शहीद-ए-वतन शिवराम हरि राजगुरु : अजेय शहीद को मेरी श्रद्धांजलि

शहीदी दिवस  23 मार्च 2026 पर विशेष

शहीद-ए-वतन शिवराम हरि राजगुरु : अजेय शहीद को मेरी श्रद्धांजलि

डॉ रामजीलाल

संक्षिप्त:

शहीद-ए-वतन राजगुरु का भारत के क्रांतिकारी आंदोलन में योगदान का मूल्यांकन करते समय तीन क्रांतिकारी वीरों सुखदेव,  भगत सिंह और  राजगुरु को  एक साथ जोड़ना बहुत जरूरी है .क्योंकि इन तीन वीरों को 23 मार्च 1931 को केंद्रीय जेल लाहौर में फांसी दी गई थी. लेकिन भगत सिंह आम जनता में राजगुरु और सुखदेव से ज़्यादा लोकप्रिय होने की वजह से, वे दोनों पब्लिक मीटिंगों, सेमिनारों, भाषणों और यहाँ तक कि शहीदी दिवस (23 मार्च) पर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी लगभग गायब हो जाते हैं, जबकि ये तीनों क्रांतिकारी क्रांतिकारी सोच ,क्रांतिकारी योजनाओं व संगठनों के निर्माण व क्रियांवन में एक-दूसरे के पूरक और सम्पूरक रहे हैं.अप्रैल 1929 में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हैमिल्टन हार्डी ने मजिस्ट्रेट आर.एस. पंडित की विशेष अदालत में 27 आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की.  एफआईआर के अनुसार, सुखदेव प्रथम स्थान पर, भगत सिंह 12वें स्थान पर और राजगुरु 20वें स्थान पर थे.

विस्तार:

शिवराम हरि राजगुरु (24 अगस्त 1908 – 23 मार्च 1931 शहादत दिवस) का जन्म ब्रिटिश भारत में बॉम्बे प्रेसीडेंसी (अब महाराष्ट्र) में पुणे के पास खेड़ गाँव (अब राजगुरु नगर) में एक ब्राह्मण परिवार में हरि नारायण (पिता) और श्रीमती पार्वती बाई (माता) के यहाँ हुआ था. जब राजगुरु की आयु केवल छह की थी उनके   पिताजी का स्वर्गवास हो गया और परिवार पालन-पोषण का दायित्व उनके बड़े भाई कंधों पर आ गया .अपने गांव खेड़ में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात,  पुणे के न्यू इंग्लिश हाई स्कूल में दाखिला लिया. यद्यपि. राजगुरु एक प्रतिभाशाली और दृढ़ निश्चयी छात्र थे. परंतु न्यू इंग्लिश हाई स्कूल में पढाई के समय परीक्षा में अंग्रेजी भाषा में कम अंक आने कारण उसके भाई ने उसकी पिटाई कर दी और बेइज्ज़ती  और क्रोध के कारण   जेब में सिर्फ़ केवल एक रुपया–16 आना लेकर घर छोड़ दिया.  एकनाथ सदाशिव राव की सलाह पर, वे संस्कृत और हिंदू धर्मग्रंथों की पढ़ाई करने के लिए वाराणसी गए, जहाँ उन्होंने लघु सिद्धांत कौमुदी जैसे कठिन ग्रंथों में महारत हासिल की और शैक्षणिक उत्कृष्टता प्राप्त करने के साथ-साथ शारीरिक प्रशिक्षण के प्रति गहरी लगन विकसित की.

चिंतन पर प्रभाव:

युवावस्था में ही राजगुरु के वाराणसी में अध्ययन के समय संस्कृत भाषा में महारत हासिल  करने  के पश्चात वैदिक ग्रंथों व लघु सिद्धांत कौमुदी का अध्य्यन उनके चिंतन की आधरशील बन गई.इसके अतिरिक्त जगत गुरु शंकराचार्य का धार्मिक विश्वास,  बाल गंगाधर तिलक का उग्र राष्ट्रवाद ,छत्रपति शिवाजी  की छापामार युद्ध शैली ,ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार की शोषणकारी व्यवस्था और भारतीयों के साथ क्रूर अत्याचार, लोगों की गरीबी और तकलीफ़ और घर छोड़ने के बाद उनकी अपनी तकलीफ़ें, जलियांवाला बाग का पूर्व निर्धारित नरसंहार( 13 अप्रेल1919), महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से अन्य युवाओं भांति विमुख होना  उनके  चिंतन को प्रभावित करता चला गया.परंतु चंद्रशेखर आजाद तथा अन्य क्रांतिकारियों-भगत सिहं,सुखदेव इत्यादि का प्रभाव उनके चिंतन पर अमिट छाप छोड गया और वह पूर्णतया राष्ट्रवाद, समाजवाद , धर्मनिरपेक्षवाद व शोषण रहित सामाजिक  व्यवस्था की  स्थापना के आधार पर भावी भारत के निर्माण के अतुल्यनीय समर्थक बन गए . साम्राज्यवादी शोषण से भारत को मुक्ति दिलाने के लिए क्रांतिकारी आंदोलन में सम्मिलित हो गए और उनका  सुदृढ़  विश्वास   इतना परिपक्व हो गया कि वे अपने जीवन का बलिदान करने के लिए प्रेरित हुए.

व्यक्तिगत गुण

राजगुरू के व्यक्तिगत अतुल्यनीय गुणों में असीम निडरता,अभूतपूर्व  शारीरिक और मानसिक साहस व संतुलन,  शौर्य ,सहनशक्ति,उग्र राष्ट्रवादी भावना व देशभक्ति के  प्रतिसम्पर्ण ,निष्ठा,त्याग,बलिदान , अभूतपूर्व बौद्धिक्ता व संस्कृत में महारत इत्यादि मुख्य हैं. एक तरफ, वह बहुत समर्पित और गंभीर क्रांतिकारी थे, दूसरी तरफ, वह अपने साथियों के लिए एक ‘अच्छे एंटरटेनर’ भी थे. हालांकि वह बहुत खुशमिजाज दिखते थे, लेकिन वह ‘लोह दिल’ के धनी युवा थे. उनका पक्का इरादा इस बात से पता चलता है कि एक बार उन्होंने ‘गर्म लोहे की रॉड’ को छू लिया था. जब चंद्रशेखर आज़ाद ने यह देखा और उनसे पूछा कि यह क्या पागलपन है, तो उन्होंने जवाब दिया कि वह यह परीक्षण कर रहे थे कि वह पुलिस की बर्बरता को कितना बर्दाश्त कर सकते हैं. वह एक अचूक निशानेबाज भी थे. .यही कारण है कि उसके साथियों ने उनको “एचएसआरए (HSRA) के ‘गनमैन’ की उपाधि से नवाज़ा गया. उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि उनको नीद बहुत आती थी .यही कारण है कि उनके क्रांतिकारी साथी उनको ‘कुम्भकरण ‘कहते थे. उनका छद्म क्रांतिकारी नाम ‘रघुनाथ’ था. महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में स्टूडेंट्स आज भी उन्हें ‘राजगुरु द गनमैन’ के नाम से जानते हैं.लेकिन महाराष्ट्र के बाहर ‘राजगुरु द गनमैन’ न तो आम लोगों को पता है, और न ही स्टूडेंट्स को. क्योंकि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इसकी कभी रिपोर्टिंग नहीं होती.

चिंतन :

राजगुरु हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन और उसके बाद बने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के मेंबर थे. हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन मार्क्सिस्ट और लेनिनिस्ट सोच पर आधारित एक ऑर्गनाइज़ेशन था. राजगुरु, अपने दूसरे क्रांतिकारी साथियों की तरह, एक ऐसे नौजवान थे जो गांधीवादी तरीकों के बिल्कुल विपरीत क्रांतिकारी हिंसक तरीकों से भारत को साम्राज्यवादी सरकार के शोषण और ज़ुल्म से आज़ाद कराना चाहते थे. राजगुरु हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐशोसिएन(एचएसआरए )के सदस्य थे .यही कारण है कि उनकी विचारधारा वही थी जो इस संगठन की विचारधारा थी .एचएसआरए   का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्यवाद को समूल नष्ट करने के पश्चात  भारत के निर्माण के लिए एक ऐसे समाजवादी राज्य की स्थापना करना था जहां भूमि   और उत्पादन के साधनों का ऐसे वितरण हो ताकि  समतावादी व शोषण रहित समाज की स्थापना हो सके.  भारत की विभिन्नताओं को देखते हुए एकता स्थापित करने के लिए धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना करना उनका मुख्य उदेश्य था.

सॉन्डर्स हत्याकांड: 17 दिसंबर1928

साइमन कमीशन (1928)के विरूद्ध विरोध प्रर्दशन का नेतृत्व करते हुए लाहौर के पुलिस अधीक्षक, जेम्स ए. स्कॉट के द्वारा किये लाठियां के  प्रहार के कारण पंजाब केसरी लाला लाजपत की  मृत्यु हो गई.क्रांतिकारियों ने लाला जी की मृत्यु  का बदला लेने के लिए पुलिस अधीक्षक जेम्स. ए स्कॉट  की हत्या करने की योजना बनाई .परन्तु गलत पहचान के कारण 17 दिसंबर 1928 को जॉन .पी. सॉन्डर्स सहायक पुलिस अधीक्षक,लाहौर की राजगुरू व भगत सिंह ने हत्या कर दी और  सभी क्रांतिकारी भूमिगत हो गए.

राजगुरु की ज़िंदगी की गुप्त महत्व बातें:

भूमिगत और गिरफ्तारी

सॉन्डर्स हत्याकांड के बाद, राजगुरु, नागपुर में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ(RSS)  के एक कार्यकर्ता बाबूराव दादा खरे के घर में छिप गए थे, और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के संस्थापक सरसंघचालक डॉ. के.बी. हेडगेवार के साथ भी रहे थे. इससे साफ़ पता चलता है कि डॉ. हेडगेवार के बंगाल से लेकर लाहौर तक के क्रांतिकारियों से करीबी रिश्ते थे, और नागपुर में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का हेडक्वार्टर क्रांतिकारियों का अड्डा था.(Verma.A , 2008).  राजगुरु को काली टोपी, आधी आस्तीन वाली सफेद शर्ट और आधी खाकी पैंट (खाकी नेकर) बहुत पसंद थी, जो सोशलिस्ट क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल होने से पहले राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ(RSS) के साथ उनके जुड़ाव को दिखाता है.क्रांतिकारियों और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के बीच क्या कनेक्शन था, इस पर और शोध करने की आवश्यकता है.

ब्रिटिश इंटेलिजेंस रिकॉर्ड के अनुसार, सॉन्डर्स की हत्या के बाद, राजगुरु बर्मा (अब म्यांमार) में छिपे हुए थे, जबकि उन्हें 29 दिसंबर 1929 को रात 1.00 बजे पुणे में दिनकर के घर पर छिपे हुए ठिकाने पर केसकर द्वारा  गुप्तचर विभाग के इंस्पेक्टर को दी गई गुप्त जानकारी के आधार पर गिरफ्तार किया गया था.सबसे गुप्त घटना जो लोगों को नहीं पता, वह यह है कि क्रांतिकारियों का निशाना हसरत निज़ामी थे, लेकिन गलती से राजगुरु ने 20 जनवरी 1928 को उनके ससुर को गोली मार कर हत्या कर दी.

लाहौर षड़यंत्र केस –मुकदमा और शहादत: 23 मार्च 1931

लाहौर षड़यंत्र केस में, सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को शाम 7.33 बजे लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई. 25 मार्च 1931 को द ट्रिब्यून (लाहौर) ने सबसे पहले इस घटना को पहले पन्ने पर छापा.  (‘Bhagat, Rajguru And Sukhdev  Executed’, The Tribune, Lahore, 25 March,1931,P.1.) शहादत की खबर जंगल की आग की तरह पूरे देश में कश्मीर से कन्याकुमारी और बॉम्बे से कलकत्ता तक फैल गई. पूरे देश में प्रदर्शन हुए औरजनता एवं पुलिस के मध्य सन् 1857 के पश्चात पहली बार इतनी भयंकर मुठभेड़े हुई. इस संघर्ष में 141 भारतीय शहीद हो गए , 586 व्यक्ति घायल हुए एवं 341 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया.

हर साल 23 मार्च को कृतज्ञ राष्ट्र इन तीनों शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करता है.

 

(नोट: डॉ. रामजीलालपाँलिटिक इंडिया 1935 42: एनाटॉमी ऑफ़ इंडियन पॉलिटिकल {अजंता पब्लिकेशन्सदिल्ली, 1986) के लेखक हैं.}

 

डॉ रामजीलाल

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