कविता
आस्था के कीचड़ का कमल
मंजुल भारद्वाज
पद व्यक्ति का
विकार दूर नहीं करता
अपितु विकारी व्यक्ति
पद की गरिमा को
तार तार कर
मलिन करता रहता है
चाहे वो पद प्रधानमंत्री का हो
या लोकसभा स्पीकर का !
विकार मानसिक रोग है
झूठ उसका प्राण होता है
विकारी व्यक्ति
हर पल झूठ बोलता है
मनगढ़ंत
बिना सिर पैर की कहानियां गढ़ता है
फ़िर ख़ूब रोता है
भावनाओं का दोहन करने के लिए
सबसे अमोघ अस्त्र चलाता है
मेरी जान को खतरा है!
एक बार दो बार
यह ढोंग चलता है
पर भारत की जनता ने
विशेष तप किया है
गंगा स्नान किया है
विशेष तपस्या से
एक ढोंगी, झूठे
विकारी को सत्ता पर बिठाया है
इसलिए झूठ की हांडी बार बार
ढोंगी के लिए वरदान साबित होती है!
तपस्वी जनता को क्या मिलता है
कर्ज़, बेरोजगारी
जुमले,बलात्कार
मौत चारों ओर हाहाकार
श्मशान कब्रिस्तान
पांच किलो मुफ़्त अनाज
विदेश में बेइज्जती
हाथों में हथकड़ियां
पैरों में बेड़ियां
और ढोंगी का डंका !
देश की गरिमा
सार्वभौम गिरवी रख दिया
सारी घोषणा विदेशी करते हैं
कहां से तेल खरीदो
किस देश से बात करो
कब युद्ध विराम करो
पत्तलकार इसे मास्टर स्ट्रोक बता
दिन भर नंगा नाचते हैं
ढोंगी के मुंह पर बेड़ियां लग जाती हैं
एक शब्द नहीं निकलता
घिग्घी बंधी रहती है!
वाकई देश की जनता का तप है
कि देश की बागड़ोर
ढोंगी के हाथ में है
क्योंकि जनता चैतन्य आलोक में नहीं
आस्था के कीचड़ में रेंग रही है
जनता सत्य से दूर
आस्था के कीचड़ में
कमल खिला
देश की सार्वभौमिकता
संविधान, लोकतंत्र
सामाजिक सौहार्द को गंवा
व्यवस्था से सवाल पूछने की बजाय
एक दूसरे का क़त्ल कर रही है
वाकई देश की जनता
बहुत तपस्वी है
जलता दीपक बुझा रही है!
