राजकुमार कुम्भज की चार कविताऍं

राजकुमार कुम्भज की चार कविताऍं.

 

1.

स्मृतियों की राह में कविता.

 

कविता नहीं है राख का ढ़ेर

भीतर थोड़ा भीतर तक भरी हैं चिंगारियाँ

उन्हीं से बनी रहती है गर्माहट विचारों में

कमतर नहीं होती हैं उड़ानें आर-पार की

वे जाती हैं और ले जाती हैं सभी को

ऊॅंचाइयों के पार,बादलों-दीवारों के पार

कठिन ज़रुर है स्मृतियों की राह में कविता

मगर असंभव का संभव है कविता ही

और कविता का बेहतर संभव है मनुष्यता

जबकि संभव के असंभव में कार्रवाई

कविता काम नहीं,ज़रा नहीं फ़ुरसत का

वह वही रोज़मर्रा की उधेड़बुन,उलझनें

मिले छुट्टी,तो मिले कविता.

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2.

और कविता में आग

 

काँटों की तरह चुभते हैं शब्द

बाद उसके तड़पते हैं कविता में आने को

होते नहीं हैं,मिलते नहीं हैं रास्ते यूँ ही

काटना ही पड़ते हैं पहाड़ और जॅंगल

ऊॅंचाइयों से उतरना होता है नीचे और नीचे

तब कहीं जाकर बनता है,मिलता है रास्ता

और कविता में आग.

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3.

जड़ें वे ही छूती हैं

 

ज़रूरी है हवा और धूप

और बेहद ज़रूरी है सीनों में आग

इन चीज़ों से ही मिटती है फफूँद सब

और यह-वह अनपेक्षित सीलन भी

सदियों से संदूक-बंद तमाम शब्दों की

ज़मीन भी मिलती है तो इन्हीं चीज़ों से

जड़ें वे ही छूती हैं हर हाल बुलंद-आसमान

जो गड़ी हों ज़मीन में.

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4.

टकराती हैं लहरें

 

चट्टानों से टकराती हैं लहरें

नदियाँ लाती हैं जिन्हें मीलों दूरी से

तय करते हुए निष्ठा और निरंतरताऍं

अभी है और अभी है नहीं कुछ भी जैसा

चलता नहीं है प्रेम और युद्ध में कभी भी

ज़रुरी होता है सिर्फ़ ख़ुद का ज़िंदा होना

ज़िंदा होने का सबूत चाहिए भरपूर बस

हाथ हैं साथ तो पाँव भी चलना चाहिए

अंतिम नहीं होता है कुछ भी.

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