना पड़ेगा कि सांप्रदायिक ताप को प्रशासनिक दृढ़ता से ठंडा रखने की उनकी क्षमता असाधारण थी। सोचिए कि देश की बागडोर उन्हें मिलती तो वे आज की राजनीति में हमें जो आदिम पाषण कालीन युग जैसा जो आए दिन बोध हो रहा है, कम से कम हम उससे बचे रहते। इतना ही नहीं, लोक-समाज भी कदाचित् इतनी लपलपाती बर्बर लपटों में नहीं झुलस रहा होता।

ज्योति बसु का निजी जीवन भी किसी सामान्य राजनीतिक जीवनी की तरह सीधा-सपाट नहीं है। स्कूल में दाख़िले के समय पिता ने उनका लंबा नाम ज्योतिरिंद्र नाथ बसु से छोटा करके केवल “ज्योति” कर दिया था। जैसे इतिहास कभी-कभी अपने नायकों को पहले से संपादित करके भेजता है। लेकिन वही पिता जब बेटा कम्युनिस्ट राजनीति में गहरे उतर गया तो इतने आहत हुए कि उसे विरासत से बेदख़ल कर दिया, घर से निकाल दिया और बसु को दोस्तों के घरों में रहना पड़ा।

यह घटना मामूली नहीं है। भारतीय राजनीति में अनेक नेता विचारधारा को वसीयत से सुरक्षित दूरी पर रखकर चलते हैं; ज्योति बसु ने विचारधारा की कीमत घर की चौखट पर चुकाई। वे आरामदेह, संपन्न परिवार से आए थे; लेकिन उनका राजनीतिक जीवन वैचारिक सुविधाभोग का नहीं, वैचारिक कटौती का जीवन था।

और फिर विरोध के बीच निजी संबंधों की उनकी शैली भी कम दिलचस्प नहीं। कांग्रेस उनके लिए वर्गीय-सियासी प्रतिद्वंद्वी थी, पर इंदिरा गांधी से उनका रिश्ता इतना पुराना और इतना निजी था कि वे उन्हें निजी तौर पर “इंदिरा”, अपितु कुछ जगहों पर “इंदु” कह सकते थे। यह अधिकार हर किसी को नहीं मिलता। इसकी वजह यह थी कि पंडित जवाहरलाल नेहरू और विजयलक्ष्मी पंडित के साथ उनका एक रिश्ता हेरॉल्ड लॉस्की जैसे राजनीतिक सिद्धांतकार से जुड़ता था। भारतीय राजनीति में यह दुर्लभ दृश्य है कि विचारधारा की तल्ख़ी का शोर बरक़रार है, पर निजी संबोधन में ऐसी आत्मीयता कि प्रधानमंत्री भी पहले नाम से पुकारी जाने लगें। इससे बसु की एक और परत खुलती है। वे केवल नारेबाज़ कम्युनिस्ट नहीं थे; वे सत्ता-व्यवस्था के उच्चतम गलियारों में भी असहज हुए बिना चल सकने वाले, पुराने ढंग के और गहरे राजनीतिक व्यक्ति थे।

उनकी राजनीति का बड़ा आकर्षण यही था कि उसमें आदर्श और प्रशासन एक-दूसरे को पूरी तरह नष्ट नहीं करते थे। भूमि-सुधार, पंचायत ढाँचे का विस्तार, ग्रामीण सत्ता के लोकतंत्रीकरण और राज्यीय स्थिरता ने उन्हें बंगाल के गाँवों में लगभग देदीप्यमान जनाधार दिया। वे उन गिने-चुने मुख्यमंत्रियों में रहे जिन्हें जनता ने केवल चुनाव नहीं जिताए, शासन की निरंतरता भी सौंपी। पर यह कहानी एकरेखीय नहीं है। जिस शासन ने ग्रामीण बंगाल को नई ऊर्जा दी, उसी पर शहरी ठहराव, उद्योगों के क्षरण और नौकरशाही जड़ता के आरोप भी लगे। इसलिए ज्योति बसु की विरासत को या तो लाल रंग में पूरी तरह रंग देना या पूरी तरह काला कर देना दोनों बौद्धिक आलस्य हैं। सच यह है कि वे उपलब्धियों और अधूरेपन दोनों के बहुत बड़े शासक थे।

ज्योति बसु के व्यक्तित्व के छोटे-छोटे दृश्य भी असाधारण हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए अपने जूते स्वयं पॉलिश करना; 1954 के शिक्षक आंदोलन में गिरफ्तारी से बचने के लिए विधानसभा में शरण लेना; 1970 में पटना स्टेशन पर उन पर हुए हमले में बाल-बाल बच जाना, जबकि अली इमाम गोली का शिकार हो गए और फिर जीवन के अंतिम वर्षों में अपनी आँखें तथा शरीर चिकित्सा-अनुसंधान के लिए दान कर देना आदि ये दृश्य किसी प्रचार-पुस्तिका के नहीं, एक कठोर निजी अनुशासन वाले मनुष्य के हैं। उनकी नास्तिकता शोरगुल वाली नहीं थी; वह व्यवहार में थी। और शायद इसी कारण वह अपनी पत्नी की धार्मिक आस्था में हस्तक्षेप भी नहीं करते थे। भारतीय सार्वजनिक जीवन में ऐसे संयमित नास्तिक बहुत कम मिलते हैं।

लेकिन ज्योति बसु पर लिखते हुए केवल प्रशस्ति-पत्र लिखना भी इतिहास के साथ बेईमानी होगी। उनके शासन पर मरीचझाँपी एक स्थायी धब्बे की तरह दर्ज़ है। साल 1979 में शरणार्थियों के विरुद्ध हुई हिंसक कार्रवाई, जिसे बंगाल की स्मृति ने बहुत देर तक दबाकर रखा। इसी तरह प्राथमिक शिक्षा से अंगरेज़ी को दूर करने वाली नीति भी उनके शासन की उन वैचारिक भूलों में गिनी जाती है, जिसने एक पीढ़ी को प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान पहुँचाया; बाद के वर्षों में स्वयं इस नीति पर पुनर्विचार हुआ। यानी ज्योति बसु के नाम केवल सफलताएँ नहीं हैं; वे यह चेतावनी भी हैं कि विचारधारा जब शासन में बदलती है तो उसके निर्णयों की मानवीय कीमत बहुत बड़ी हो सकती है।

भारत रत्न वाले प्रसंग में भी उनकी अलग दर्प भरी नैतिक आभा दिखती है। 2008 में जब उनके नाम को लेकर चर्चा उभरी तब स्वयं बसु ने साफ़ कहा कि हमारी पार्टी के नेता राज्यसम्मान स्वीकार नहीं करते। यह बात निर्विवाद है कि ज्योति बसु ऐसे नेता थे जिन्हें सम्मान मिलने से नहीं, सम्मान न लेने से भी प्रतिष्ठा मिलती थी। यह दुर्लभ है। हमारे समय में लोग पुरस्कारों के लिए छोटे हो जाते हैं; बसु पुरस्कारों को छोटा कर देने वाले आदमी थे।

आख़िर में ज्योति बसु की सबसे गहरी पहचान शायद यही है कि वे भारतीय वाम की सबसे बड़ी संभावना और सबसे बड़ी चूक दोनों का नाम हैं। वे उस पीढ़ी के अंतिम बड़े चेहरों में थे, जो ब्रिटिश राज से चली, ट्रेड यूनियन की धूल से गुज़री, विधानसभा की भाषा सीखी और राज्य को एक दीर्घ राजनीतिक शैली में ढाल दिया। वे प्रधानमंत्री नहीं बने, पर इस देश के प्रधानमंत्री न बन पाने की सबसे बड़ी कहानी बन गए। उन्होंने पुरस्कार नहीं लिए, पर पुरस्कारों से बड़े दिखाई दिए। उन्होंने पार्टी अनुशासन नहीं तोड़ा, पर अंततः उनकी ऊँचाई पार्टी-निर्णयों से अधिक दिखाई देने लगी। और यही किसी बड़े नेता की पहचान है। ख़ासकर, वह जो अपने समर्थकों के लिए केवल नायक नहीं रहता, अपने विरोधियों के लिए भी एक अनिवार्य संदर्भ बन जाता है।

मुझे भारतीय राजनीति में वृहत्तर बंगाल बचपन ही से सम्महित करता रहा है। ख़ासकर अपने साहित्य के कारण और नवजागरण की लहर के कारण। लेकिन उस राज्य में काँग्रेस की एक के बाद एक चूकों के कारण वामपंथ के लिए एक मदिरिल से सपने ने अंगड़ाई भर ली थी कि राजनीति के पानी पर ज्योति बसु जैसे सुबुद्धि नेताओं ने उस सपने को अचानक थराथराकर समाप्त हो जाने वाल एक रुपहला बिम्ब भर नहीं रहने दिया, उसे ज़मीनी यथार्थ में बदल दिया और संभवत: यही मार्क्सवादी राजनीति का सौंदर्य भी है कि वह स्वप्न को हवा में प्रकंपित होती रोशनी नहीं रहने देता, अपितु उसे मनुष्य के सुश्रम, सुसंगठन और इतिहास की ठोस धरती पर उतार लाता है। त्रिभुवन के फेसबुक वॉल से साभार

लेखक – त्रिभुवन

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