महान फिल्मकार की पुण्यतिथि पर विशेष
ऋत्विक घटक की फिल्म कोमल गांधारः विभाजन की घटनाओं का पुनरावर्तन भर नही
उर्वशी
ऋत्विक घटक की ‘कोमल गांधार’ विभाजन की घटनाओं का पुनरावर्तन भर नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक टूटन की भीतरी कंपन है, जो समय की धूल जम जाने के बाद भी मनुष्य की स्मृति, संवेदना और अस्मिता में अनवरत थरथराती रहती है। यह फिल्म जैसे इतिहास के शोर से दूर बैठी एक धीमी, करुण तान है—इतनी कोमल कि उसे सुनने के लिए दर्शक को अपने भीतर उतरना पड़ता है।

रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता से लिया गया इसका शीर्षक यहाँ केवल काव्यात्मक आभा नहीं रचता, बल्कि पूरी फिल्म का भाव-दर्शन बन जाता है—‘कोमल गांधार’ वह स्वर है जो विघटन के बीच भी संगीत की संभावना को बचाए रखता है, जैसे सब कुछ छिन्न-भिन्न हो जाने पर भी मनुष्य के भीतर प्रेम और स्मृति का एक सूक्ष्म कण जीवित रह जाता है। घटक विभाजन को राजनीतिक भूगोल की रेखाओं में नहीं, बल्कि आत्मा की अदृश्य दरारों में पढ़ते हैं; उनके लिए सीमाएँ नक्शों पर नहीं, मनुष्य के भीतर खिंची हैं।
वृगु और अनुसूया—ये दोनों पात्र किसी कथा के साधारण चरित्र नहीं, बल्कि विस्थापित मनुष्यता के संवेदनशील प्रतीक हैं। वे कलाकार हैं, रंगमंच से जुड़े लोग, पर उनकी कला जीवन से पृथक नहीं; वे नाटक का अभ्यास करते हुए दरअसल उस सांस्कृतिक अखंडता की खोज कर रहे हैं, जिसे इतिहास ने तोड़ दिया, पर स्मृति अब भी सँजोए है। उनके संवादों में, उनके बीच की चुप्पियों में, और धीरे-धीरे जन्म लेते उनके स्नेह में एक ऐसे देश की गूँज है जो भूगोल से मिटा दिया गया, पर हृदय से नहीं।
अनुसूया—पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर दिखती स्त्री—फिर भी सामाजिक संरचनाओं की अदृश्य बेड़ियों में बँधी है; उसका संघर्ष केवल बाहरी नहीं, भीतर की अस्मिता का भी है। वृगु आदर्श और यथार्थ के द्वंद्व में फँसा वह कलाकार है, जो जानता है कि कला दुनिया को बदलने का दावा नहीं कर सकती, फिर भी उसके बिना मनुष्य का भीतर सूख जाता है। उनके बीच पनपता प्रेम निजी रोमांस नहीं, बल्कि उस सामूहिक मानवीय आकांक्षा का रूपक है जिसमें मनुष्य क्रूर समय के बीच थोड़ा-सा सौंदर्य, थोड़ी-सी करुणा बचा लेना चाहता है—मानो टूटती हुई दुनिया में किसी कोमल तान को बचाए रखने की जिद।

फिल्म के दृश्य-बंध भी भीतर के उजाड़ का विस्तार हैं—नदी के सूने किनारे, हवा से भरे विस्तृत मैदान, खाली पड़े मंच—ये सब बाहरी दृश्य नहीं, पात्रों की मौन मनःस्थितियों के दृश्य-प्रतिरूप हैं। प्रकृति यहाँ सजावट नहीं, संवेदना की सहयात्री है; हर खुला आकाश भीतर की रिक्तता का बिंब है, हर दूर तक जाती पगडंडी किसी खोए हुए घर की तलाश। घटक की ध्वनि-संरचना इस अनुभव को और गहरा कर देती है—संगीत, शोर, विराम और मौन सब मिलकर भावनाओं की अनकही भाषा रचते हैं। एक टूटती हुई धुन, कहीं दूर से आती पुकार, अचानक थम गया स्वर—ये सब मिलकर दर्शक को उस जगह ले जाते हैं जहाँ शब्द विफल हो जाते हैं और केवल अनुभूति बचती है।
‘कोमल गांधार’ हमें यह एहसास कराती है कि विभाजन कोई समाप्त अध्याय नहीं, बल्कि हमारी मानसिक संरचना में जड़ जमा चुकी एक पीड़ा है; इसलिए फिल्म देखते हुए हम केवल अतीत का इतिहास नहीं, अपने भीतर की विखंडित पहचान से भी सामना करते हैं। घटक जैसे हमारे कंधे पर हाथ रखकर याद दिलाते हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा प्रतिरोध उसकी संवेदनशीलता है—टूटकर भी कोमल बने रहना, बिछुड़कर भी स्मृतियों को सहेजना, और सब कुछ उजड़ जाने के बाद भी किसी रियाज़ की तरह फिर से जीवन का स्वर साधने की कोशिश करना। इसी अर्थ में ‘कोमल गांधार’ एक फिल्म से आगे बढ़कर आत्मा की सुनवाई बन जाती है—जहाँ संगीत कानों से कम, हृदय की गहराइयों में अधिक सुना जाता है, और जहाँ हम अचानक पहचान लेते हैं कि वृगु और अनुसूया की तरह हम सब भी अपने-अपने जीवन में किसी खोए हुए सुर, किसी छूटे हुए घर, किसी अधूरे प्रेम की तलाश में भटकते हुए मनुष्य हैं; और शायद इस तलाश में ही मनुष्यत्व की अंतिम रोशनी बची हुई है। उर्वशी के फेसबुक वॉल से साभार
