अनीष की कविता – सुरक्षित संस्करण 

विश्व कविता दिवस पर

सुरक्षित संस्करण

अनीष

 

कुछ वाक्य

इतने सच्चे थे

कि मैं उन्हें लिख नहीं पाया,

वे आते थे दिमाग में

अचानक

जैसे आईना

सामने रख दिया हो किसी ने

और मैं

अपनी ही आँखों में

ज़्यादा देर देख नहीं पाया

उनमें डर था

सीधा सा

और कुछ चालाकियाँ

जिन्हें मैं मानता नहीं था,

कुछ छोटे-छोटे झूठ भी थे

जिन्हें मैं रोज़

सच समझकर पहन लेता हूँ

अगर लिख देता उन्हें

तो शायद

कविता नहीं बनती

सीधा-सीधा मैं ही खुल जाता,

इसलिए छोड़ दिया

आधा अधूरा ही

जैसे कोई

दरवाज़े तक जाकर

वापस लौट आए,

अब वो सब

यहीं हैं

मेरे अंदर ही

कभी-कभी

धीरे-धीरे

घिसते रहते हैं मुझे

और जो लिखा है कागज़ पर

वो बस

थोड़ा संभलकर लिखा गया है

पूरा सच नहीं है

बस इतना

कि पढ़ा जा सके

 

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