युद्ध के समय ईद मनाना

रेखाचित्र – संजय श्रीवास्तव

युद्ध के समय इस बार जब ईद मन रही है तो बहुत से इस्लामिक देश इसे दुख की ईद भी कह रहे हैं, खासकर गाजा और ईरान के लोग – जहां लोग मर रहे हैं. खाने के लाले हैं. जेब में पैसे नहीं हैं. भारी विनाश, लाखों लोग बेघर, भुखमरी का खतरा, ईंधन-दवा की कमी और बिजली-पानी की समस्या. लोग मुख्य रूप से नमाज पढ़कर और खोए रिश्तेदारों की याद में ईद मना रहे हैं.

सुबह आज के टाइम्स ऑफ इंडिया पर के संपादकीय पेज पर नजर गई. जहां स्पीकिंग ट्री में युद्ध के समय ईद शीर्षक से एक लेख नई दिल्ली में सेंटर फॉर पीस एंड स्पिरिचुअलिटी इंटरनेशनल की अध्यक्ष फरीदा खानम ने लिखा है, उसको शब्द दर शब्द दे रहा हूं. संजय श्रीवास्तव

युद्ध के समय ईद मनाना

फरीदा खानम

ईद सद्भाव, कृतज्ञता और शांति का उत्सव है, प्रार्थना, दान और सद्भावना की भावना के साथ. वो दिन जब परिवार मिलते हैं, श्रद्धालु ईश्वर का धन्यवाद करते हैं. शुरुआत नए चंद्रमा को देखने के साथ होती है. जैसे ही कटा हुआ चांद नजर आता है, लोग बुदबुदाते हैं, “हे ईश्वर, ये चांद शांति और विश्वास लेकर आए.” ये प्रार्थना महज रस्म नहीं बल्कि प्रतिज्ञा है कि प्रार्थना को बुदबुदाते लोग दूसरों की सुरक्षा और शांति का स्रोत बनेंगे. संकल्प लिया जाता है लोगों के बीच शुभचिंतक बनकर रहेंगे, सद्भाव को बढ़ाएंगे, सद्भावना फैलाएंगे.

कृतज्ञता ईद की भावना का एक अहम हिस्सा है. रमज़ान के खत्म होने कुरान याद दिलाती है, ” तुम कृतज्ञ रहो” (कुरान 2:185). कृतज्ञता शांति को वातावरण रचने में बढ़ावा देती है.

ईद पर आमतौर पर किया जाने वाला अभिवादन – अस्सलाम अलैकुम यानि आप पर शांति हो, इस संदेश को और भी पुष्ट करता है. ये महज़ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि नैतिक आश्वासन है. इस्लामी विद्वान इब्न उयैना ने कहा, “क्या आप जानते हैं कि सलाम का क्या अर्थ है? यह आपको आश्वस्त करता है कि आप सलाम करने वाले से सुरक्षित हैं.”

इस साल की ईद ऐसे समय आई है जब दुनियाभर में अशांति और चिंता का माहौल है. युद्ध, अस्थिरता और अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है. ये जाहिर करती है कि शांति कितनी नाजुक हो सकती है. हिंसा होने पर त्योहारों की खुशियां धूमिल हो जाती हैं.

युद्ध का बोझ. घर तबाह हो जाते हैं. परिवार बिखर जाते हैं. बच्चे डर में बड़े होते हैं. जब संघर्ष राजनीतिक विवादों या रणनीतिक लक्ष्यों को लेकर होते हैं, तब भी उनका मानवीय नुकसान बहुत बड़ा और दीर्घकालिक होता है.

इस्लाम में युद्ध को किसी भी प्रकार से पसंदीदा विकल्प नहीं माना जाता. इसके बजाय, शांति को मानव जीवन की स्वाभाविक और वांछित अवस्था के रूप में ही पेश किया जाता है. कुरान कहती है, “मेल-मिलाप सर्वोत्तम है” (कुरान 4:128). विश्व वासियों को निर्देश देती है कि जब दूसरा पक्ष शांति की अपील करे तो सकारात्मक प्रतिक्रिया दें (कुरान 8:61). ये शिक्षाएं शांति को केवल एक जरूरत नहीं बल्कि उससे भी कहीं ज्यादा बनाती हैं.

इस रणनीति का एक स्पष्ट ऐतिहासिक उदाहरण हुदैबिया की संधि है. जब मुसलमानों को उमरा करने के लिए मक्का में प्रवेश करने से रोका गया, तो बातचीत के परिणामस्वरूप कुरैश के साथ एक छोटा समझौता हुआ. हालांकि ये शर्तें मुसलमानों के लिए प्रतिकूल लग रही थीं, फिर भी शांति स्थापित करने के लिए उन्होंने इसे मान लिया. इसने बाद में साबित किया कि अस्थायी समझौते दीर्घकालिक स्थिरता और प्रगति का रास्ता बनाते हैं.

आज आपस में जुड़े हुए विश्व में शांति पहले से कहीं अधिक जरूरी है. संघर्ष व्यापार को रोकते हैं. मानवीय संकटों को जन्म देते हैं. वैश्विक असुरक्षा बढ़ाते हैं. इसलिए ईद महज एक उत्सव से कहीं अधिक है; ये व्यापक संदेश देती है: एक अधिक मानवीय और शांतिपूर्ण विश्व का निर्माण करना. संजय श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से साभार

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