हवा के रुख़ के ख़िलाफ़ सेकुलरिज्म के साथ चलना बहुत मुश्किल

हवा के रुख़ के ख़िलाफ़ सेकुलरिज्म के साथ चलना बहुत मुश्किल

 

अजीज बर्नी

 

शकील अहमद और नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस छोड़ चुके हैं, इल्ज़ाम राहुल गांधी मिलने के लिए वक़्त नहीं देते। राशिद अल्वी ने भी कुछ इसी अंदाज़ में अपनी बात कही है, लेकिन तारिक अनवर साहब ने सही कहा कि अगर कोई शिकायत है कांग्रेस आलाकमान के सामने रखें।

पहले बात शकील अहमद साहब के इस जुमले की कि राहुल गांधी एक डरपोक लीडर हैं। ये उनका नजरिया है लेकिन पार्लियामेंट के अंदर और बाहर जिस तरह आर एस एस और बीजेपी सरकार को राहुल गांधी कटघरे में खड़ा करते हैं ये कोई डरपोक लीडर कभी नहीं कर सकता।

फिर्कापरस्त सियासत जिस तरह मुस्लिम लीडरशिप को खत्म कर देना चाहती है ये किसी से छिपा नहीं है । ऐसी सूरत में सबसे ज़्यादा मुश्किल वक़्त सेक्युलर पार्टियों से जुड़े नेताओं के लिए है जिन्हें दरी बिछाने वाला, ग़ुलाम ज़हनियत का, गद्दार और मुनाफिक जैसे लफ्जों से पुकारा जाता है। ये बात आम सेक्युलर मुसलमान के लिए ही नहीं, सेक्युलर पार्टियों के मुस्लिम लीडरान के लिए भी होती है।

बिहार में ए आई एम आई एम ने न सिर्फ़ 5 मुसलमानों को हरा कर 5 सीटें जीती बल्कि दर्जनों सीटों पर सेक्युलर उम्मीदवारों के हारने की वजह बनीं जिनमें बेशतर मुसलमान थे। यही उनकी कामयाबी है।

ओवैसी का बार बार ये कहना है कि बीजेपी को हराने का ठेका मुसलमानों ने नहीं लिया है, ठीक कहा । आपने आज मुसलमानों ने बीजेपी को हराने का नहीं बल्कि जिताने का ठेका लिया और वो आपकी सरपरस्ती में हो रहा है। आप मुसलमानों की लीडरशिप को हराने और बीजेपी को जिताने का काम कर रहे हैं। जो काम बीजेपी आज़ादी के बाद से कभी नहीं कर पाई वो 2014 के बाद से आप के जरिए हो रही है।

इसी हार का डर, ओवैसी ब्रिगेड के जरिए निशाने पर लिए जाने का डर कुछ सेक्युलर पार्टियों के मुसलमानों को भी सता रहा है और वो नई राहें तलाश करना चाहते हैं। लिहाज़ा उनके सामने दो रास्ते हैं या तो किसी ना किसी तरह इक़्तदार के साथ खड़े हो जाएं और वो बात कहें जो उन्हें इक़्तेदार के नज़दीक ला सके या फिर ओवैसी की तरफ़ रुख़ करें।

कांग्रेस और सेक्युलर पार्टियों की मुखालफत बीजेपी को सबसे ज़्यादा पसंद है जो काम ओवैसी बखूबी कर रहे हैं और उसी का इनाम है के मुस्लिम लीडरशिप के नाम पर मीडिया सिर्फ़ उन्हें या उनके कारिदों को दिखाता है। यही बात शायद उन कांग्रेसियों को मुतस्सिर कर रही होगी जो अब कांग्रेस को निशाने पर ले रहे हैं।

कांग्रेस मुस्लिम चेहरों को सामने नहीं रखती। इमरान प्रतापगढ़ी कांग्रेस का वो चेहरा हैं जो अक्सर सामने आता है। इमरान मसूद का नाम भी लिया जा सकता है। समाजवादी पार्टी की इकरा हसन और अबु आसिम आज़मी नुमाया चेहरा हैं।

मैं इस वक़्त कोई तवील तहरीर नहीं लिख सकता 5 जनवरी को हार्ट अटैक के बाद हॉस्पिटल में रहा अभी भी ठीक नहीं ज़ेरे इलाज हूं ताहम मैं जल्द ही कोशिश करूंगा इस मौजू पर तावील गुफ्तगू कर सकूं।

अजीज बर्नी के फेसबुक वॉल से साभार