हिंदी लेखन की स्थिति पर शंभुनाथ द्वारा शुरू की गई चर्चा पर प्रेमकुमार मणि ने टिप्पणी दी थी। उन दोनों विद्वानों को पढ़कर अनीष ने एक छोटी सी टिप्पणी लिखी है। उसे भी हम सहर्ष यहां प्रकाशित कर रहे हैं। अगर आगे भी कोई अपनी राय भेजेगा तो उसे भी प्रकाशित करने की कोशिश करेंगे। संपादक
बीच बहस में
हिंदी लेखन – ऊर्जा और दिशा की कमी
अनीष
विज्ञान, तकनीक और ग्लोबलाइज़ेशन ने अंग्रेज़ी जैसी भाषाओं को बहुत आगे कर दिया है। आज ज्ञान, रिसर्च, और विश्व संवाद का बड़ा हिस्सा उन्हीं भाषाओं में हो रहा है—इससे हिंदी जैसी भाषाएँ थोड़ी “हाशिए” पर महसूस होती हैं।
लेकिन यह कहना कि हिंदी में “स्कोप नहीं बचा”, थोड़ा जल्दबाज़ी होगी। असल समस्या स्कोप की कमी नहीं, ऊर्जा और दिशा की कमी है।
पंजाबी साहित्य का उदाहरण ही ले लो —वहाँ आज भी जीवन, मिट्टी, प्रवास, पहचान और विद्रोह बहुत जीवंत ढंग से आ रहे हैं। उसमें एक निर्भीकता और सीधापन है, जो पाठक को तुरंत पकड़ता है।
हिंदी में क्या हुआ?
यहाँ लेखन कई बार बहुत ‘सचेत’ और ‘संकोची’ हो गया
भाषा में प्रयोग कम, सुरक्षित रास्ते ज्यादा
और जीवन से सीधा टकराव कम
विश्व साहित्य में “खुलापन” इसलिए है क्योंकि वहाँ लेखक
अपने समाज की असुविधाजनक सच्चाइयों से भागते नहीं हैं
