संस्कृति का स्वतंत्र लोक प्रवाह कहां खो गया?

संस्कृति का स्वतंत्र लोक प्रवाह कहां खो गया?

शंभुनाथ

कहा जाता है कि समय बदल गया है। समय आम लोगों के हाथ से बाहर चला गया है- इतिहास, संस्कृति और राजनीति देश के लोगों के हाथ में नहीं हैं। सत्ता और संस्कृति के संबंध बदल गए हैं।

पहले भी सत्ताएं कला, साहित्य और संस्कृतियों का संरक्षण करती थीं। प्राचीन दरबार हो या आधुनिक अकादमियां- वे सेमिनार करके, अनुदान-पुरस्कार आदि देकर ऐसा करती थीं। तब एक खुलापन था, योग्यता का सम्मान था। अब संरक्षण कठोर नियंत्रण और शर्तों से जुड़ गया है। सत्ताएं कला, साहित्य और सांस्कृतिक रूपों को अपने वैचारिक औजार में तब्दील कर चुकी हैं। अब राजनीति के संस्कृतिकरण और संस्कृति के राजनीतिकरण के दृश्य हैं। धर्म, जाति, प्रांत और तमाम परंपराएं सत्ता की भाषा बन गई हैं।

पहले संस्कृति पर राजसत्ता और बाजारसत्ता का दबाव कम था, बल्कि टकराव का संबंध था। भक्त कवियों ने राजदरबार से नाता नहीं रखा, ‘संतन को कहा सीकरी सो काम’! (कुंभनदास)। प्रसाद की कहानी ‘आकाशदीप’ में चंपा व्यापारिक मुनाफे की दौड़ में शमिल हो रहे बुद्धगुप्त का साथ नहीं देती। छायावादी कवयित्री महादेवी ने लिखा है, ‘राह में तुझको मिलेंगे तितलियों के पर रंगीले/ जाग तुझको दूर जाना।’ किसी समय बाजार बहुत कुछ था, पर सबकुछ न था। आजकल टकराव का स्थान ‘आंतरिक अनुकूलन’ ले चुका है। संस्कृति अपना स्वतंत्र लोक प्रवाह खोकर राजसत्ता और बाजारसत्ता की भाषा का अंग बन गई है।

डिजिटल दुनिया भी सत्ता और संस्कृति के संबंध निर्धारण में एक बड़ी भूमिका निभाती है। आने वाले दिनों में एल्गोरिद्म ही संस्कृति की दृश्यता निर्धारित करेगा, कविताएं भी रच देगा। एआई झूठ को अधिक सफलतापूर्वक सत्याभासी बनाएगा।

समय ऐसा बदला है कि पर्व-त्योहार, शादी-ब्याह अब भावनात्मक मामले नहीं हैं, इवेंट हैं। अब इवेंट मैनेजर हैं। बाजार में संस्कृति मूल्यबोध का स्रोत नहीं बल्कि उत्पादित माल है। वह उपभोग की वस्तु है जो सत्ताओं को निरापद बनाती है। कहना न होगा कि आज की उपभोगवादी संस्कृति उच्च आदर्शों के ध्वंसावशेष पर खड़ी हो रही है। उसका एक लक्ष्य असुविधाजनक राष्ट्रीय स्मृतियों को मिटाना है जो मुख्यत: साहित्यिक कृतियों में हैं।

 

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